रामभक्तों की आसुरी सेना का तांडव

गुंडागर्दी से तार-तार हुईं मानवीय संवेदनाएँ

- विनय छजलानगुजरी 12 सितम्बर को देशभर में 'रामसेतु' के मुद्दे को लेकर जिस तरह बंद का तमाशा हुआ, उसने एक ऐसा बदनुमा दाग चस्पा कर दिया, जो लंबे समय तक नहीं धुल पाएगा। कहीं बुजुर्गो के साथ बदसलूकी हुई तो कहीं महिलाओं को अपमानित होना पड़ा। दशहतगर्दी की हद तो तब हो गई जब एक युवक प्रसव वेदना से तड़प रही अपनी पत्नी को अस्पताल तक नहीं पहुँचा सका और किसी तरह परदा करके उस महिला को सड़क पर ही अपने बच्चे को जन्म देना पड़ा।
इसमें कोई शक नहीं कि 'राम' के नाम पर की गई गुंडागर्दी ने मानवीय संवेदनाओं को तार-तार कर दिया। लोगों का आक्रोश जाहिर है कि आखिर कब तक राजनैतिक स्वार्थो के लिए आम आदमियों को उसकी कीमत चुकानी होगी?
इन दुपट्टाधारियों का खौफ इतना कि सचमुच हनुमान भी आ जाएँ तो उन्हें भी न जाने दें। ...यह कैसी दहशतगर्दी है? रामसेतु के नाम पर दिलों के पुल और मानवीयता के दायरे ध्वस्त करने का अधिकार किसने दिया?
घरों से निकलने को बेताब लोग और चौराहे पर तैनात कथित रामभक्त। इन दुपट्टाधारियों का खौफ इतना कि सचमुच हनुमान भी आ जाएँ तो उन्हें भी न जाने दें। ...यह कैसी दहशतगर्दी है? रामसेतु के नाम पर दिलों के पुल और मानवीयता के दायरे ध्वस्त करने का अधिकार किसने दिया? अपने गले के दुपट्टे को शहर के गिरेबाँ में डालकर उसे अपने कब्जे में लेने के प्रयासों को क्या सफल होने देना चाहिए? राम ने तो वानर सेना लेकर राक्षसों को हराया था, पर इन लोगों ने तो राम के नाम पर आसुरी सेना तैयार कर ली है, जो आम आदमी को ही हराने पर तुली हुई है।हर कोई परेशान था, भयाक्रांत था इन दृश्यों और उनसे उपजे नतीजों को देखकर। यों तो ये दृश्य पूरे देश में देखे गए, आम आदमी को परेशान किया गया पर इंदौर के बाशिंदों के लिए इसकी कसक बहुत गहरी है। पूरे शहर की फिजाँ ही बिगाड़कर रख दी है। बंद की चित्रमय झलकियाँ



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