Last Updated : गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014 (17:41 IST)
अहिंसा से मिटे रोग और शोक
हिंसा का भाव या विचार रखने से व्यक्ति का शरीर और मन रोग और शोक ग्रस्त हो जाता है। इसका सीधा असर हमारे मन और मस्तिषकक
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योग के प्रथम अंग यम का दुसरा सूत्र है- अहिंसा। हिंसा का भाव या विचार रखने से व्यक्ति का शरीर और मन रोग और शोक ग्रस्त हो जाता है। इसका सीधा असर हमारे मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। मन और मस्तिष्क के रोग ग्रस्त होने से शरीर में भी रोग उत्पन्न होने लगते हैं। ऐसे में व्यक्ति का मन सदा खिन्न, उत्तेजित, व्यग्र और मतिभ्रम से ग्रसित हो जाता है। उसमें पशु प्रवृत्तियाँ हावी होने लगती है।
हम जब भी अहिंसा की बात करते हैं तो अकसर यह खयाल आता है कि किसी को शारीरिक या मानसिक दुख न पहुँचाना अहिंसा है। मन, वचन और कर्म से किसी की हिंसा न करना अहिंसा कहा जाता है। यहाँ तक कि वाणी भी कठोर नहीं होनी चाहिए। फिर भी अहिंसा का इससे कहीं ज्यादा गहरा अर्थ है।
भगवान महावीर, भगवान बुद्ध और महात्मा गाँधी की अहिंसा की धारणाएँ अलग-अलग थी। उक्त सभी ने प्राचीन योग शास्त्र के अहिंसा के सूत्र को विस्तृत और गूढ़ आयाम दिया। महात्मा गाँधी कहते हैं कि एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है अहिंसा।
परपीड़क और स्वपीड़क : जो दूसरों को शारीरिक या मानसिक रूप से सताए उसे परपीड़क कहते हैं और जो स्वयं के शरीर और मन को किसी भी रूप में कष्ट दे उसे स्वपीड़क कहते हैं। बहुत से लोग उपवास या नशा करके स्वयं के शरीर को कष्ट देते हैं और मन ही मन कुंठित रहने वाले भी स्वपीड़क होते हैं। स्वयं को पीड़ा पहुँचाकर कुछ लोग अपना हित साधने का कार्य भी करते हैं। योग में दोनों ही तरह के लोग हिंसक माने जाते हैं।
अहिंसा से मिटता बैर भाव : पातंजलि योग दर्शन के पाद 2 सूत्र 35 में कहा गया है कि- अहिंसा प्रतिष्ठायाँ तत्सन्निधौ बैर त्यागः अर्थात अहिंसा की साधना से बैर भाव निकल जाता है। बैर भाव के जाने से काम, क्रोध आदि वृत्तियों का निरोध होता है। वृत्तियों के निरोध से शरीर निरोगी बनता है। मन में शांति और आनंद का अनुभव होता है। सभी को मित्रवत समझने की दृष्टि बढ़ती है। सही और गलत में भेद करने की ताकत आती है।
अहिंसा का लाभ : खुद के और दूसरे के बारे में हिंसा का विचार भी न लाने से चित्त में स्थिरता आती है। परपीड़क और स्वपीड़क न बने। ऐसा सोचने और करने से सकारात्मक उर्जा का जन्म होता है। सकारात्मक उर्जा से आपके आस-पास का महौल भी खुशनुमा होने लगता है। यह खुशनुमा माहौल ही जीवन में किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होने देता।
यही आपकी सफलता का आधार है। इसी से आपके रिश्ते-नाते कायम रहेंगे। अहिंसा से ही स्वयं को स्वयं की देह, मन और बुद्धि के सारे क्रिया-कलापों से उपजे दुखों से स्वतंत्रता मिलेगी। इसी भाव से सभी तरह के रोग और शोक मिट जाते हैं। यही आत्म शांति का रास्ता है।
लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं।
दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें