जानिए सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्न

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(7) अमरसिंह

राजशेखर की काव्यमीमांसा के अनुसार ने उज्जयिनी में काव्यकार परीक्षा उत्तीर्ण की थी। संस्कृत का सर्वप्रथम कोश अमरसिंह का 'नामलिंगानुशासन' है, जो उपलब्ध है तथा 'अमरकोश' के नाम से प्रसिद्ध है। 'अमरकोश' में के नाम का उल्लेख आता है। मंगलाचरण में बुद्धदेव की प्रार्थना है और कोश में बौद्ध शब्द विशेषकर महायान संप्रदाय के पाए जाते हैं। अतएव यह निश्चित है कि कोश की रचना कालिदास और बुद्धकाल के बाद हुई होगी। अमरकोश पर 50 टीकाएं उपलब्ध हैं। यही उसकी महत्ता का प्रमाण है। अमरकोश से अनेक वैदिक शब्दों का अर्थ भी स्पष्ट हुआ है। डॉ. कात्रे ने इन वैदिक शब्दों की सूची अपने लेख 'अमरकोशकार की देन' में दी है।
बु्द्ध गया के अभिलेख का उल्लेख कीर्न महोदय ने वृहज्जातक की भूमिका में किया है। अभिलेख में लिखा गया है कि विक्रमादित्य संसार के प्रसिद्ध राजा हैं। उनकी सभा में नव विद्वान हैं, जो नवरत्न के नाम से जाने जाते हैं। उनमें अमरदेव नाम का विद्वान राजा का सचिव है। वह बहुत बड़ा विद्वान है और राजा का प्रिय पात्र है।

एक प्रकीर्ण पद्य में अमरसिंह को शबर स्वामी की शूद्र पत्नी का पुत्र कहा गया है। गणक कालिदास ने विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में अमर का नामोल्लेख किया है। ज्योतिर्विदाभरण के 22वें अध्याय के 8वें श्लोक में अमर को कवि कहा गया है। उनका कोश संस्कृत साहित्य का अनुपम कोश है।







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