एक निर्भीक पत्रकार का जाना

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उन्होंने पत्रकारिता को अपनी समाजसेवा का साधन बनाया। प्रभाष जोशी और मेरा पचास वर्ष का संबंध रहा है। क्रिश्चियन कॉलेज इंदौर में हम लोग सहपाठी थे। धीरे-धीरे हमारी मित्रता गहरी होती गई। उन्होंने पढ़ते हुए ही बाकायदा पत्रकारिता भी शुरू कर दी। उन्हीं दिनों वे विनोबाजी के प्रभाव से महात्मा गाँधी के रचनात्मक कार्यक्रमों से जुड़ गए।

इंदौर में जब हम लोग साथ-साथ पढ़ते थे तो मैं छात्र आंदोलन चलाता था। वे विनोबाजी की गतिविधियों पर शाम को एक पर्चा निकालते थे। यह पर्चा कुछ दिनों तक नियमित प्रकाशित होता रहा। उन दिनों विनोबाजी इंदौर आए हुए थे। दरअसल, गाँधी और विनोबाजी के कामों में उनकी संलग्नता थी।

विनोबाजी के प्रभाव से ही उन्होंने गाँवों में स्वच्छता अभियान चलाया। सिनेमा के अश्लील पोस्टरों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी, उसमें हम सब नौजवान भाग लेते, विनोबाजी के विचार और उनकी गतिविधियों का प्रचार करते थे। प्रभाषजी में समाजसेवा का यह भाव अंत तक बना रहा।

वे अंत तक यात्राएँ करते रहे, भाषण देते रहे और समाज सेवा के काम में जुटे रहे। विनोबाजी के विचारों से प्रेरित और प्रभावित समाजसेवा का ही काम था कि प्रभाषजी ने विधिवत पत्रकारिता भी शुरू कर दी। बाकायदा उन्होंने नईदुनिया में आरंभ किया। राजेंद्र माथुर भी नईदुनिया से जुड़े थे।

हालाँकि वे तब गुजराती कॉलेज में व्याख्याता भी थे। मैं भी इन दोनों से बराबर संपर्क में रहता, बाद में नईदुनिया का दफ्तर कड़ावघाट से छावनी में आ गया। मुझे कॉलेज में पढ़ाई और सामाजिक गतिविधियों से जो समय मिलता, उसमें नईदुनिया में जाकर बैठता था। वहाँ प्रभाषजी और राजेंद्र माथुर के साथ विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा होती।

चर्चा में कई बार असहमतियाँ भी होतीं, लेकिन आत्मीयता दिनों-दिन गहरी होती गई। इतनी गहरी कि हम दोनों में कभी कोई अंतराल महसूस नहीं हुआ। बातचीत करते हुए सराफे, छावनी और बोझाँकेट बाजार में निकल जाते, वहाँ दुकानों पर खड़े होकर खाया-पिया करते थे।

प्रभाषजी खाने-पीने के बड़े शौकीन थे। पढ़ाई के दिनों में वे कॉलेज से अक्सर मेरे घर आ जाया करते। उनके आने की सूचना पाकर माताजी कहतीं कि प्रभाष आ रहा है, उसके लिए बाफले बनाना। घर आने के बाद वे भी खाना बनाने में जुट जाते थे। यह जिक्र इसलिए कि प्रभाषजी में मालवी फक्कड़पन भरा हुआ था। इसलिए उन्होंने पढ़ाई-लिखाई में भी खास रुचि नहीं ली और औपचारिक शिक्षा में आगे नहीं गए।

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-वेदप्रताप वैदिकप्रभाष जोशी के निधन से हिन्दी पत्रकारिता का एक सबसे सशक्त स्तंभ ढह गया है। यह कहना बिलकुल भी पारंपरिक नहीं है कि प्रभाष जोशी का निधन हिन्दी पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति है। प्रभाष जोशी जिस साँचे में ढले थे, वह आजकल की धंधे वाली पत्रकारिता के साँचे से बिलकुल अलग था। एक अर्थ में वे पत्रकार नहीं, समाजसेवक थे।
कॉलेज के दिनों में मैंने उनसे कई बार आग्रह किया और ऐसी व्यवस्था भी बनाई कि उपस्थिति कम होने के बावजूद वे परीक्षा में बैठ सकें, लेकिन इस मस्ती और फक्कड़पन के चलते उन्होंने कभी परवाह नहीं की। उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी, लेकिन उनमें तीव्र प्रतिभा थी। वे बहुत अच्छे लेख लिखने लगे थे।



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