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Shri Krishna Janmashtami 2026: 4 या 5 सितंबर, कब है जन्माष्टमी?

shri krishna janmashtami
Krishna Janmashtami 2026: भाद्रपद की पावन बेला में इस बार भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव अपार भक्ति और उल्लास के साथ मनाने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। प्रतिवर्ष जन्माष्टमी को लेकर स्मार्त और वैष्णव मत में मतभेद रहते हैं। अक्सर स्मार्त मत वाले पहले और वैष्णव मत जिसमें इस्कॉन के अनुयायी भी आते हैं वे बाद में जन्माष्टमी मनाते हैं। हालांकि इस बार स्मार्त और वैष्णव दोनों ही मतों के अनुसार 4 सितंबर 2026 को यह उत्सव मनाया जाएगा। चलिए जानते हैं कि आखिर इस बार दोनों ही मत एकसाथ क्यों?
 

जन्माष्टमी 2026: तिथियां और शुभ मुहूर्त

अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 04 सितंबर 2026, दोपहर 02:25 बजे से
अष्टमी तिथि का समापन: 05 सितंबर 2026, मध्यरात्रि 00:13 बजे तक
निशिथ (मध्यरात्रि) पूजा मुहूर्त: 05 सितंबर 2026, मध्यरात्रि 00:14 बजे से रात 01:01 बजे तक
 
दही हांडी उत्सव: शनिवार, 05 सितंबर 2026
व्रत पारण का समय: 05 सितंबर 2026, रात 01:01 (AM) बजे के बाद (अथवा प्रात: 06:24 बजे के बाद)
विशेष योग: इस बार जन्माष्टमी पर जयंती योग, रोहिणी नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग का अत्यंत दुर्लभ एवं शुभ संयोग बन रहा है।
 

4 सितंबर को ही क्यों मनाएं?

हिंदू धर्म में उदयातिथि (सूर्योदय के समय रहने वाली तिथि) और रोहिणी नक्षत्र के संयोग का विशेष महत्व होता है। 4 सितंबर को पूरे दिन अष्टमी तिथि का प्रभाव रहेगा तथा मध्यरात्रि (आधी रात) के समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाना शास्त्रसम्मत और सर्वोत्तम रहेगा।
 
इस बार अष्टमी तिथि दोपहर 02:25 से प्रारंभ होकर माध्यरात्रि में 00:13 बजे ही समाप्त हो रही है इसलिए इस बार उदयातिथि वाला कॉन्सेप्ट यहां लागू नहीं होगा और चूंकि यह पर्व निशिथ काल में ही मनाया जाता है जो कि 4 सितंबर की रात्रि में अर्थात शून्यकाल यानी 12 बजे ही रहेगा। इसलिए दोनों ही मतों के अनुसार 04 सितंबर शुक्रवार को ही व्रत रखकर मध्यरात्रि को पूजा होगी।
 

व्रत का संकल्प और पारण विधान

जन्माष्टमी का व्रत एकादशी की भांति ही परम पवित्र माना गया है। इसकी शुरुआत सप्तमी की संध्या को एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करने से होती है। जन्माष्टमी की सुबह स्नान के बाद पूरे दिन (अहोरात्र) उपवास का संकल्प लें।
 
जन्माष्टमी की मुख्य पूजा मध्यरात्रि के निशीथ काल में होती है, जब बाल गोपाल का षोडशोपचार विधि से मनमोहक श्रृंगार और अभिषेक किया जाता है। व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर करें। यदि दोनों सूर्यास्त तक रहें, तो किसी एक के समाप्त होने पर पारण किया जा सकता है।
 
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