दिलीप कुमार और राजनीति

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अक्टूबर 1994 में वे विप्र सिंह के साथ डलास (अमेरिका) में भारतीय मुसलमानों के फेडरेशन में भाग लेने गए थे। मई 1995 में ने अमेरिका जाकर बोस्निया के युद्ध पीड़ितों के लिए धन-संग्रह अभियन में भाग लिया और 1 लाख डॉलर एकत्र किए।

1996 के आम चुनाव में दिलीप कुमार ने अलवर (राजस्थान) में कांग्रेस प्रत्याशी दुरु मियाँ के लिए प्रचार किया। उस समय उन्होंने कहीं कांग्रेसी और कहीं समाजवादी प्रत्याशियों को जिताने के बयान जारी किए जिससे कुछ भ्रम अवश्य हुआ, लेकिन हकीकत यह थी कि दिलीप कुमार अल्पसंख्‍यक समुदायों के इस सामूहिक फैसले से सहमत हुए थे कि चुनाव में किसी पार्टी विशेष को थोकबंद समर्थन देने के बजाय मूल्यों के आधार पर विभिन्न पार्टियों के प्रत्याशियों को समर्थन दिया जाए।

तब दिलीप कुमार ने घोषणा की थी कि उन्होंने राजनी‍ति में प्रवेश नहीं किया है, वे सिर्फ देश की एकता और अखंडता में विश्वास करने वाले उम्मीदवारों के लिए बोलेंगे। तब अलीगढ़ में दिलीप कुमार ने समाजवादी उम्मीदवार सत्यपाल मलिक को जिताने की अपील की थी, जो भाजपा प्रत्याशी से हार गए थे।

अगस्त 1997 में दिलीप कुमार ने लखनऊ में ऑल इंडिया मुस्लिम ओबीसीज कॉन्फ्रेंस में मुसलमानों से आह्वा‍न किया कि वे अपने ‍अधिकारों के लिए लड़ें। यह पहला मौका था जब वे अल्पसंख्‍यक समुदाय के समर्थन में खुलकर सामने आए। मुंबई दंगों के समय वे सिर्फ मुसलमानों की दुर्दशा और उनकी जरूरतों के बारे में ही बोलते रहे थे। लखनऊ कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कांग्रेस पर मुसलमानों की भावनाओं से खिलवाड़ करने का आरोप भी लगाया था।
लेकिन 1998 के लोकसभा चुनाव से पहले दिलीप कुमार की माँग बनी रही और इस प्रकार के मुआवजे के रूप में चाँदनी चौक दिल्ली में दिलीप कुमार ने डॉ. मनमोहन सिंह के लिए प्रचार किया। तब डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था कि दिलीप कुमार ने देश की एकता और अखंडता के जो कार्य किए, उन्हें स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा।

1999 में दिलीप कुमार ने दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में भी चुनाव प्रचार किया। अहमदाबाद में उन्होंने पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन की सभाओं में राजनीति में धर्म के दुरुपयोग पर अपने विचार रखे थे और भारत के बेहतर भविष्य की कामना की थी। तब उन्होंने कुरआन का हवाला देते हुए मुसलमानों से कहा था कि इस्लाम सभी धर्मों के सम्मान की हिदायत देता है।
मैंने गीता, बाइबिल, ओल्ड टेस्टामेंट आदि धर्मग्रंथ भी पढ़े हैं। कोई भी धर्म आदमी-आदमी के बीच भेदभाव की वकालत नहीं करता। दिलीप कुमार मंत्रमुग्ध कर देने वाले वक्ता हैं। वे बहुत सोच-समझकर बोलते हैं। राजनीति में पैंतरे बदलते रहते हैं। दिलीप कुमार ने सुसंस्कारित व्यक्तित्व के अनुकूल संयमित राजनीति की है। सन 2000 में उन्होंने राज्यसभा में कांग्रेस का नुमाइंदा बनने की पेशकश मंजूर कर ली।



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