हक्कानी नेटवर्क को काबुल की कमान, क्‍या होगा भारत पर असर...

पुनः संशोधित शनिवार, 21 अगस्त 2021 (21:03 IST)
अफगानिस्तान पर खूंखार ता‍लिबान के कब्‍जे के बाद उसने राजधानी का जिम्मा अपने एक सहयोगी आतंकी गुट को सौंपा है। कहा जाता है कि हक्‍कानी नेटवर्क से भी ज्‍यादा खूंखार है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान से सीधा संबंध होने की वजह से भी यह आतंकी संगठन अब के लिए बड़ी चिंता का कारण बन गया है।
अफगानिस्तान पर अपने कब्‍जे के बाद तालिबान ने राजधानी काबुल का जिम्मा अपने एक सहयोगी आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क को सौंपा है। हक्कानी संगठन का नाम कई आतंकी हमलों में शामिल रहा है, जिनमें में से 2 घटनाएं भारतीय दूतावास पर बड़े आत्मघाती हमले से जुड़ी हैं।

वहीं दूसरी ओर इसका पाकिस्तान से सीधा संबंध होने की वजह से भी यह आतंकी संगठन अब भारत के लिए बड़ी चिंता का कारण बन गया है। हक्कानी की पहचान पहली बार 1980 के दशक में मुजाहिद्दीनों के सोवियत सेना के खिलाफ लड़े जा रहे युद्ध के दौरान हुई थी।

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने पहली बार अफगानिस्तान में 2 आतंकी संगठनों को साथ लाने में भूमिका निभाई। इसी के बाद से हक्कानी नेटवर्क और तालिबान साथ बने हुए हैं।अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ जंग हो या गृहयुद्ध, हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान से लगातार मदद मिलती रही।
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कुछ खाड़ी देश भी इस क्रूर संगठन की फंडिंग में शामिल रहे हैं। हक्कानी नेटवर्क का नाम अफगानिस्तान में कई बड़े हमलों में शामिल रहा है। इनमें सैकड़ों की संख्या में अफगान नागरिक, अमेरिका और अन्य देशों की सेनाओं के जवानों और सरकारी अफसरों की मौत हुई।
इस संगठन में 10 हजार से लेकर 15 हजार आतंकी होने का अनुमान है। वर्तमान में हक्कानी नेटवर्क को सिराजुद्दीन संभाल रहा है और अगर अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनती है, तो सिराज को उपराष्ट्रपति भी बनाया जा सकता है। इसके अलावा सिराज के छोटे भाई अनस हक्कानी को काबुल की जिम्मेदारी सौंपी गई है।



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