मंत्रोच्चार करने के 10 कारण, जानकर ही करें मंत्र जप

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अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: शनिवार, 11 जुलाई 2020 (14:30 IST)
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मंत्र कई प्रकार के होते हैं जिन्हें उचित समय और विधि से उच्चारण करने पर ही उनका लाभ मिलता है। मंत्र जप करने के भी कई कारण होते हैं। आखिर क्यों करते हैं मत्रोच्चार आओ जाते हैं इसके 10 कारण।

1. मन का नियंत्रण करने हेतु : मन को नियंत्रित करके उसे एक तंत्र में लाने के लिए ही मंत्र का उच्चारण करते हैं। 'मंत्र' का अर्थ है मन को एक तंत्र में लाना। मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है, तब वह सिद्ध होने लगता है।

2. सांसारिक कामना हेतु : किसी भी सांसारिक कामना या भौतिक इच्छाओं की पूर्ति हेतु करते हैं मंत्र का जाप। किसी भी प्रकार की मनोकामान पूर्ति हेतु किसी देवी, देवता के मंत्र या अन्य शक्तियों के मंत्र से व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति की आशा करता है। ‘मंत्र साधना’ भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है।

3. किसी को साधने हेतु : मं‍त्र से किसी सकारात्मक शक्तियों जैसे देवी, देवता, यक्ष, नाग आदि को साधकर उनसे मनचाहा वर पाया जा सकता है, लेकिन कई लोग तुरंत ही सफलता प्राप्त करने हेतु मंत्र से किसी भूत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी आदि को साधकर अपनी इच्‍छाओं की पूर्ति करते हैं जो कि अनुचित है।

4. बुरी शक्तियों से रक्षा हेतु : शास्त्रकार कहते हैं- 'मननात् त्रायते इति मंत्र:' अर्थात मनन करने पर जो त्राण दे या रक्षा करे वही मंत्र है। कई लोग मंत्र शक्ति के द्वार घटना, दुर्घटना या बुरी शक्तियों से बचने का उपाय भी करते हैं।

5. सिद्धि हेतु : तंत्रानुसार देवता के सूक्ष्म शरीर को या इष्टदेव की कृपा को मंत्र कहते हैं। दिव्य-शक्तियों की कृपा को प्राप्त करने में उपयोगी शब्द शक्ति को 'मंत्र' कहते हैं। अदृश्य गुप्त शक्ति को जागृत करके अपने अनुकूल बनाने वाली विधा को मंत्र कहते हैं। और अंत में इस प्रकार गुप्त शक्ति को विकसित करने वाली विधा को मंत्र कहते हैं।

6. मंत्रों के लिंग का चयन जरूरी : मंत्र जप के लिए मंत्रों के लिंग का चयन जरूरी होता है क्योंकि इसी से पता चलता है कि आप क्या करना चाहते हैं। मंत्रलिंग 3 प्रकार के होते हैं : 1. स्त्रीलिंग, 2. पुल्लिंग और 3. नपुंसक लिंग।.. 'स्वाहा' से अंत होने वाले मंत्र स्त्रीलिंग हैं। 'हूं फट्' वाले पुल्लिंग हैं। 'नमः' अंत वाले नपुंसक हैं।

7. मंत्रों के शास्त्रोक्त प्रकार : 1. वैदिक, 2. पौराणिक और 3. साबर।...कुछ विद्वान इसके प्रकार अलग बताते हैं : 1. वैदिक, 2. तांत्रिक और 3. साबर। वैदिक : 1. सात्विक और 2. तांत्रिक।

8. वैदिक मंत्रों के जप के प्रकार : 1. वैखरी, 2. मध्यमा, 3. पश्यंती और 4. परा।
1. वैखरी : उच्च स्वर से जो जप किया जाता है, उसे वैखरी मंत्र जप कहते हैं।

2. मध्यमा : इसमें होंठ भी नहीं हिलते व दूसरा कोई व्यक्ति मंत्र को सुन भी नहीं सकता।


3. पश्यंती : जिस जप में जिह्वा भी नहीं हिलती, हृदयपूर्वक जप होता है और जप के अर्थ में हमारा चित्त तल्लीन होता जाता है, उसे पश्यंती मंत्र जाप कहते हैं।
4. परा : मंत्र के अर्थ में हमारी वृत्ति स्थिर होने की तैयारी हो, मंत्र जप करते-करते आनंद आने लगे तथा बुद्धि परमात्मा में स्थिर होने लगे, उसे परा मंत्र जप कहते हैं।

नोट : वैखरी से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव मध्यमा में होता है। मध्यमा से 10 गुना प्रभाव पश्यंती में तथा पश्यंती से भी 10 गुना ज्यादा प्रभाव परा में होता है। इस प्रकार परा में स्थित होकर जप करें तो वैखरी का हजार गुना प्रभाव हो जाएगा।
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9.पौराणिक मंत्र के प्रकार : पौराणिक मंत्र जप के प्रकार : 1. वाचिक, 2. उपांशु और 3. मानसिक।

1. वाचिक : जिस मंत्र का जप करते समय दूसरा सुन ले, उसको वाचिक जप कहते हैं।
2. उपांशु : जो मंत्र हृदय में जपा जाता है, उसे उपांशु जप कहते हैं।
3. मानसिक : जिसका मौन रहकर जप करें, उसे मानसिक जप कहते हैं।

10. मंत्र शक्ति के चमत्कारिक प्रभाव :
* वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ध्वनि तरंगें ऊर्जा का ही एक रूप हैं। मंत्र में निहित बीजाक्षरों में उच्चारित ध्वनियों से शक्तिशाली विद्युत तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो चमत्कारी प्रभाव डालती हैं।

* सकारात्मक ध्वनियां शरीर के तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं जबकि नकारात्मक ध्वनियां शरीर की ऊर्जा तक का ह्रास कर देती हैं। मंत्र और कुछ नहीं, बल्कि सकारात्मक ध्वनियों का समूह है, जो विभिन्न शब्दों के संयोग से पैदा होते हैं।

* मंत्रों की ध्वनि से हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों सकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं। स्थूल शरीर जहां स्वस्थ होने लगता हैं, वहीं जब सूक्ष्म शरीर प्रभावित होता है तो हम में या तो सिद्धियों का उद्भव होने लगता है या हमारा संबंध ईथर माध्यम से हो जाता है और इस तरह हमारे मन व मस्तिष्क से निकली इच्छाएं फलित होने लगती हैं।

* निश्चित क्रम में संग्रहीत विशेष वर्ण जिनका विशेष प्रकार से उच्चारण करने पर एक निश्चित अर्थ निकलता है। अंत: मंत्रों के उच्चारण में अधिक शुद्धता का ध्यान रखा जाता है। अशुद्ध उच्चारण से इसका दुष्प्रभाव भी हो सकता है।

* रामचरित मानस में मंत्र जप को भक्ति का 5वां प्रकार माना गया है। मंत्र जप से उत्पन्न शब्द शक्ति संकल्प बल तथा श्रद्धा बल से और अधिक शक्तिशाली होकर अंतरिक्ष में व्याप्त ईश्वरीय चेतना के संपर्क में आती है जिसके फलस्वरूप मंत्र का चमत्कारिक प्रभाव साधक को सिद्धियों के रूप में मिलता है।

* शाप और वरदान इसी मंत्र शक्ति और शब्द शक्ति के मिश्रित परिणाम हैं। साधक का मंत्र उच्चारण जितना अधिक स्पष्ट होगा, मंत्र बल उतना ही प्रचंड होता जाएगा।

* मंत्रों में अनेक प्रकार की शक्तियां निहित होती हैं जिसके प्रभाव से देवी-देवताओं की शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र एक ऐसा साधन है, जो मनुष्य की सोई हुई सुसुप्त शक्तियों को सक्रिय कर देता है।

*हजारों वर्ष पूर्व मंत्र शक्ति के रहस्य को प्राचीनकाल में वैदिक ऋषियों ने ढूंढ निकाला था। उन्होंने उनकी शक्तियों को जानकर ही वेद मंत्रों की रचना की। वैदिक ऋषियों ने ब्रह्मांड की सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से विराट ध्वनियों को सुना और समझा। इसे सुनकर ही उन्होंने मंत्रों की रचना की। उन्होंने जिन मंत्रों का उच्चारण किया, उन मंत्रों को बाद में संस्कृत की लिपि मिली और इस तरह संपूर्ण संस्कृत भाषा ही मंत्र बन गई। संस्कृत की वर्णमाला का निर्माण बहुत ही सूक्ष्म ध्वनियों को सुनकर किया गया।



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