Shri Krishna 31 July Episode 90 : अर्जुन जब यमलोक से निराश होकर लौट जाता है तब टूटता है अहंकार

yama dwitiya 2019
अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: शुक्रवार, 31 जुलाई 2020 (22:13 IST)
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निर्माता और निर्देशक के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 31 जुलाई के 90वें एपिसोड ( Shree Episode 90 ) में ब्राह्मण के कटुवचन सुनकर अपना धनुष पुन: निकालकर उस पर मंत्रों से दिव्य बाण चढ़ाता है और उसे आसमान में छोड़ देता है वह बाण सीधा जाकर उस बालक की दिशा को ढूंढ लेता है। फिर अर्जुन आंखें बंद करके हाथ जोड़कर खड़ा होकर ध्यान करता है और ऐसी ही स्थिति में आसमान में गमन करने लगता है। वह यमलोक पहुंच जाता है जहां यम का एक भयंकर दूत उसे रोक देता है और कहता है कि इस द्वार में प्रवेश नहीं कर सकते। तब वह अपने धनुष के बाण से यम के द्वार को तोड़ने का प्रयास करता है लेकिन ऐसा नहीं हो पाता है तब वह ब्रह्मास्त्र का आह्‍वान करता है जिससे इंद्र का सिंघासन डोलने लगता है। सभी देवता यह देखने लगते हैं।

रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा


यह देखकर इंद्र उनके पास आकर कहते हैं कि तुम ये क्या कर रहे हो एक ब्राह्मण बालक के लिए सारी सृष्टि को खतरे में डाल रहे हो। इस पर अर्जुन कहता है कि हे धर्पिता ये केवल एक ब्राह्मण बालक का प्रश्न नहीं है ये मेरी प्रतिज्ञा का प्रश्न है और अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए जो भी बाधा मेरे रास्ते में आए उसे मिटा देना मेरा धर्म है। इस पर इंद्र कहते हैं कि यदि धर्म की बात करते हो तो ये क्यों भूल गए कि किसी एक धर्म का पालन करने के लिए उससे भी बड़े धर्म का बलिदान नहीं किया जाता। तुम्हें ब्रह्मास्त्र मानव कल्याण और उसकी रक्षा के लिए प्रदान किया गया है तुम्हारे निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए नहीं।
इस तरह इंद्र उसे कई तरह से समझाते हैं तो अर्जुन कहता है कि आप मुझे उपदेश दे रहे हैं तो यमराज को ये आज्ञा क्यों नहीं देते कि वो उस ब्राह्मण पुत्र को मुझे लौटा दें? तब इंद्र कहते हैं कि मैं यमराज को आज्ञा नहीं दे सकता क्योंकि जीवन और मृत्यु पर हमारा अधिकार नहीं है। हम देवता लोग स्वयं भी अमर नहीं है इसलिए एक मृत बालक को जीवित करने की हठ को छोड़ो और इस ब्रह्मास्त्र को अपने तुणीर में वापस रख दो। मैंने इसकी शक्ति वापस ले ली है और अब ये तुम्हारे किसी काम का नहीं आएगा। यह सुनकर अर्जुन कहता है कि इसका अर्थ ये है कि इस समय मेरी सहायता कोई देवता भी नहीं कर सकता? इस पर इंद्रदेव कहते हैं कि जो देवताओं के देवता श्रीहैं वे इस समय धरती पर ही हैं वही तुम्हारी सहायता कर सकते हैं। यह सुनकर अर्जुन पुन: धरती पर चला जाता है।
उधर, सुभद्रा चिंतित रहती हैं तो रुक्मिणी बताती है कि पार्थ तो एक ब्राह्मण पुत्र की रक्षा के लिए यमलोक चले गए हैं। यह सुनकर सुभद्रा और भी ज्यादा चिंतित हो जाती और कहती है- उन्हें अकेले क्यों जाने दिया गया भाभी? तब रुक्मिणी कहती है- तुम तो जानती हो कि पुरुषों के हठ के आगे किसी का वश नहीं चलता और तुम तो उनकी प्रतिज्ञा से परिचित थी ही। इस पर सुभद्रा कहती है- भाभी अब तो मुझे किसी अनिष्ट की आशंका हो रही है।
उधर, अर्जुन यमलोक से पुन: धरती पर उसी ब्राह्मण के समक्ष आकर सिर झुकाकर खड़ा हो जाता है।

उसे देखकर ब्राह्मण कहता है- देखो! नगर के वासियों देखो! मेरी संतान की रक्षा करने वाले, साक्षात मृत्यु को जीतने वाले इस अर्जुन को देखो। इसके पराक्रम से भगवान महादेव भी प्रसन्न हुए थे। इस तरह वह ब्राह्मण कई तरह के कटुवचन कहकर अर्जुन को लज्जित करता है और कहता है कि क्या हुआ तुम्हारी प्रतिज्ञा का?

तब अर्जुन कहता है- हे ब्राह्मण! मैं अपनी प्रतिज्ञा का पलन करूंगा। मुझे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है। मैं अग्नि में प्रवेश करूंगा। फिर अर्जुन अपने धनुष के बाण से एक आग निर्मित करता है और उसमें जलकर भस्म होने की तैयारी करता है। वह कहता है कि मैं अपनी प्रतिज्ञा में असफल होने के कारण अपने पितरों की मान और मर्यादा के लिए स्वयं को इस अग्नि को समर्पित करता हूं। फिर वह अपने सभी अपनों से क्षमा मांगता है। फिर अर्जुन जलती हुई अग्नि की ओर अपने कदम बढ़ता है।
तब वहां श्रीकृष्ण रथ पर सवार होकर आते हैं और अर्जुन से कहते हैं रुको। अर्जुन श्रीकृष्ण को देखकर कहता है वासुदेव आप। फिर श्रीकृष्‍ण रथ से उतरकर आते हैं और कहते हैं- मुझसे क्या कहकर जा रहे हो सखा अर्जुन? तब अर्जुन कहता है- मैं अपने धर्म पालन में असफल रहा जनार्दन। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं जानता था अर्जुन। इस पर अर्जुन कहता है कि तो फिर मुझे अब अपनी प्रतिज्ञा का पालन करने दीजिये मधुसुदन।
यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम्हारी प्रतिज्ञा के पीछे क्या है तुम जानते हो पार्थ? इस पर अर्जुन कहता है- क्या है जनार्दन? तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम्हारा ही मैं और तुम्हारा ही अहंकार और कुछ भी नहीं। भला कोई काल को भी ललकारता है अर्जुन? यह सुनकर अर्जुन कहता है परंतु मैं आपकी निंदा भी तो सहन नहीं कर सकता था। तब कृष्ण कहते हैं कि क्यूं नहीं सहन कर सकते? निंदा ही तो परिष्कार की जननी होती है। निंदा करने वाले ही तो हमें शुद्ध आचरण करने की सीख देते हैं। तब अर्जुन कहता है- कुछ भी हो मधुसुदन कोई आपको पापी कहे ये मुझे स्वीकार नहीं। अब तो केवल में इतना जानता हूं कि अब मुझे इस संसार में जीने का कोई अधिकार नहीं।

यह सुनकर श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि तुम्हारे प्राणों पर केवल तुम्हारा ही अधिकार नहीं है पार्थ, तुम्हारे सखा का भी है। इसलिए मैं तुम्हारा सखा तुम्हें इस प्रकार कर्तव्य से भागने की अनुमति नहीं दे सकता। वो कायर होते हैं अर्जुन जो अपने कर्तव्य को अधूरा छोड़कर मृत्यु के चरणों में शरण लेते हैं। तब अर्जुन कहता है- परंतु मैं कर्तव्य से भागा नहीं कन्हैया, मैं कर्तव्य निभाने में असमर्थ हो गया हूं। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि आदमी असमर्थ तो तभी होता है जब वह प्रयास करना छोड़ देता है। ये वीरों का काम नहीं। वीर तो अंतिम श्वांस तक प्रयास करना नहीं छोड़ता।
इस पर अर्जुन कहता है कि परंतु सामने एक लोहे की दीवार हो जिससे सिर टकरा-टकरा कर वह थक जाए तो वह क्या करें? तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि तो वह उसी दीवार से टकराता रहे। इस पर अर्जुन कहता है कि टकराता ही रहेगा तो मर जाएगा। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं कि उसी प्रकार मरना ही तो वीरों की शान है। तुम्हारी तरह थककर अपनी चीता जलाने को वीरता नहीं कहते अर्जुन। यह सुनकर अर्जुन चौंक जाता है।...कर्तव्य पालन उसे कहते हैं कि वह लोहे की दीवार को टक्करें मारता-मारता ही मर जाए क्योंकि संभव है कि उसकी अंतिम टक्कर से वह दीवार टूट जाए।

इस पर अर्जुन कहता है कि तुम कहना क्या चाहते हो कि मैंने पूरा प्रयास नहीं किया? तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि बिल्कुल यही कहना चाहता हूं पार्थ। क्योंकि तुम यमलोक से आपस लौट आए तुमने ये क्यों नहीं सोचा की यमलोक से आगे और भी लोक होते हैं? यह सुनकर अर्जुन कहता है अर्थात? तब श्रीकृष्ण कहते हैं अर्थात ये की आओ मेरे साथ हम दोनों यमलोक से आगे जाकर उन बालकों को ढूंढ़ेगें।

फिर श्रीकृष्ण उस ब्राह्मण से कहते हैं कि हे ब्राह्मण! मेरे इस सखा अर्जुन में तुम्हारे उन पुत्रों को ढूंढ लाने का सामर्थ है। वह अपनी प्रतिज्ञा अवश्य पूरी करेगा, तुम धीरज रखो और हमारे लौटने की प्रतीक्षा करो, चलो अर्जुन। फिर श्रीकृष्ण और अर्जुन एक दूसरे रथ पर सवार होकर आकाश में चले जाते हैं। रथ पर श्रीकृष्ण सवार रहते हैं और अर्जुन सारथी रहते हैं। वह कई समुद्र, पहाड़, घाटियों आदि को पार करके एक जगह श्रीकृष्ण कहते हैं- देखो अब हम सात पर्वतों को लांघने वाले हैं पार्थ।

अर्जुन कहता है- वासुदेव आज जैसा निराश मैं कभी नहीं हुआ। अब तो मुझे मेरे सामर्थ पर भी शंका होने लगी है। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हूं इसी अहंकार से तुम ग्रस्त हो गए थे। ऐसा समझो कि तुम्हारे अहंकार का हरण हो गया है। पार्थ सामर्थवान होने के साथ-साथ विनयशील होना भी आवश्यक है।...कई तरह के उपदेश देने के बाद वे आगे बढ़ जाते हैं। फिर वे एक अंधेरी गुफा में प्रवेश करते हैं।
बहुत दूर जाने के बाद अर्जुन कहता है- वासुदेव यहां तो घोर अंधकार है, कहीं हम भटक ना जाएं। तब श्रीकृष्‍ण अपने सुदर्शन को अंगुली पर ले जाते हैं और कहते हैं- जाओ सुदर्शन अपने ज्योतिर्मय तेज से इस घनघोर अंधकार को चीरकर हमारा मार्ग प्रदर्शन करो। फिर आगे-आगे सुदर्शन और पीछे श्रीकृष्ण एवं अर्जुन रहते हैं। फिर वे उस अंधेरी गुफा से निकलकर एक खुले आकाश में पहुंच जाते हैं जहां प्रकाश ही प्रकाश होता है। अर्जुन देखता है कि वहां सामने विराट में स्वयं श्रीकृष्ण चतुर्भुज रूप में विराजमान होते हैं। अर्जुन उन्हें देखकर अचंभित होकर प्रणाम करता है।
तब श्रीकृष्ण भी प्रणाम करते हैं तो वे महापुरुष कहते हैं- कहो वासुदेव श्रीकृष्ण कैसे आना हुआ? तब श्रीकृष्ण कहते हैं- आपका दर्शन लाभ लेने और अपने सखा अर्जुन को कुछ बताना भी था। इस पर चतुर्भुज श्रीहरि कहते हैं- अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ तुम्हें भी मेरा दर्शन हुआ है। मैंने ही तुम्हें यहां बुलाया है। तुम्हारे रथ को चार अश्व खींचकर लाएं हैं ये सभी चार दिशाओं के प्रतीक हैं। तुम्हारा रथ तुम्हारे मन का प्रतीक है। मन पर जब अंकुश नहीं रहता तो इन्हीं चारों दिशाओं में भटक जाता है। और जब मन को श्रीकृष्ण जैसे रथी मिल जाए अर्थात अंकुश मिल जाए तो वह अपने आप वश में हो जाता है। तुमने सात पर्वत पार किए थे ये मनुष्य के सात जन्मों के प्रतीक हैं। सात जन्मों में भी मानव बिना श्रीकृष्ण की कृपा के भवसागर से मुक्त नहीं हो पाता। परंतु जो श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लेता है वह तो क्षण मात्र में ही मुक्त हो जाता है। हे अर्जुन! तुम अंधकार से भरी कालरात्रि से होकर आए हो। ये अंधकार तुम्हारे ही अहंकार का प्रतीक था।... इस तरह श्रीहरि कई प्रकार के उपदेश देते हैं। अंतत: कहते हैं कि तुम्हें ज्ञान मिल गया है पार्थ।
फिर अर्जुन अपने अहंकार के लिए क्षमा मांगकर कहता है कि मेरे अपराध का दंड उस ब्राह्मण को मत दीजिये दीनानाथ। उस ब्राह्मण के पुत्र लौटा दीजिये। इस पर चतुर्भुज कहते हैं- अरे! तुम्हें यहां बुलाने के लिए ही उस ब्राह्मण के चारों पुत्र इस लोक में बुलाएं हैं। चिंता न करो तुम लोग मेरी ही कलाओं के साथ धरती पर गए हो। तुमसे ही धरती पर धर्म की स्थापना होगी। जाओ और लोकमंगल करते हुए ही धर्म का आचरण करो। तुम दोनों ऋषिवर नर और नारायण हो। पृथ्‍वीलोक पर अधर्मियों का संहार कर तुम लोग पुन: मेरे पास वापस लौट आओगे।

फिर वे चुतुर्भज उन्हें ब्राह्मण के सारे पुत्र वापस लौटा देते हैं तब वे दोनों पुन: धरती की ओर लौट जाते हैं। वह ब्राह्मण और ब्राह्मणी अपने चारों पुत्रों को देखकर प्रसन्न हो जाते हैं। फिर ब्राह्मण कहता है कि मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो, किस लोक के हो? क्योंकि जो कार्य तुमने कर दिखाया है वह इस धरती के मानव के लिए असंभव है। ऐसा कहकर वह श्रीकृष्‍ण और अर्जुन से क्षमा मांगता है। फिर श्रीकृष्ण उस ब्राह्मण को आशीर्वाद देकर वहां से लौट जाते हैं।

रास्ते में एक जगह अर्जुन रथ रोक देता है तो श्रीकृष्‍ण पूछते हैं- रथ क्यों रोक दिया पार्थ? तब अर्जुन श्रीकृष्ण के हाथ जोड़कर कहता है- जब से मैंने निलकांतमणि इस जगत के पालनहार को देखा है, मेरी आंखें उन्हीं को खोज रही है। अभी मेरा मन पूर्णत: तप्त नहीं हुआ है। उस छवि को देखना का एक बार और मन है। आपकी छवि में और श्रहरि की छवि में कोई अंतर नहीं है। मेरा मन है कि श्रीहरि की छवि मैं उनकी पूर्ण कलाओं के साथ आपमें देखूं। फिर श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करके वही चतुर्भुज रूप के दर्शन कराते हैं। जय श्रीकृष्णा।

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