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भोलेनाथ की सुंदर लयात्मक स्तुति : जय शिवशंकर

Updated: रविवार, 24 जुलाई 2016 (17:23 IST)
जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणा-कर करतार हरे,
 
जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख-सार हरे
 
जय शशि-शेखर, जय डमरू-धर जय-जय प्रेमागार हरे,
 
जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे,
 
निर्गुण जय जय, सगुण अनामय, निराकार साकार हरे।
 
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

 
जय रामेश्वर, जय नागेश्वर वैद्यनाथ, केदार हरे,
 
मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय, महाकाल ओंकार हरे,
 
त्र्यम्बकेश्वर, जय घुश्मेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे,
 
काशी-पति, श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अघहार हरे,
 
नील-कण्ठ जय, भूतनाथ जय, मृत्युंजय अविकार हरे।
 
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
 
जय महेश जय जय भवेश, जय आदिदेव महादेव विभो,
 
किस मुख से हे गुणातीत प्रभु! तव अपार गुण वर्णन हो,
 
जय भवकारक, तारक, हारक पातक-दारक शिव शम्भो,
 
दीन दुःख हर सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाकर की जय हो,
 
पार लगा दो भव सागर से, बनकर करूणाधार हरे।
 
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
 
जय मनभावन, जय अतिपावन, शोकनशावन,शिव शम्भो
 
विपद विदारन, अधम उदारन, सत्य सनातन शिव शम्भो,
 
सहज वचन हर जलज नयनवर धवल-वरन-तन शिव शम्भो,
 
मदन-कदन-कर पाप हरन-हर, चरन-मनन, धन शिव शम्भो,
 
विवसन, विश्वरूप, प्रलयंकर, जग के मूलाधार हरे।
 
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
 
भोलानाथ कृपालु दयामय, औढरदानी शिव योगी,
 
सरल हृदय,अतिकरुणा सागर, अकथ-कहानी शिव योगी,
 
निमिष मात्र में देते हैं,नवनिधि मन मानी शिव योगी,
 
भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर, बने मसानी शिव योगी,
 
स्वयम्‌ अकिंचन,जनमनरंजन पर शिव परम उदार हरे।
 
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
 
आशुतोष! इस मोह-मयी निद्रा से मुझे जगा देना,
 
विषम-वेदना, से विषयों की मायाधीश छुड़ा देना,
 
रूप सुधा की एक बूँद से जीवन मुक्त बना देना,
 
दिव्य-ज्ञान- भंडार-युगल-चरणों को लगन लगा देना,
 
एक बार इस मन मंदिर में कीजे पद-संचार हरे।
 
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
 
दानी हो, दो भिक्षा में अपनी अनपायनि भक्ति प्रभो,
 
शक्तिमान हो, दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो,
 
त्यागी हो, दो इस असार-संसार से पूर्ण विरक्ति प्रभो,
 
परमपिता हो, दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो,
 
स्वामी हो निज सेवक की सुन लेना करुणा पुकार हरे।
 
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
 
तुम बिन ‘बेकल’ हूँ प्राणेश्वर, आ जाओ भगवन्त हरे,
 
चरण शरण की बाँह गहो, हे उमारमण प्रियकन्त हरे,
 
विरह व्यथित हूँ दीन दुःखी हूँ दीन दयालु अनन्त हरे,
 
आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ श्रीमंत हरे,
 
मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे।
 
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

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