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उत्तर प्रदेश का मतदाता मौन है

Updated: बुधवार, 22 फ़रवरी 2017 (19:06 IST)
क्रांतिकारी कवि धूमिल ने जिस उत्तर प्रदेश को भदेस बताया है, लगता है वह भदेसपन अब गंगा-यमुना की माटी से बना यह सूबा खो रहा है। इस सूबे की एक खासियत रही है। स्थानीय यात्राओं के वक्त लोकल रेलों और बसों में बैठते ही लोग दो काम करते रहे हैं। पहला यह कि साथ बैठे यात्री से परिचय पूछना, अपनी बताना और जान-पहचान होते ही सुर्ती-खैनी का आदान-प्रदान करना, इसके साथ खाना-पीना, फिर दूसरा काम करते हैं राजनीतिक चर्चा, जो स्थानीय से होते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच जाती है।
चूंकि इन पंक्तियों का लेखक भी इसी इलाके का निवासी रहा है, लिहाजा चुनावी चकल्लस की असल तस्वीर जानने के लिए बलिया से वाराणसी तक की यात्रा सवारी रेलगाड़ी से की। इस यात्रा में कहीं से भी लगा कि राजनीति में ही जीने-मरने की फितरत वाले इस इलाके में विधानसभा का चुनाव हो रहा है। ऐसा नहीं कि लोग दिल्ली मेट्रो के यात्रियों की तरह चुपचाप बैठे थे, बल्कि बातचीत का विषय घर-परिवार, शादी-ब्याह, खेती-बाड़ी आदि थे, चुनावी चकल्लस सिरे से गायब नजर आया।
 
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या बकझक को ही अपनी पहचान मानने वाला पूर्वांचल के मतदाता की दिलचस्पी मतदान में घट रही है या वह अब समझदार हो गया है। पिछले चुनावों की तुलना में लगातार बढ़ता मतदान इस अवधारणा को खारिज करने के लिए काफी है कि मतदान में वोटरों की दिलचस्पी घटी है, हां, यह माना जा रहा है कि अब मतदाता पहले की बजाय कहीं ज्यादा मैच्योर हो गया है। अब उसका रणनीतिक मतदान में भरोसा बढ़ा है। इसलिए अब उसकी थाह लगा पाना आसान नहीं रहा। ऐसे में मौजूदा मतदान का अंदाजा लगाना भी आसान नहीं रहा। इस वजह से इस बार के उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों के आकलन में अगर बड़े-बड़े पंडित भी फेल हो जाएं तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
 
उत्तर प्रदेश में अगड़ी जातियों के मतदाताओं की पहचान ज्यादा बोलने वाले की रही है। पहले वह दबंगई भी दिखाता रहा है। पिछड़ा और दलित वाद के उभार के बाद इसका उसे खामियाजा भी भुगतना पड़ता रहा है। लेकिन इस बार वह औरों की तुलना में कुछ ज्यादा ही चुप है। सोशल मीडिया की गहमागहमी को छोड़ दें तो दूसरे तबके के वोटर भी चुनाव को लेकर अपनी रणनीति को साफ करते नजर नहीं आ रहे। ऐसे में 11 मार्च को आने वाले नतीजे राष्ट्रीय मीडिया द्वारा पैदा की गई अपेक्षा के उलट आएं तो हमें आश्चर्यचकित होना नहीं चाहिए। (पूर्वी उत्तर प्रदेश से लौटकर) 

लेखक के बारे में
उमेश चतुर्वेदी
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