चिकन खाने से पहले... जरा सोचिए!

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-मेनका गाँधी
चिकन को खिलाया जाने वाला यह संखिया केवल चिकन के माँस में ही नहीं पाया जाता है। पोल्ट्री के निकट की दाल तथा सब्जी खाने वालों अथवा पानी पीने वालों के लिए भी यह उतना ही हानिकारक है।

शब्दकोश में 'संखिया' (आर्सेनिक) शब्द 'जहर' का पर्याय होता है। इसे जहरों का राजा माना जाता है। यह एक धातुरूपी तत्व है, जिसका उपयोग चूहे मारने की दवा, खरपतवार समाप्त करने वाली दवा और शीशे को बनाने में किया जाता है और प्रत्येक बार आप जब भी चिकन खाते हैं तो आप संखिया भी खा रहे होते हैं।

वर्ष 1944 में रॉक्ससोन-4 हाइड्रोक्सी-3 नाइट्रोबेन्जेनी आर्सनिक एसिड की खोज की गई थी, जिसे अब 3 नाइट्रो, रिस्टैट अथवा रीनोसल के नाम से जाना जाता है और अमेरिकी सरकार द्वारा इसे फैक्टरी में पाले जाने वाले चिकन को खिलाने की अनुमति दी गई थी। यह एक संखिया आधारित भोज्य होता है, जिसका उपयोग पोल्ट्री उद्योग वजन ब़ढ़ाने, पेट के कीड़ों को मारने, चिकन के माँका रंग बेहतर बनाने और चिकन की छाती ब़ड़ी करने के लिए करता है। विश्व में उत्पादकों द्वारा इसे अपनाया गया था।
ऐसे चिकन को खाने के प्रभाव अथवा इसके पर्यावरणीय प्रभावों को देखने के लिए 40 वर्षों तक कोई अध्ययन नहीं किया गया था। 80 के दशक में जब योरपीय यूनियन ने पहले-पहल इसका परीक्षण किया तो उन्होंने तत्काल चिकन को दिए जाने वाले भोजन में संखिया को प्रतिबंधित कर दिया था। तथापि शेष विश्व में अभी भी चिकन को खिलाए जाने के लिए इसका उपयोग किया जा रहा है।
जहाँ ज्यादा संखिया खाने से तत्काल मृत्यु हो जाती है, वहीं पर्यावरणीय सुरक्षा एजेंसी के अनुसार धीरे-धीरे थो़ड़ी-थो़ड़ी मात्रा में इसके सेवन से ब्लैडर, फेफ़ड़ों, गुर्दे तथा कोलन का कैंसर हो सकता है। इससे प्रतिरक्षा, तंत्रिका तथा एन्ड्रोक्राइन प्रणालियाँ प्रतिकूलरूप से प्रभावित होती हैं। निम्न स्तर के प्रभाव आंशिक लकवे तथा मधुमेह और दिमाग के कार्य करने में शिथिलता में परिणत हो सकते हैं। शरीर के संखिया के संपर्क में आने से प्रारंभ में तो त्वचा मोटी हो जाती है और फिर धीरे-धीरे हृदय को रक्त प्रवाह कम होने लगता है।
प्रत्येक वर्ष मिलियनों पाउंड रॉक्सरओन को चिकन के भोजन में मिलाया जाता है। पोल्ट्री उद्योग, जो मोटे चिकनों से अधिक पैसा बनाता है, इस बात पर बल देता रहता है कि संखिया का थो़ड़ा भी अंश चिकन में नहीं रहता और इसलिए यह मानव के लिए हानिकारक नहीं होसकता है, परंतु हाल के अध्ययनों ने दर्शाया है कि इस संखिया का कुछ प्रतिशत चिकन के टिशुओं में रह जाता है और शेष उसके मूत्र तथा मल के साथ बाहर निकल जाता है। उपभोग करने वालों को इसके स्वाद का पता नहीं चल सकता क्योंकि यह गंधहीन, स्वादहीन होता है।
चिकन को खिलाया जाने वाला यह संखिया केवल चिकन के मांस में ही नहीं पाया जाता है, पोल्ट्री के निकट की दाल तथा सब्जी खाने वालों अथवा पानी पीने वालों के लिए भी यह उतना ही हानिकारक है। एक चिकन अपने 42 दिनों के वृद्धिकाल में लगभग 150 मिलीग्राम रॉक्सरोनमल के रूप में निकालता है और चिकन के मल से निकलने वाले हजारों टन इन आर्गेनिक संखिया को उर्वरक में बदला जाता है और इसका उपयोग फसल उगाने वाले खेतों में तथा साथ ही घर के बगीचों में किया जाता है।
धूप से यह यौगिक और विखंडित हो जाता है तथा रिसकर भू-जल में पहुँच जाता है। अमेरिकी कृषि विभाग द्वारा किए गए अनुसंधान के दल ने मिट्टी तथा एक्वीफायर अवसादों तथा साथ ही वे नदियाँ जिसमें यह बहकर मिलती है, में संखिया को पाया था। जॉन हॉपकिन्स से एक समूह ने ऐसे क्षेत्रों में नल के पानी में संखिया का विश्लेषण किया था, जहाँ सबसे अधिक चिकन की खाद डाली गई थी। उन्होंने पाया कि खेतों में जहाँ पर चिकन की खाद फैलाई गई थी, वहाँ संखिया के स्तर अधिक थे और जहाँ पर यह नहीं फैलाई गई थी वहाँ संखियाके स्तर कम थे।
इसके विषैलेपन तथा स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव को देखते हुए चिकन को संखिया खिलाया जाना विचित्र लगता है। यदि 1999 के बाद से ईयू के चिकन को यह नहीं दिया गया है, क्योंकि योरप ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है। यदि अमेरिका में सबसे ब़ड़े पोल्ट्री उत्पादक टायसन फूड ने अपने चिकन के भोजन में संखिया यौगिकों को मिलाना बंद कर दिया है तो हम क्यों अभी भी इसका उपयोग कर रहे हैं? सरकार को भोजन में संखिया को प्रतिबंधित करना चाहिए और उससे आप ही ऐसा करवा सकते हैं।



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