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ये हमारी कहानी नहीं हैं, हमारी कहानी कुछ और है, जिसे हमें खोजना है
जैसे-जैसे हम में संविधान के मूल्य और अधिकारों की समझ बढ़ने लगती है, हम अधिक बेहतर इंसान और बेहतर भारतीय नागरिक बनने की तरफ बढ़ने लगते हैं। एक व्यक्ति अगर अपने अधिकार और खासतौर से संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूक होगा तो वो बेहतर इंसान भी होगा। बेहतर इंसान और बेहतर नागरिक होना हर धर्म, संप्रदाय, जाति, वर्ग, लिंग सबसे से पहले आता है। इसके लिए हमें अपने नागरिक बोध के मूल में जाना होगा, जिन स्तंभों पर हमारे देश का निर्माण हुआ उसकी जड़ में जाना होगा— और इसके लिए संविधान से बेहतर दस्तावेज कुछ नहीं है।
अगर यह काम और इस बात को ठीक तरह से समझेंगे तो हमारी कहानियां बदलती जाएंगी। क्योंकि हमारी कहानी वो नहीं है, जो हम जानते है, अभी हमारे होने की काफी संभावनाएं शेष हैं। अब तक हमारे जीवन और हमारी पहचान की जो कहानियां रहीं हैं वो हमारी पुरानी मान्यताओं, हमारी रीतियों, परंपराओं और धारणाओं से बनी कहानियां हैं। जिस दिन हम अपनी मान्यताओं, परंपराओं और धारणाओं से छुटकारा पा लेंगे, उस दिन हमारी कहानी बदल जाएगी और हम अपने अब तक के बने हुए पैटर्न को भी तोड़ सकेंगे।
हम ये नहीं हैं जो दिख रहे हैं : विकास संवाद की पिछले नौ महीने की फैलोशिप की यात्रा में मुझे इस बात का अनुभव बखूबी हो रहा है। हालांकि यह बस यात्रा की शुरुआतभर है। लेकिन इतने समय की संवैधानिक मूल्यों को समझने, जानने और अपनाने की प्रैक्टिस में यह यकीन होने लगा है कि हम अपनी धारणाओं, पूर्वाग्रहों और मान्यताओं के आधार पर अब तक जो बन चुके हैं, असल में हम वो नहीं है। इस बात की अनुभूति ही अपने आप में एक उपलब्धि है। हालांकि यह कुल जमा नहीं है, बदलाव की यह प्रक्रिया सतत जारी है।
मान्यताओं और धारणाओं की जडों को खंगालना होगा : अभी इस प्रक्रिया में हमें कई चरणों से गुजरने की जरूरत है। क्योंकि हमने अब तक कि बनी हमारी भ्रमित करने वाली पहचान को ही अपना फायनल आउटकम मान लिया है। हम खुद को और दूसरों को भी इसी तय दायरे में रखकर पहचानते हैं। इसे बदलना होगा। इसी परिवर्तन के लिए हमें अपनी मान्यताओं, धारणाओं और पूर्वाग्रहों की जड़ों को खंगालना होगा।
कैसे आएगा यह परिवर्तन : हमारी अब तक स्थापित हो चुकी पहचान को बदलने के लिए हमें अपने पूर्वाग्रह, धारणाओं और मान्यताओं की पड़ताल कर यह देखना होगा कि क्या यही हम हैं, जो हमारे पूर्वज और परिजनों ने हमें बनाया है। विकास संवाद के प्रमुख सचिन कुमार जैन इस पड़ताल को आसान करने के कुछ उपाय बताते हैं। संवाद सत्र में उन्होंने बताया कि जब हमें किसी अंधेरे कमरे में जाने से डर लगता है तो हमारे परिजन हमें कहते हैं हनुमान चालीसा का पाठ करोगे तो भय नहीं होगा, हम पाठ करते हुए अंधेरे में जाते हैं और हमें कोई नुकसान नहीं होता। यहीं से हम मान लेते हैं कि हनुमान चालीसा की वजह से हमारी रक्षा हुई। लेकिन क्या यह असल में सच है? क्या हम उतने भी वैज्ञानिक नहीं हो सके कि अंधेरे में डरने से बचने के लिए किसी श्लोक या मंत्र का सहारा लेंगे। वे बताते हैं कि ठीक इसी तरह हमारे कई पैटर्न बने हुए हैं।
इसी तरह हमारे पैटर्न बन गए : दरअसल, हमारे पाप- पून्य के पैटर्न भी इसी तरह गढ़े गए। हमारे नैतिक और अनैतिक दृष्टिकोण भी इसी तरह आए। हमारी प्राथमिकताएं और हमारे लक्ष्य भी इन्हीं आधारों पर तय हुए। और नतीजा यह हुआ कि हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक आधार पर क्या बनना था और क्या बन गए। हम अपनी पहचान भूले नहीं, बल्कि असल पहचान कर ही नहीं पाए।
मूल्य परक समाज कैसे बने : हमें अपनी पहचान की खोज के लिए, उस सच्चे नागरिक को पहचानने के लिए और अपनी कहानी को बदलने के लिए मूल्य परक समाज की स्थापना करना होगी। यह समाज समता, समानता, बंधुता, गरिमा, न्याय और स्वतंत्रता से बनेगा। जब हम अपने नागरिक होने की शर्तों में इन तत्वों को शामिल करेंगे तो एक मूल्य परक समाज की स्थापना की शुरुआत होगी। इसके लिए हमें अपनी भाषा, आचार, विचार, धारणा आदि में बदलाव करना होगा। हम अपनों के साथ, दूसरों के साथ, साथ वालों के साथ और अजनबियों के साथ क्या और कैसा बर्ताव करते हैं यह देखना होगा। चाहे वे किसी भी धर्म, जाति और संप्रदाय या लिंग के हों। पिछड़े को आगे बढ़ाना, वंचितों और कम क्षमता वालों को न्याय दिलाना, पिछली या अंतिम कतार में खड़े नागरिकों के साथ गरिमापूर्ण बर्ताव करना, अवसरों की समानता का ख्याल रखना और बंधुता का भाव रखने की प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से अपनाना होगा। इस बात का ध्यान रखकर हमें अपने भीतर बदलाव लाने होंगे कि यह परिवर्तन पूरे समाज को दिशा देने वाला होगा और यह बदलाव व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए होगा। हर नागरिक अपने-अपने स्थान पर परिवर्तन लाएगा तो इसका व्यापक असर होगा।
भाषा से लेकर बाजारवाद की गुलामी तक सुदर्शन दृष्टि : ख्यात गांधी चिंतक और अर्थशास्त्री सुदर्शन आयंगर इस संविधान सत्र में न सिर्फ भाषा की उपयोगिता पर बल्कि बाजारवाद और इसकी गुलामी से आजाद होने की भी बेहद समृद्ध दृष्टि को उजागर करते हैं। हिंदी भाषा के उचित इस्तेमाल को लेकर सुदर्शन जी कहते हैं— हमारी भाषा को क्या हो गया है। हम यह नहीं कर पा रहे हैं कि हमें हिंदी बोलना है या अंग्रेजी। जब तक हम भाषा तय नहीं करेंगे, किसी नागरिक के साथ ही उचित व्यवहार नहीं कर पाएंगे। वे कहते हैं— कोई शब्द कठिन या सरल नहीं होता, शब्द परिचित या अपरिचित होता है। हिंदी में अंग्रेजी का इस्तेमाल हमारी मानसिक गुलामी को बयां करता है, हमें इससे बचना चाहिए। जब हमारी हिंदी इतनी समृद्ध है तो फिर दूसरी भाषा का इस्तेमाल क्यों होना चाहिए।
गांधी और उनका ग्राम स्वराज्य : गांधी और उनके ग्राम स्वराज्य पर सुदर्शन जी बहुत गहरी दृष्टि डालते हैं। वे ग्राम संस्कृति को असल संस्कृति मानते हैं। सच भी है, शहरों ने तो अपनी संस्कृति खो दी है। गांव में आज भी बंधुता का भाव है, सभी लोग एक दूसरे से परिचित हैं। शहरों में वो बात नहीं। यहां पडोसी भी नाम नहीं जानता। ऐसे में बंधुता का भाव कितना अहम हो जाता है। सुदर्शन जी ने वर्तमान शिक्षा, राजनीति, अच्छे नागरिक के तत्व, गांधी और अंबेडकर पर भी बात की। वे कहते हैं कि हमें कर काले रंग से सफेद रंग की तरफ जाना होगा, तभी हम बेहतर समाज निर्माण कर सकेंगे।
बाजारवाद और उसकी गुलामी : आज हम अपने चारों तरफ देखें तो पाएंगे कि बाजारवाद कितना ज्यादा हावी हो गया है। हमारे देश में Soil इकॉनोमी होना चाहिए थी तो उसकी जगह आज हम Oil इकॉनोमी हो गए हैं। हमारा पूरा जीवन तेल पर निर्भर है। बाजार हमें कंट्रोल कर रहा है। ब्रश-पेस्ट से लेकर कपड़े और कार तक सबकुछ कंट्रोल हो रहा है। इसमें मूल्यपरक समाज कहां बचा हुआ है। जो देश जितना ज्यादा कचरा पैदा कर रहा है, उसे उतना ज्यादा विकसित माना जा रहा है। सुदर्शन आयंगर इसे हिंसक अर्थव्यवस्था मानते हैं। महात्मा गांधी ने बाजार की इस साजिश को बहुत पहले भांप लिया था, इसलिए उन्होंने तात्विक बनने की बात कही। यानी रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा एक नागरिक को और क्या चाहिए। गांधी ने इसीलिए ग्राम स्वराज की बात की। सुदर्शन जी गांधी की बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि बाजार का इस्तेमाल होना बंद कर दीजिए, कंपनियां अपने आप बंद हो जाएगीं। नहीं तो हमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसके लिए हमें हमारे अधिकारों, मूल्यों के प्रति जागरूक होकर इसके खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा, नहीं तो हमारी सरकारों ने तो सिगरेट के पैकेट पर डिस्क्लैमर लिखकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है। अब अगर हम सिगरेट पीते हैं तो इसकी जिम्मेदारी हमारी खुद की है।
बदलाव की कहानियां शुरू हुईं : विकास संवाद के आयोजन में फैलो साथी ने जिस तरह से अपने अपने क्षेत्र में बदलाव की कहानियां सुनाई उससे उम्मीद जगती है कि हम कोशिश करें तो अपने स्तर पर परिवर्तन ला सकते हैं। फैलो साथी हिमालया सिंह, आदित्य श्रीवास्तव, पूनम मसीह, पूजा चौधरी, निदा, चक्रेश महोबिया और शिशिर आदि साथियों ने अपने क्षेत्र में काम कर के कई जगह धारणाओं को बदला है, परिवर्तन की बयार की उम्मीद जगाई है, यह परिवर्तन की कहानियां उत्साहित करने वाली है। बदलाव की इन कहानियों में सामने आया कि कैसे छोटी- छोटी कोशिशों से आदिवासी, वंचित वर्ग के लिए काम किया जा रहा है और वहां चीजें बदल रही हैं। कुपोषण हो, नशा मुक्ति, बाल विवाह, गर्भवती महिलाओं की समस्याएं, ग्रामसभा की स्थापनाएं या ग्रामसभा के माध्यम से स्थानीय समस्याओं के समाधान की बात हो या तलाक ए बिद्दत और तलाक़ ए सुन्नत जैसे मुद्दों की बात हो। यह जानकर उम्मीद जागी है कि कैसे संवैधानिक मूल्य और अधिकार के प्रति जागरूक होकर, उन्हें अपनाकर बदलाव लाया जा सकता है और कहानियों को बदला जा सकता है। भोपाल में आयोजित इस तीन दिवसीय आयोजन में गांधीवादी चितंक चिन्मय मिश्र, लेखक- पत्रकार और विकास संवाद के संयोजक पंकज शुक्ला, विकास संवाद की पूजा सिंह, पत्रकार और अभिभाषक फैलो साथी और मेंटर्स की गरिमामय उपस्थिति थी।
अगर यह काम और इस बात को ठीक तरह से समझेंगे तो हमारी कहानियां बदलती जाएंगी। क्योंकि हमारी कहानी वो नहीं है, जो हम जानते है, अभी हमारे होने की काफी संभावनाएं शेष हैं। अब तक हमारे जीवन और हमारी पहचान की जो कहानियां रहीं हैं वो हमारी पुरानी मान्यताओं, हमारी रीतियों, परंपराओं और धारणाओं से बनी कहानियां हैं। जिस दिन हम अपनी मान्यताओं, परंपराओं और धारणाओं से छुटकारा पा लेंगे, उस दिन हमारी कहानी बदल जाएगी और हम अपने अब तक के बने हुए पैटर्न को भी तोड़ सकेंगे।
हम ये नहीं हैं जो दिख रहे हैं : विकास संवाद की पिछले नौ महीने की फैलोशिप की यात्रा में मुझे इस बात का अनुभव बखूबी हो रहा है। हालांकि यह बस यात्रा की शुरुआतभर है। लेकिन इतने समय की संवैधानिक मूल्यों को समझने, जानने और अपनाने की प्रैक्टिस में यह यकीन होने लगा है कि हम अपनी धारणाओं, पूर्वाग्रहों और मान्यताओं के आधार पर अब तक जो बन चुके हैं, असल में हम वो नहीं है। इस बात की अनुभूति ही अपने आप में एक उपलब्धि है। हालांकि यह कुल जमा नहीं है, बदलाव की यह प्रक्रिया सतत जारी है।
मान्यताओं और धारणाओं की जडों को खंगालना होगा : अभी इस प्रक्रिया में हमें कई चरणों से गुजरने की जरूरत है। क्योंकि हमने अब तक कि बनी हमारी भ्रमित करने वाली पहचान को ही अपना फायनल आउटकम मान लिया है। हम खुद को और दूसरों को भी इसी तय दायरे में रखकर पहचानते हैं। इसे बदलना होगा। इसी परिवर्तन के लिए हमें अपनी मान्यताओं, धारणाओं और पूर्वाग्रहों की जड़ों को खंगालना होगा।
कैसे आएगा यह परिवर्तन : हमारी अब तक स्थापित हो चुकी पहचान को बदलने के लिए हमें अपने पूर्वाग्रह, धारणाओं और मान्यताओं की पड़ताल कर यह देखना होगा कि क्या यही हम हैं, जो हमारे पूर्वज और परिजनों ने हमें बनाया है। विकास संवाद के प्रमुख सचिन कुमार जैन इस पड़ताल को आसान करने के कुछ उपाय बताते हैं। संवाद सत्र में उन्होंने बताया कि जब हमें किसी अंधेरे कमरे में जाने से डर लगता है तो हमारे परिजन हमें कहते हैं हनुमान चालीसा का पाठ करोगे तो भय नहीं होगा, हम पाठ करते हुए अंधेरे में जाते हैं और हमें कोई नुकसान नहीं होता। यहीं से हम मान लेते हैं कि हनुमान चालीसा की वजह से हमारी रक्षा हुई। लेकिन क्या यह असल में सच है? क्या हम उतने भी वैज्ञानिक नहीं हो सके कि अंधेरे में डरने से बचने के लिए किसी श्लोक या मंत्र का सहारा लेंगे। वे बताते हैं कि ठीक इसी तरह हमारे कई पैटर्न बने हुए हैं।
मूल्य परक समाज कैसे बने : हमें अपनी पहचान की खोज के लिए, उस सच्चे नागरिक को पहचानने के लिए और अपनी कहानी को बदलने के लिए मूल्य परक समाज की स्थापना करना होगी। यह समाज समता, समानता, बंधुता, गरिमा, न्याय और स्वतंत्रता से बनेगा। जब हम अपने नागरिक होने की शर्तों में इन तत्वों को शामिल करेंगे तो एक मूल्य परक समाज की स्थापना की शुरुआत होगी। इसके लिए हमें अपनी भाषा, आचार, विचार, धारणा आदि में बदलाव करना होगा। हम अपनों के साथ, दूसरों के साथ, साथ वालों के साथ और अजनबियों के साथ क्या और कैसा बर्ताव करते हैं यह देखना होगा। चाहे वे किसी भी धर्म, जाति और संप्रदाय या लिंग के हों। पिछड़े को आगे बढ़ाना, वंचितों और कम क्षमता वालों को न्याय दिलाना, पिछली या अंतिम कतार में खड़े नागरिकों के साथ गरिमापूर्ण बर्ताव करना, अवसरों की समानता का ख्याल रखना और बंधुता का भाव रखने की प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से अपनाना होगा। इस बात का ध्यान रखकर हमें अपने भीतर बदलाव लाने होंगे कि यह परिवर्तन पूरे समाज को दिशा देने वाला होगा और यह बदलाव व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए होगा। हर नागरिक अपने-अपने स्थान पर परिवर्तन लाएगा तो इसका व्यापक असर होगा।
भाषा से लेकर बाजारवाद की गुलामी तक सुदर्शन दृष्टि : ख्यात गांधी चिंतक और अर्थशास्त्री सुदर्शन आयंगर इस संविधान सत्र में न सिर्फ भाषा की उपयोगिता पर बल्कि बाजारवाद और इसकी गुलामी से आजाद होने की भी बेहद समृद्ध दृष्टि को उजागर करते हैं। हिंदी भाषा के उचित इस्तेमाल को लेकर सुदर्शन जी कहते हैं— हमारी भाषा को क्या हो गया है। हम यह नहीं कर पा रहे हैं कि हमें हिंदी बोलना है या अंग्रेजी। जब तक हम भाषा तय नहीं करेंगे, किसी नागरिक के साथ ही उचित व्यवहार नहीं कर पाएंगे। वे कहते हैं— कोई शब्द कठिन या सरल नहीं होता, शब्द परिचित या अपरिचित होता है। हिंदी में अंग्रेजी का इस्तेमाल हमारी मानसिक गुलामी को बयां करता है, हमें इससे बचना चाहिए। जब हमारी हिंदी इतनी समृद्ध है तो फिर दूसरी भाषा का इस्तेमाल क्यों होना चाहिए।
गांधी और उनका ग्राम स्वराज्य : गांधी और उनके ग्राम स्वराज्य पर सुदर्शन जी बहुत गहरी दृष्टि डालते हैं। वे ग्राम संस्कृति को असल संस्कृति मानते हैं। सच भी है, शहरों ने तो अपनी संस्कृति खो दी है। गांव में आज भी बंधुता का भाव है, सभी लोग एक दूसरे से परिचित हैं। शहरों में वो बात नहीं। यहां पडोसी भी नाम नहीं जानता। ऐसे में बंधुता का भाव कितना अहम हो जाता है। सुदर्शन जी ने वर्तमान शिक्षा, राजनीति, अच्छे नागरिक के तत्व, गांधी और अंबेडकर पर भी बात की। वे कहते हैं कि हमें कर काले रंग से सफेद रंग की तरफ जाना होगा, तभी हम बेहतर समाज निर्माण कर सकेंगे।
बाजारवाद और उसकी गुलामी : आज हम अपने चारों तरफ देखें तो पाएंगे कि बाजारवाद कितना ज्यादा हावी हो गया है। हमारे देश में Soil इकॉनोमी होना चाहिए थी तो उसकी जगह आज हम Oil इकॉनोमी हो गए हैं। हमारा पूरा जीवन तेल पर निर्भर है। बाजार हमें कंट्रोल कर रहा है। ब्रश-पेस्ट से लेकर कपड़े और कार तक सबकुछ कंट्रोल हो रहा है। इसमें मूल्यपरक समाज कहां बचा हुआ है। जो देश जितना ज्यादा कचरा पैदा कर रहा है, उसे उतना ज्यादा विकसित माना जा रहा है। सुदर्शन आयंगर इसे हिंसक अर्थव्यवस्था मानते हैं। महात्मा गांधी ने बाजार की इस साजिश को बहुत पहले भांप लिया था, इसलिए उन्होंने तात्विक बनने की बात कही। यानी रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा एक नागरिक को और क्या चाहिए। गांधी ने इसीलिए ग्राम स्वराज की बात की। सुदर्शन जी गांधी की बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि बाजार का इस्तेमाल होना बंद कर दीजिए, कंपनियां अपने आप बंद हो जाएगीं। नहीं तो हमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसके लिए हमें हमारे अधिकारों, मूल्यों के प्रति जागरूक होकर इसके खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा, नहीं तो हमारी सरकारों ने तो सिगरेट के पैकेट पर डिस्क्लैमर लिखकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है। अब अगर हम सिगरेट पीते हैं तो इसकी जिम्मेदारी हमारी खुद की है।
बदलाव की कहानियां शुरू हुईं : विकास संवाद के आयोजन में फैलो साथी ने जिस तरह से अपने अपने क्षेत्र में बदलाव की कहानियां सुनाई उससे उम्मीद जगती है कि हम कोशिश करें तो अपने स्तर पर परिवर्तन ला सकते हैं। फैलो साथी हिमालया सिंह, आदित्य श्रीवास्तव, पूनम मसीह, पूजा चौधरी, निदा, चक्रेश महोबिया और शिशिर आदि साथियों ने अपने क्षेत्र में काम कर के कई जगह धारणाओं को बदला है, परिवर्तन की बयार की उम्मीद जगाई है, यह परिवर्तन की कहानियां उत्साहित करने वाली है। बदलाव की इन कहानियों में सामने आया कि कैसे छोटी- छोटी कोशिशों से आदिवासी, वंचित वर्ग के लिए काम किया जा रहा है और वहां चीजें बदल रही हैं। कुपोषण हो, नशा मुक्ति, बाल विवाह, गर्भवती महिलाओं की समस्याएं, ग्रामसभा की स्थापनाएं या ग्रामसभा के माध्यम से स्थानीय समस्याओं के समाधान की बात हो या तलाक ए बिद्दत और तलाक़ ए सुन्नत जैसे मुद्दों की बात हो। यह जानकर उम्मीद जागी है कि कैसे संवैधानिक मूल्य और अधिकार के प्रति जागरूक होकर, उन्हें अपनाकर बदलाव लाया जा सकता है और कहानियों को बदला जा सकता है। भोपाल में आयोजित इस तीन दिवसीय आयोजन में गांधीवादी चितंक चिन्मय मिश्र, लेखक- पत्रकार और विकास संवाद के संयोजक पंकज शुक्ला, विकास संवाद की पूजा सिंह, पत्रकार और अभिभाषक फैलो साथी और मेंटर्स की गरिमामय उपस्थिति थी।
