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''साहेब'' घर पर नहीं हैं

औरत
- प्रज्ञा

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उस दिन अचानक किसी जानकारी के लिए मैंने उनके घर फोन किया। वो घर पर नहीं थे, इसकी सूचना मुझे उनकी पत्नी ने दी। फोन रखने से पहले बेहद शिष्टता के साथ उन्होंने कहा, 'साहेब के लिए कोई जरूरी संदेश?' उनके इस वाक्य ने मुझे चौंका दिया। इस वाक्य के गठन में जिस अभिजात्यवादी शब्द की भारी-भरकम उपस्थिति मुझे खली, वह था- 'साहेब'।

मैंने रिसीवर रखकर दिमाग के घोड़े दौड़ाए तो स्थिति को और बिगड़ता पाया। उनकी पत्नी से मैं काफी अरसा पहले मिल चुकी थी। वे एक शिक्षित महिला हैं और अपनी बोली के अतिरिक्त हिन्दी और अँगरेजी भाषा भी अच्छी तरह जानती हैं। बात करने का उनका अपना एक खास अंदाज है। उनसे हुई चंद मुलाकातों से वजनी आज की संक्षिप्त टेलीफोन वार्ता रही।

एक अतिआधुनिक शहर में रहने वाले आधुनिक परिवार की स्त्री के मुँह से निकला यह मध्यकालीन शब्द लगातार अखर रहा था। मैं सोच में पड़ी थी कि आधुनिकता के खोल में जड़ संस्कार कुंडली जमाकर अपनी शाश्वतता पर मुहर लगाते हुए आधुनिकता के तमाम मानकों पर तमाचे जड़ रहे हैं।

दिमाग में हथौड़े की तरह दनदनाते इस शब्द ने मेरे समक्ष उन सैकड़ों परिवार का सच्चा चित्र उपस्थित कर दिया जहाँ स्त्री आज भी गुलाम मानसिकता में जीने को विवश है। विडंबना यह भी है कि आज वह पालतू बनाए जाने की मुहिम में इस कदर अनुकूलित कर दी गई है कि यह दासता और दासतासूचक शब्दों की अभिव्यक्ति में उसे कोई गुरेज-परहेज नहीं।

'साहेब' शब्द का उच्चारण वह बेहद सहजता से करती हुई अपनी गुलामी को तमगे की तरह स्वीकार कर रही है। वह भी आज के समय में जब दिल्ली जैसे शहर में अधिकांश स्त्रियाँ मित्र की तरह पति का नाम लेते हुए उनके लिए पारंपरिक संबोधनों को तिलांजलि दे चुकी हैं। ऐसे में 'साहेब' शब्द का अखरना मेरे लिए वाजिब था।

'साहेब' शब्द ने जब अपने आतंक का दायरा बढ़ाना शुरू किया तो मैंने थिसारस उठाया। अर्थ की खोज में मेरा परिश्रम व्यर्थ नहीं गया। अँगरेज, ईश्वर, कुलीन पुरुष, प्रबंधक, महाप्रबंधक, मुखिया, सर्वोच्च सत्ताधारी जैसे शब्द मेरी निगाह में आए। धर्म और सत्ता के अनूठे समीकरणों की कलई भी खुलने लगी। दूसरे ये सभी शब्द आतंकित करने वाले हैं।

चाहे फिर वह साम्राज्यवाद की पृष्ठभूमि में अँगरेज जैसा शब्द हो, श्रम कानूनों को ताक पर धरे, 'हायर एंड फायर' की पॉलिसी के तहत किसी कंपनी का महाप्रबंधक हो या सुखद भविष्य की आस में अपने ग्रहों को ईश्वर से मनवाता कोई भक्त हो या फिर पुरुष वर्चस्ववादी सत्ता के मद में चूर घर का मुखिया हो, जिसे 'साहेब' शब्द सुनना अपनी साहबी हुकूमत के आतंक तले जी रहे लोगों की मानसिक दासता में परम सुख मिलता हो।