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मंदिर में सिर ढंक कर जाएं या खुला रखकर

Updated: गुरुवार, 16 मई 2019 (18:04 IST)
सिर ढंकने की परंपरा हिन्दू धर्म की देन है। प्राचीनकाल में सभी के सिर ढंके ही होते थे अर्थात हर प्रांत की अपनी एक वेशभूषा थी जिसमें सिर पर पगड़ी पहनने का रिवाज था। राजस्थान, मालवा व निमाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई लोग सिर पर साफ बांधकर रखते हैं। महिलाएं सिर पर ओढ़नी या पल्लू डालकर ही रहती थीं। ऐसे में वे सभी जब मंदिर जाते थे तो सिर ढंका ही होता था। लेकिन सिर ढंकने या नहीं ढंकने के हम 2 कारणों के साथ एक तीसरा वैज्ञानिक कारण भी बताएंगे और फिर यह बताएंगे कि क्या सही है?
 
 
1. पुरानी मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि जिसको आप आदर देते हैं, उनके आगे हमेशा सिर ढंककर जाते हैं। इसी कारण से कई महिलाएं अभी भी जब भी अपने सास-ससुर या बड़ों से मिलती हैं, तो सिर ढंक लेती हैं। यही कारण है कि जब हम मंदिर में जाते हैं, तो सिर ढंककर ही जाते हैं।
 
 
2. सिर ढंककर रखना सम्मानसूचक भी माना जाता है। सिर की पगड़ी को कुछ लोग अपनी इज्जत से जोड़कर देखते हैं। राजाओं के लिए उनके मुकुट सम्मान के सूचक होते थे। ऐसे में कुछ लोग यह मानते हैं कि यदि मंदिर जाएं तो अपना रुतबा व सम्मान सभी प्रभु के चरणों में रख दें। मतलब यह कि सिर खुला रखकर जाएं।
 
 
3. हिन्दू धर्म के अनुसार सिर के बीचोबीच सहस्रार चक्र होता है जिसे ब्रह्म रन्ध्र भी कहते हैं। हमारे शरीर में 10 द्वार होते हैं- 2 नासिका, 2 आंख, 2 कान, 1 मुंह, 2 गुप्तांग और सिर के मध्य भाग में 10वां द्वार होता है। दशम द्वार के माध्यम से ही परमात्मा से साक्षात्कार कर पा सकते हैं। इसीलिए पूजा के समय या मंदिर में प्रार्थना करने के समय सिर को ढंककर रखने से मन एकाग्र बना रहता है। पूजा के समय पुरुषों द्वारा शिखा बांधने को लेकर भी यही मान्यता है।
 
 
सिर मनुष्य के अंगों में सबसे संवेदनशील स्थान होता है और इस संवेदनशील स्थान को मौसम की मार, कीटाणुओं के हमले, पत्थर आदि लगने, गिरने या लड़ाई-झगड़े में सिर को बचाने के लिए सिर पर पगड़ी, साफा या टोप लगाया जाता था, जैसे कि आजकल गाड़ी चलाने के लिए हेलमेट जरूरी हो गया है।
 
 
बालों की चुंबकीय शक्ति के कारण सिर के बालों में रोग फैलाने वाले कीटाणु आसानी से चिपक जाते हैं। ये कीटाणु बालों से शरीर के भीतर प्रवेश कर जाते हैं जिससे वे व्यक्ति को रोगी बनाते हैं। यह भी कहते हैं कि आकाशीय विद्युतीय तरंगें खुले सिर वाले व्यक्तियों के भीतर प्रवेश कर क्रोध, सिरदर्द, आंखों में कमजोरी आदि रोगों को जन्म देती हैं।
 
 
निष्कर्ष- किसी भी प्रकार की पूजा करते वक्त, यज्ञ करते वक्त, विवाह करते वक्त और परिक्रमा लेते वक्त आम व्यक्ति को सिर ढंकना जरूरी है। महिलाएं अक्सर ओढ़नी या दुपट्टे से सिर ढंकती हैं, तो पुरुष पगड़ी, टोपी या रूमाल से सिर ढंककर मंदिर जाता है। हालांकि पंडित इसलिए सिर नहीं ढंकते, क्योंकि उनके सिर पर चोटी होती है और वे दिन-रात मंदिर की ही सेवा में लगे रहते हैं। इसके और भी कारण होते हैं।
 
लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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