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Written By WD

असग़र गोंडवी की ग़ज़लें

असग़र गोंडवी की ग़ज़लें -
1.
हम एक बार जलव-ए-जानाना देखते
फिर काबा देखते न सनम खाना देखते

गिरना वो झूम झूम के रिन्दान-ए-मस्त का
फिर पा-ए-खुम पे सजदा-ए-मस्ताना देखते

इक शोला और शम्मा से बढ़कर है रक़्स में
तुम चीर कर तो सीना-ए-परवाना देखते

रिन्दों को सिर्फ़ नश्शा-ए-बेरंग से ग़रज़
ये शीशा देखते हैं न पैमाना देखते

बिखरी हुई हो ज़ुल्फ़ भी उस चश्म-ए-मस्त पर
हल्का सा अब्र भी सर-ए-मैखाना देखते

मिलती कहीं कहीं पे रहेमुस्तक़ीम भी
एह्ल-ए-तरीक़-ए-लग़ज़िश-ए-मस्ताना देखते
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2.

आलाम-ए-रोज़गार को आसाँ बना दिया
जो ग़म हुआ उसे ग़म-ए-जानाँ बना दिया

मैं कामयाब-ए-दीद भी, महरूम-ए-दीद भी
जलवों के अज़दहाम ने हैराँ बना दिया

यूँ मुस्कुराए जान सी कलियों मे पड़ गई
यूँ लब कुशा हुए कि गुलिस्ताँ बना दिया

कुछ शोरिशों की नज़्र हुआ खून-ए-आशिक़ाँ
कुछ जम के रह गया उसे 'हिरमाँ' बना दिया-----मायूसी

ऎ शेख वो 'बसीत' हक़ीक़त है कुफ़्र की-------फैली हुई
कुछ क़ैद-ए-रस्म ने जिसे ईमाँ बना दिया

कुछ आग दी हवस ने तो, तामीर-ए-इश्क़ की
जब खाक कर दिया उसे इरफ़ाँ बना दिया

क्या, क्या 'क़यूद' देह्र में हैं एहलेहोश के ------पाबंदियाँ
ऐसी फ़िज़ा-ए-साफ़ को ज़िन्दाँ बना दिया

इक बर्क़ थी ज़मीर में फ़ितरत के मोजज़न
आज उसको हुस्न-ओ-इश्क़ का सामाँ बना दिया

मजबूरी-ए-हयात में राज़-ए-हयात है
ज़िन्दाँ को मैंने रोज़न-ए-ज़िन्दाँ बना दिया

वो शोरिशें निज़ाम-ए-जहाँ जिन के दम से है
जब मुख्तसर किया, उन्हें इंसा बना दिया

हम उस निगाह-ए-नाज़ को समझे थे नेशतर
तुमने तो मुस्कुरा के रग-ए-जाँ बना दिया

कहते हैं इक फ़रेब-ए-मुसलसल है ज़िन्दगी
उसको भी वक़्फ-ए-हसरत-ओ-हिरमाँ बना दिया

आलम से बेखबर भी हूँ, आलम में भी हूँ मैं
साक़ी ने इस मक़ाम को आसाँ बना दिया

उस हुस्न-ए-कार-ओ-बार को मस्तों से पूछिए
जिसको फ़रेब-ए-होश ने इसयाँ बना दिया

3.
नज़र उस हुस्न पर ठहरे तो आखिर किस तरह ठहरे
कभी जो फूल बन जाए कभी रुखसार हो जाए

चला जाता हूँ हंसता खेलता मौज-ए-हवादिस से
अगर आसानियाँ हों ज़िन्दगी उशवार हो जाए

4.
सारा हुसूल इश्क़ की नाकाइयों मे है
जो उम्र रायगाँ है वही रायगाँ नहीं
होता है राज़-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत इन्हीं से फ़ाश
आँखें ज़ुबाँ नहीं हैं मगर बेज़ुबाँ नहीं

5. वो नग़मा बुलबुल-ए-रंगींनवा इक बार हो जाए
कली की आँख लग जाए चमन बेदार हो जाए

सहर लाएगी क्या पैग़ाम-ए-बेदारी शबिस्ताँ में
नक़ाब-ए-रुख उलट दो खुद सहर बेदार हो जाए

नज़र उस हुस्न पर ठहरे तो आखिर किस तरह ठहरे
कभी खुद फूल बन जाए कभी रुखसार हो जाए

चला जाता हूँ हँसता खेलता मौज-ए-हवादिस से
अगर आसानियाँ हों ज़िन्दगी दुश्वार हो जाए

6. महोअंजुम में भी अंदाज़ हैं पैमानों के
शब को दर बन्द नहीं होते हैं मयखानों के

हश्र में नामा-ए-आमाल की पुर्शिश है उधर
इस तरफ़ हाथ में टुकड़े हैं गरीबानों के

बुझ गई कल जो सर-ए-बज़्म वही शम्मा न थी
शम्मा तो आज भी सीने में है परवानों के