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हिन्दी का 'रोमनीकरण' घातक है...

बुधवार,सितम्बर 2, 2015
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देवनागरी लिपि में न केवल संस्कृत और हिन्दी लिखी जाती है, बल्कि मराठी और नेपाली को भी देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। देवनागरी की वैज्ञानिक प्रणाली के कारण उसकी लोकप्रियता उर्दू और कोंकणी में भी है और उर्दू व कोंकणी की अनेक किताबें और अख़बार भी ...
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सातवें दशक के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित एल्विन टॉफलर की पुस्तक 'तीसरी लहर' के अध्याय 'बड़े राष्ट्रों के विघटन' को पढ़ते हुए किसी को भी कोई कल्पना तक नहीं थी कि एक दिन रूस में गोर्बाचोव नामक एक करिश्माई नेता प्रकट होगा और 'पेरोस्त्रोइका' तथा ...
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वरिष्ठ पत्रकार और सुपरिचित तकनीकविद् बालेन्दु शर्मा दाधीच ने हिन्दी में काम करने के लिए रोमन भाषा को अपनाए जाने के लेखक चेतन भगत के सुझाव को अव्यावहारिक और अनावश्यक बताते हुए इसकी आलोचना की है। हिन्दी पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के संपादक श्री दाधीच ने ...
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नादान चेतन भगत की नादान समझ!

मंगलवार,जनवरी 13, 2015
अंग्रेजी भाषा में उपन्यास आदि लिखने वाले एक नौजवान (चेतन भगत) ने, जो हिंदी प्रेमी भी है, एक लेख लिखा है। वह लेख हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में छपा है। उस लेख में कहा गया है कि सारे हिंदी भाषी रोमन लिपि अपना लें। अपनी देवनागरी छोड़ दें। यह लेख इतना ...
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एक ओर चेतन भगत हिन्दी अखबारों में छपने के लिए लालायित रहते हैं, दूसरी ओर वे देवनागरी के स्थान पर रोमन अपनाने की सलाह देते हैं। वे खुद क्यों नहीं देवनागरी को अपना लेते? वे अंग्रेजी आलेखों को हिन्दी में अनुवाद करके हिन्दी अखबारों में छपवाते हैं। ...
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लेखक चेतन भगत का मानना है कि हिन्दी को आगे बढ़ाना है तो देवनागरी के स्थान पर रोमन को अपना लिया जाना चाहिए। क्या यह भाषा की हत्या की साजिश नहीं है? हिन्दी भाषा में अंगरेजी शब्दों का समावेश तो मान्य हो चुका है मगर लिपि को ही नकार देना क्या भाषा को ...
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जिस हिन्दी की महत्ता को हम इतने दिनों बाद भी नहीं पहचान पाए हैं उसकी खासियत को हमारे महापुरुषों ने बहुत पहले ही जान लिया था। आइए जानते हैं कि हिन्दी के बारे में क्या थे उनके विचार
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हिन्दी भाषा पर विभिन्न महापुरुषों के विचार वेबदुनिया के इस हिन्दी चैनल पर!
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हमारा दिल चाहता है हिन्दी में पढ़ें, आगे बढ़ें, पर माहौल इसके विपरीत बनता जा रहा है। प्रस्तुत है हिन्दी की वकालत करने वाले देश के उन नामचीन लोगों के विचार, जिनके प्रयासों से आज तक हिन्दी बची है और आगे भी बची रहेगी।
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दो हाथ भी कैसे उठ गए?

बुधवार,अगस्त 7, 2013
'वी द पीपुल’ कार्यक्रम में 'अंग्रेज़ी हैं हम?’ चर्चा के दौरान बरखा दत्त ने स्टूडियो में आए विशेषज्ञों और ऑडिएंस में बैठे युवाओं से पूछा कि कितने लोग हिन्दी अख़बार पढ़ते हैं? सात विशेषज्ञों में से चार-पांच के हाथ उठे और दो उठे सौ-सवा-सौ युवाओं के बीच ...
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मैं एनडीटीवी के एक टॉक शो में गया था, जिसका शीर्षक था ‘अंग्रेज़ी हैं हम?’ रोमन में लिखा था। वह तो कोई बात नहीं क्योंकि शो ही अंग्रेज़ी का है! ‘अंग्रेज़ी हैं हम?’ में प्रश्नवाचक चिन्ह लगाकर थोड़ी राहत तो दी कि अभी ये सवाल ही है, शायद हम पूरी तरह से ...
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साहित्य समाज का दर्पण है यह तो हम सभी ने सुना है। लेकिन साहित्य का सृजन करते हुए एक साहित्यकार साहित्य के बारे में क्या सोचता है यह जानना बेहद दिलचस्प है। आइए जानते हैं साहित्य क्या है महापुरुषों की नजर में-
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क्या हिन्दी और हिंदी यह 'दो' शब्द उच्चारण के स्तर पर एक हो सकते हैं? क्या हंसी और हँसी या मां और माँ शब्दों में कोई अंतर नहीं है? पत्रकारिता बिना भाषा के अपने आयामों को स्पर्श नहीं कर सकती इसलिए पत्रकारिता के लिए तो भाषा का महत्व असीम है लेकिन भाषा ...
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मातृभाषा हिन्दी के उत्थान के प्रयास हर घर में होना चाहिए। हिन्दी के प्रति गंभीरता और सम्मान जरूरी है तभी हम अपनी मातृभाषा की लाज बचा पाएंगे। विदेशी लोग हिन्दी को अपना रहे हैं जबकि हम खुद इससे जी चुरा रहे हैं। जरूरत हमारे नजरिए को बदलने की है। ये ...
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जानिए हिन्दी पर विभिन्न महापुरुषों के विचार! कवि अशोक चक्रधर कहते हैं,'हिन्दी के लिए जितना किया जाना चाहिए था, वह नहीं हो पा रहा, इसकी मुझे चिंता है। मैं चाहता हूं कि हिन्दी नई पीढ़ी तक पहुंचे, हालांकि इसमें संदेह नहीं है कि हिन्दी बदल रही है और ...
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