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UNGA80 : लेबनानी सह-अस्तित्व मॉडल का समर्थन करने का आग्रह

United Nations General Assembly Session
लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ़ आऊन ने कहा है कि एक ऐसे क्षेत्र में जहाँ लोग धर्म के नाम पर हत्याएँ करते हैं और लोग मारे जाते हैं, ऐसे में उनका देश, सह-अस्तित्व की गारंटी देने वाले संविधान का एक अद्वितीय मॉडल पेश करता है। उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से, लेबनान के इस समावेशी मॉडल का समर्थन का आग्रह भी किया।
 
लेबनानी राष्ट्रपति ने मंगलवार को यूएन महासभा के 80वें सत्र की जनरल डिबेट को सम्बोधित करते हुए कहा, मैं आज आपके सामने शान्ति, विकास और मानवाधिकारों की बात कर रहा हूँ, जबकि मेरे कुछ साथी नागरिक, रोज़ाना मौत का सामना कर रहे हैं। मेरे देश के कुछ हिस्से क़ब्ज़े में हैं और मेरी मातृभूमि वे मेरे देश के लोग निरन्तर अनिश्चितता में जीवन जी रहे हैं।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि धार्मिक पहचान को लेकर वैश्विक टकरावों के बीच, लेबनान एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभर कर सामने आता है जहाँ ईसाई और मुसलमान एक ऐसे संविधान के तहत सह-अस्तित्व में जीवन जी रहे हैं, जो दोनों समुदायों को समान प्रतिनिधित्व की गारंटी देता है।
 
लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ़ आऊन ने स्वर्गीय पोप जॉन पॉल द्वितीय के एक वक्तव्य का हवाला दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि लेबनान एक देश से कहीं बढ़कर है, यह पूर्व और पश्चिम के लिए स्वतंत्रता और बहुलता का सन्देश है। उन्होंने कहा कि एक ऐसे क्षेत्र में जहाँ लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण मार-काट करते हैं, और मारे जाते हैं, लेबनान एक अद्वितीय और अपूरणीय मॉडल के रूप में उभर कर सामने आता है। 
एक ऐसा मॉडल जिसने मुझे, एक अरब लेबनानी के रूप में, पूर्वी एशिया से लेकर योरोप के तटों तक, एकमात्र ईसाई राष्ट्राध्यक्ष के रूप में सेवा करने का अवसर दिया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, अगर सह-अस्तित्व का यह मॉडल टूट जाता है, तो दुनिया भर में हम इस अनुभव को और कहाँ दोहरा सकते हैं? उन्होंने इसी पृष्ठभूमि में अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से, लेबनान के भूभाग को मुक्त कराने और देश की अनन्य सम्प्रभुता को सुरक्षित रखने के लिए, दृढ़ रुख़ अपनाने का आग्रह किया।
उन्होंने अपील करते हुए कहा, लेबनान को अकेला नहीं छोड़ें। जोसेफ़ आऊन ने इसराइली आक्रमण को तत्काल रोकने, लेबनान के सभी भूभाग से क़ाबिज़ सेनाओं की पूरी तरह से हटाने, और हमारे बन्धकों की रिहाई का आहवान किया। उन्होंने ग़ाज़ा में विध्वंस को तुरन्त रोकने के नैतिक, मानवीय और राजनैतिक दायित्व पर भी ज़ोर दिया।
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