बेपरवाह है भारत का होटल बाजार

भारत में तेजी से बड़ा होता जा रहा है। और अर्थव्यवस्था बढ़ने के साथ होटल बाजार तो बढ़ रहा है, लेकिन पर्यावरण को बचाने और उसकी परवाह करने के प्रति वह उतना गंभीर नहीं दिखाई पड़ता


एचवीएस हॉस्पिटेलिटी कंसल्टेंसी के मुताबिक अगले पांच साल में भारतीय होटलों में कमरों की संख्या 143 फीसदी बढ़ जाएगी। डेढ़ लाख से ज्यादा कमरे जुड़ जाएंगे। इन कमरों में निरंतर बिजली की भी जरूरत होगी, पानी भी चाहिए होगा। विशेषज्ञों के मुताबिक होटल कारोबारी अब तक पर्यावरण का ख्याल रखे बिना बिजली, पानी और कूड़े जैसी जरूरी बातों की अनदेखी करते आए हैं।
होटलों को इससे कोई सरोकार नहीं कि जमीन के नीचे पानी का स्तर गिरता जा रहा है। ऊर्जा का खर्च बढ़ रहा है। कूड़े के प्रबंधन को लेकर भी ज्यादातर होटल गंभीर नहीं हैं।


विकसित देशों में टिकाऊ पर्यटन पर जोर दिया जाने लगा है। यही वजह है संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन भी इस साल टिकाऊपन पर जोर दे रहा है।

भारतीय होटलों में हर साल 35 करोड़ देसी विदेशी पर्यटक रुकते हैं। 2011 में जीडीपी में इस उद्योग का करीब छह फीसदी हिस्सा रहा। होटल उद्योग ने बीते साल 32.7 अरब डॉलर का कारोबार किया।

आंकड़े जाहिर करते हैं कि निवेशकों के लिए यह उद्योग कितना आकर्षक बन चुका है, लेकिन पर्यावरण को बचाने की चुनौती के सामने होटल उद्योग की कोशिशें नाकाफी लगती हैं। एचवीएस के चैयरमैन मानव थडानी कहते हैं, 'हर कोई टिकाऊ पर्यटन का हिस्सा बनना चाहता है। कई होटलों ने खुद को ग्रीन कहना भी शुरू कर दिया है लेकिन वे इसे आंक नहीं पा रहे हैं।'
आईटीसी के भारत में कई बड़े होटल हैं। हाल ही में आईटीसी को होटलों के डिजायन और ऊर्जा बचाने की कोशिशों के चलते एलईईडी अवॉर्ड से सम्मानित भी किया गया। आईटीसी ने अपनी कोशिशों को वर्ल्ड क्लास ग्रीन प्रैक्टिस का नाम दिया है। लेकिन भारत के ज्यादातर होटल आज भी ऐसी कोशिशों से दूर हैं।

जर्मनी में तस्वीर अलग है। जर्मनी की इंटरनेशनल होटल एसोसिएशन (आईएचए) के शोध में पता चला कि यहां के लोग रोजमर्रा की जिंदगी में भी पर्यावरण का ख्याल रखने की इच्छा जताते हैं। 1,400 होटल आईएचए के सदस्य हैं। सर्वे में पता चला कि 66 फीसदी जर्मन होटल कारोबारी निवेश करते समय ऊर्जा बचाने पर जोर देते हैं।
इससे भारत की तुलना करते हुए थडानी कहते हैं, 'भारतीय होटल इको फ्रेंडली आदेशों के जरिए अपने मेहमानों के लिए असुविधा पैदा नहीं करना चाहते हैं। दूसरी बात ये है कि उन्हें लगता है कि टिकाऊपन एक अतिरिक्त खर्चा है। इस विचारधारा को बदलना होगा।'

ज्यादातर कारोबारियों को लगता है कि इको फ्रेंडली होने का मतलब है ज्यादा खर्चा करना। लेकिन सच्चाई इसके उलट है। कई देशों में कारोबार करने वाले हिल्टन ग्रुप ने 2011 में बिजली और पानी का सही इस्तेमाल कर 14.7 करोड़ डॉलर बचाए। ऊर्जा और पानी की खपत 15 फीसदी कम की।
रिपोर्ट: रुचिका चित्रवंशी/ओएसजे
संपादन: महेश झा



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