मुंडे, खुशवंत सिंह जैसी कई हस्तियां हमेशा के लिए दूर हो गईं

नई दिल्ली| पुनः संशोधित बुधवार, 31 दिसंबर 2014 (14:32 IST)
नई दिल्ली। कुछ ही घंटों बाद इतिहास का पन्ना बन जाएगा जिसमें सिमटी होंगी उन चर्चित हस्तियों की यादें, जो विदा होने जा रहे वर्ष में हमेशा हमेशा के लिए हमसे दूर हो गईं लेकिन अपने-अपने क्षेत्रों में किए गए उनके उल्लेखनीय कार्य उनके नहीं होने के बावजूद उनके होने का अहसास कराते रहेंगे।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री और महाराष्ट्र से पिछड़ा वर्ग के लोकप्रिय नेता गोपीनाथ मुंडे का 3 जून को नई दिल्ली में एक सड़क दुर्घटना के बाद निधन हो गया। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद एक सप्ताह पहले ही मुंडे को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था।> > 1 मार्च को हैदराबाद में पूर्व भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण का निधन हो गया। लक्ष्मण भाजपा के अध्यक्ष पद पर आसीन होने वाले पहले दलित नेता थे। उन्हें एक फर्जी रक्षा सौदे के लिए 1 लाख रुपए की रिश्वत लेते कैमरे के सामने पकड़े जाने के बाद इस पद से हटना पड़ा था।
भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री तपन सिकदर का 2 जून को नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया। 69 वर्षीय वरिष्ठ भाजपा नेता ने पश्चिम बंगाल की दमदम लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे। वे 1998 और 1999 में इसी सीट से सांसद रहे थे। वे 1999 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी रहे थे।

विभिन्न मीडिया संस्थानों से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार जहांगीर पोचा का 12 जुलाई को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। ‘न्यूज एक्स’ चैनल के शुरू होने के समय उसके प्रधान संपादक रहे पोचा चैनल को संचालित करने वाले आईटीवी ग्रुप के वरिष्ठ संपादकीय सदस्य थे।

भारत के पूर्व महान्यायवादी गुलाम ई. वाहनवती का 2 सितंबर को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। 65 वर्षीय वाहनवती देश के शीर्ष कानूनी अधिकारी बनने वाले पहले मुस्लिम थे। दाऊदी बोहरा समुदाय के आध्यात्मिक नेता सैयदना बुरहानुद्दीन का 17 जनवरी को निधन हो गया।

जाने-माने लेखक और पत्रकार एवं अंग्रेजी के शानदार समकालीन लेखक का 20 मार्च को 99 वर्ष की आयु में निधन हो गया। खुशवंत सिंह को 1974 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। 1984 में स्वर्ण मंदिर में सेना के प्रवेश के विरोध में उन्होंने यह सम्मान लौटा दिया था। 2007 में उन्हें पद्मविभूषण से विभूषित किया गया।

अपनी अद्भुत रचनाओं से जुनून, अंधविश्वास, हिंसा और सामाजिक असमानता का अनोखा ताना-बाना बुनने वाले साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित महान लेखक गैब्रियल गार्सिया मारकेज का 18 अप्रैल को मैक्सिको में निधन हो गया।

फिल्म जगत के पास भी रिचर्ड एटेनबरो, जोहरा सहगल, सुचित्रा सेन, जैसी हस्तियों की सिर्फ यादें रह गईं।

महात्मा गांधी के जीवन को परदे पर उतारने के लिए 20 साल तक मेहनत कर ‘गांधी’ फिल्म का निर्देशन करने वाले ऑस्कर से सम्मानित ब्रिटिश फिल्मकार रिचर्ड एटेनबरो का इस साल 25 अगस्त को निधन हो गया। वे 90 साल के थे।

उनकी फिल्म ‘गांधी’ 1982 में प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का अकादमी पुरस्कार मिला था। उस साल ऑस्कर पुरस्कारों में ‘गांधी’ फिल्म की धूम रही और उसे 8 श्रेणियों में पुरस्कृत किया गया था। इनमें सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार शामिल हैं।

जानी-मानी अभिनेत्री और नृत्य निर्देशक का 10 जुलाई को 102 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने 7 दशकों तक थिएटर और सिनेमा में विभिन्न भूमिकाएं निभाईं। जोहरा ने 1935 में उदय कुमार के साथ बतौर नृत्यांगना करियर की शुरुआत की। वे चरित्र कलाकार के तौर पर कई हिन्दी फिल्मों में नजर आईं। उन्होंने अंग्रेजी भाषा की फिल्मों, टेलीविजन और रंगमंच के जरिए भी अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी।

बंगाली सिनेप्रेमियों के ‘दिलों की रानी’ कहलाने वाली का इस साल 17 जनवरी को निधन हो गया। अपनी अलौकिक सुंदरता और बेहतरीन अभिनय के दम पर लगभग 3 दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली सुचित्रा ने ‘अग्निपरीक्षा’, ‘देवदास’ तथा ‘सात पाके बंधा’ जैसी यादगार फिल्में कीं।

‘अर्धसत्य’ तथा ‘सड़क’ जैसी फिल्मों में दमदार प्रदर्शन करने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी अभिनेता सदाशिव अमरापुरकर का 3 नवंबर को निधन हो गया। खलनायक और हास्य कलाकार के रूप में दर्शकों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ गए अमरापुरकर ने मुख्य धारा और कला फिल्मों में अपनी सशक्त अभिनय क्षमता दिखाई।

‘नृत्य साम्राज्ञी’ के नाम से मशहूर कथक नृत्यांगना सितारादेवी का लंबी बीमारी के बाद 25 नवंबर को मुंबई में निधन हो गया। सितारादेवी ने शास्त्रीय नृत्य विधा को बॉलीवुड में लाने में अग्रणी भूमिका निभाई थी।

वर्ष 1920 में तत्कालीन कलकत्ता में जन्मीं सितारा ने अपने पिता के संग्रहीत विषयों, कविताओं और नृत्यशैली को अपने नृत्य में उकेरा था। सितारा देवी के आसपास के चरित्र उनके नृत्य में जीवंत हो उठते थे।

हिन्दी और मराठी फिल्मों में अपने अभिनय की अनूठी छाप छोड़ने वाली अभिनेत्री नंदा का इस साल 25 मार्च को निधन हो गया। बड़ी दीदी, परिवार, दीया और तूफान, गुमनाम, तीन देवियां और छलिया जैसी फिल्मों में नंदा का अभिनय आज भी लोगों को याद है।

‘महाभारत’ जैसे धारावाहिक और ‘बागबान’ फिल्म के निर्देशक रवि चोपड़ा का 12 नवंबर को फेफड़ों की बीमारी के चलते 68 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने ‘जमीर’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘मजदूर’, ‘दहलीज’ और ‘बाबुल’ सरीखी फिल्मों का निर्देशन किया। वे ‘भूतनाथ’ और ‘भूतनाथ रिटर्न’ जैसी फिल्मों के निर्माता भी थे। (भाषा)

 

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