बचपन के इक बाबूजी थे

27 नवंबर हरिवंशराय बच्चनजी की जन्म शताब्दी पर विशेष

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तेजीजी ने मुझे बताया था कि में तुम इतने बीमार पड़े कि वे घबरा गए थे और बस ईश्वर से मन्नात माँगने के सिवाय कुछ न कर सके। बोले- भगवान, इसे ठीक कर दो मैं शराब को हाथ भी नहीं लगाऊँगा। इसी तरह बंटी के बीमार पड़ने पर मांसाहार छोड़ दिया था। इस बात को मैं तो इस तरह लेती हूँ कि ईश्वर के आगे वे केवल भिखारी बनकर नहीं खड़े हो जाते थे- दया माँगते थे तो बदले में कुछ त्याग देने को भी तैयार रहते थे और आत्मसंयम से बड़ी चीज भला और क्या हो सकती है।

अमित ने कहा, 'बाबूजी ने बंटी और मेरे लिए किया, वह उनके ईश्वर के प्रति न केवल अटूट विश्वास और आस्था का उदाहरण है बल्कि उनके अद्भुत आत्मबल का भी।'

ईश्वर से माँगना तो आसान काम है, लेकिन जैसा कि आपने कहा कि उसे अपना आत्मसंयम भी अर्पित करना, ये अति कठिन है। ये तो मानो ईश्वर को चुनौती देने वाली बात हो गई।
प्रार्थना, दक्षिणा, पुष्पम्‌-फलम्‌-नैवेद्यम्‌ के साथ-साथ आपने उन्हें अपना आत्मसंयम भी अर्पण किया। आप भी खेलो, हम भी खेलें, देखें कौन विजयी होता है।

अमित को भाषा घुट्टी में ही पिला दी गई है मानो। अमित जब मन से डूबकर बातें करते हैं तो उनकी हिन्दी एकदम रेशम की तरह फिसलती और नदी की तरह बहती चलती है।

मैंने पूछा कि तुम्हारी शिक्षा-दीक्षा कॉन्वेंट में हुई, पर शायद बच्चनजी इसके पक्ष में नहीं थे? तो बोले- 'हाँ मुझे बाबूजी की आत्मकथा पढ़ने पर पता चला कि माँ और उनके बीच इस बात को लेकर विवाद होते थे। मैं समझता हूँ ठीक ही था। जो हुआ ठीक ही हुआ- आखिर हमने पूरब और पश्चिम का सही-सही मिश्रण भी तो पा ही लिया न। बाबूजी को अपनी मातृभाषा के प्रति अटूट प्रेम था- स्वाभाविक था। माँ पश्चिमी खयालों से प्रभावित थीं, शायद आने वाले कल की ओर इशारा कर रही थीं। बाबूजी अपने आप से, और अपनी परिस्थितियों से संतुष्ट और शायद सीमित! माँ की सोच में शायद थोड़ा और विस्तार- शायद आने वाले कल की कुछ आहट सुन रही थीं वे।
आज के ग्लोबल विलेज वाले वातावरण को देखकर, उस समय जो निर्णय लिया गया वह अब सही दिखाई दे रहा है। विकसित देशों से जो आउट सोर्सिंग हो रही है वह ज्यादातर भारत को मिलती है। क्योंकि हम हिन्दीभाषी तो हैं ही, अँगरेजी भी अच्छी जानते हैं। चीन हमसे ज्यादा विकसित है, पर उसे इतनी नहीं मिलती, क्योंकि भाषा की समस्या है।'

मैंने कहा- चलो अच्छा ही हुआ कि बच्चनजी झुक गए और तेजीजी की बात मान गए, क्योंकि मान इसलिए भी गए होंगे कि वे तथाकथित भारतीयता के लकीर के फकीर की तरह हिमायती नहीं थे। उन्होंने तमाम भारतीय कुरीतियों के प्रति विद्रोह भी किया था।



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