ऐसे 10 प्रकार के भोजन, जिन्हें करने से होगा गंभीर रोग और आ सकती है मौत

food
करने के हिन्दू शास्त्रों और आयुर्वेद में बहुत ही सोच-समझकर कुछ नियम बताए गए हैं। से ही रोग उत्पन्न होता है और अन्न से ही व्यक्ति निरोगी बनता है। आप चाहें तो इन्हें माने या न मानें। तो आओ जानते हैं कि क्या हैं ऐसे नियम जिन्हें नहीं मानने से हो सकता है।

हालांकि किसी भी प्रकार के भोजन का अनादर नहीं करना चाहिए, क्योंकि इस जगत में लाखों लोगों को एक वक्त का भोजन भी नहीं मिलता है। ऐसे में यहां जो नियम बताए जा रहे हैं वह उन लोगों के लिए हैं, जो कि उन्नति के मार्ग पर हैं।

भूखे व्यक्ति को तो आप कैसे भी भोजन परोस दें, उसका शरीर उसे पचा लेगा। उसके लिए वह भोजन अमृत के समान होता है। ऐसे में यहां यह कहना जरूरी है कि भोजन आपकी मनोदशा और भावना पर अपना गुणधर्म बदल देता है। शरीर तब रोगी नहीं होता।

हिन्दू धर्म में 3 तरह के भोजनों का उल्लेख किया गया है। सात्विक, राजसिक और तामसिक। आप चाहें तो तीनों ही तरह का भोजन कर सकते हैं। तामसिक भोजन करने वाले भी कई लोग हैं। लेकिन यहां यह कहना जरूरी है कि भोजन कैसा भी हो यदि वह संतुलित और शुद्ध नहीं है तो रोग उत्पन्न करेगा। दूसरी बात यदि भोजन पचता नहीं है तो भी वह रोग उत्पन्न करेगा। कुल मिलाकर भोजन समय पर पच जाना जरूरी है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि आप भोजन पचाने के लिए कोई दवा ले रहे हों। खैर, आओ जानते हैं कि कैसा भोजन नहीं करना चाहिए।

1. बासी भोजन, कुत्ते का छुआ हुआ, बाल गिरा हुआ, रजस्वला द्वारा स्त्री का परोसा हुआ और मुंह से फूंक मारकर ठंडा किया हुआ भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि उक्त भोजन में करोड़ों तरह के कीटाणु मिल जाते हैं।

2. श्राद्ध का निकाला हुआ, अनादरयुक्त और अवहेलनापूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करें, क्योंकि इस तरह के भोजन के गुणधर्म बदल जाते हैं, जो कि आपके शरीर के लिए नुकसानदायक होते हैं।
3. कंजूस व्यक्ति का, राजा का, वेश्या के हाथ का बनाया, शराब बेचने वाले का दिया हुआ भोजन कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह भोजन भी दोषयुक्त होता है।

4. जिसने ढिंढोरा पीटकर लोगों को खाने के लिए बुलाया हो, ऐसी जगह का भोजन नहीं करना चाहिए। अक्सर भंडारे का भोजन उस व्यक्ति के लिए मना है, जो कि धर्म, साधना या उन्नति के मार्ग पर हैं। भंडारे का भोजन कैसे और किन पदार्थों से बनाया गया, यह भी जांचना जरूरी है।
5. ईर्ष्या, भय, क्रोध, लोभ, दीन व द्वेषभाव के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है। इसी भाव के साथ बनाया या परोसा गया भोजन त्याग देना चाहिए।

6. जिस भोजन की निंदा की जा रही हो या भोजन करने वाला खुद भोजन की निंदा करते हुए खा रहा है तो ऐसा भोजन रोग उत्न्न करेगा। जब आप खाने की निंदा करते हैं तब उस खाने की गुणवत्ता बदलकर वह आपकी उम्र कम करने में सहायक सिद्ध होता है।

7. भोजन साफ-सुथरी जगह बनाया गया नहीं हो, भोजन बनाने वाले ने स्नान नहीं किया हो तो ऐसे भोजन का त्याग कर देना चाहिए।

8. किसी के द्वारा दान किया गया, फेंका गया या जूठा छोड़ दिया गया भोजन नहीं करना चाहिए। जो भोजन लड़ाई-झगड़ा करके बनाया गया हो, जिस भोजन को किसी ने लांघा हो तो वह भोजन भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह राक्षस भोजन होता है।

9. आधा खाया हुआ फल, मिठाई या अन्न आदि पुन: नहीं खाना चाहिए, क्योंकि इसमें कीटाणुओं की संख्या बढ़ जाती है। अक्सर लोग आधा खाकर से ढांककर रख देते हैं या फ्रीज में रख देते हैं, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर आप भोजन करते समय जूठे मुंह उठ जाते हैं और फ‌िर आकर भोजन करना शुरू कर देते हैं तो इस आदत को छोड़ दीज‌िए। यह आदत भी आपकी उम्र को कम करती है।

10. प्रतिपदा को कुष्माण्ड (कुम्हड़ा पेठा) न खाएं, क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है। द्वितीया को छोटा बैंगन व कटहल खाना निषेध है। तृतीया को परमल खाना निषेध है, क्योंकि यह शत्रुओं की वृद्धि करता है। चतुर्थी के दिन मूली खाना निषेध है, इससे धन का नाश होता है। पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है अत: पंचमी को बेल खाना निषेध है। षष्ठी के दिन नीम की पत्ती खाना एवं दातुन करना निषेध है, क्योंकि इसके सेवन से एवं दातुन करने से नीच योनि प्राप्त होती है।

सप्तमी के दिन ताड़ का फल खाना निषेध है। इसको इस दिन खाने से रोग होता है। अष्टमी के दिन नारियल खाना निषेध है, क्योंकि इसके खाने से बुद्धि का नाश होता है। नवमी के दिन लौकी खाना निषेध है, क्योंकि इस दिन लौकी का सेवन गौ-मांस के समान है। दशमी को कलंबी खाना निषेध है।

एकादशी को सेम फली खाना निषेध है। द्वादशी को (पोई) पु‍तिका खाना निषेध है। तेरस (त्रयोदशी) को बैंगन खाना निषेध है। अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, चतुर्दशी और अष्टमी, रविवार श्राद्ध एवं व्रत के दिन स्त्री सहवास तथा तिल का तेल, लाल रंग का साग तथा कांसे के पात्र में भोजन करना निषेध है।

रविवार के दिन अदरक भी नहीं खाना चाहिए। कार्तिक मास में बैंगन और माघ मास में मूली का त्याग करना चाहिए। जिन्हें लक्ष्मी प्राप्त करने की लालसा हो उन्हें रात में दही और सत्तू नहीं खाना चाहिए, यह नरक की प्राप्ति कराता है। इस तरह की और भी बातें हैं और आप उन्हें जान लें अन्यथा आप गंभीर रोगों की चपेट में आ जाएंगे। खाने के मेल को भी समझें।

 

और भी पढ़ें :