...ये दस मानवता के दुश्मन

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|

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देवताओं को सुर कहा जाता है और दैत्यों को असुर। असुरों को दानव या राक्षस नहीं कहा जाता। कश्यप ऋषि की तीन प्रमुख पत्नियां थी- अदिति, दिति और दनु। अदिति से देवताओं और ‍दिति से असुरों और दनु से दानवों की उत्पत्ति हुई। देवताओं के सौतेले भाई हैं दैत्य। पौराणिक धर्मग्रंथों अनुसार असुरों और देवों में सदा युद्ध होता रहा। इसमें सबसे प्रसिद्ध है जो अमृत के लिए हुआ था। आज भी आत्माएं सक्रिय हैं।
दिति के दो पुत्र हुए- हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष। दोनों में हिरण्यकश्यप (हिरण्यकशिपु) ज्यादा भयंकर था। हिरण्याक्ष को मारने के लिए ‍भगवान विष्णु को वराह अवतार लेना पड़ा था। हिरण्यकश्यप को कोई मार नहीं सकता था, क्योंकि उसने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि ‘आपके बनाए किसी प्राणी, मनुष्‍य, पशु, देवता, दैत्‍य, नागादि किसी से मेरी मृत्‍यु न हो। मैं समस्‍त प्राणियों पर राज्‍य करूं। मुझे कोई न दिन में मार सके न रात में, न घर के अंदर मार सके न बाहर यह भी कि कोई न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार मार सके। न भूमि पर न आकाश में, न पाताल में न स्वर्ग में।'

इस वरदान ने उसके भीतर अजर-अमर होने का भाव उत्पन्न हो गया था। इसके चलते उसने धरती पर अत्याचार शुरू कर दिया था। लोगों को वह ब्राह्मा, विष्णु और शिव की पूजा-प्रार्थना छोड़कर खुद की पूजा करने का कहता था। जो ऐसा नहीं करते थे उन्हें वह मार देता था।

हिरण्यकश्यप को मारने के लिए भगवान विष्णु को नृसिंह अवतार लेना पड़ा था। हिरण्यकश्यप के कई पुत्र थे उनमें प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त था। विष्णु भक्ति के कारण हिरण्यकश्यप प्रहलाद से इतना नाराज था कि उसने प्रहलाद को मारने का आदेश दे दिया था, लेकिन विष्णु भक्ति के कारण प्रहलाद को कोई मार नहीं सकता था। प्रहलाद को जल में डुबोया, पहाड़ से नीचे गिराया गया, अस्त्र-शस्त्र से काटने का प्रयास किया गया, लेकिन हर उपाय असफल रहे। इससे हिरण्यकश्यप चिंतित हो गया।

हिरण्यकश्यप को चिंति‍त देख उसकी बहन होलिका ने प्रहलाद को लेकर अग्नि में प्रवेश करने का प्रस्‍ताव रखा। होलिका को वर प्राप्‍त था कि वह स्‍वयं अग्नि में न जलेगी। पर जब होलिका प्रहलाद को गोद में ले चिता पर बैठी तो एक चमत्‍कार हुआ। होलिका जल गई और प्रहलाद बच गए। क्यों? क्योंकि होलिका के मन में पाप था। दूसरे के साथ, हृदय में पाप लेकर बैठने की उसने गलती की थी। वरदान सिर्फ इसलिए था कि अग्नि से उसकी रक्षा होगी तभी रक्षा होगी जबकि कोई उसे जलाने का प्रयास करेगा।

इस घटना के बाद हिरण्‍यकश्यप ने प्रहलाद को एक खंभे से बांध दिया। फिर भरी सभा में प्रहलाद से पूछा, ‘किसके बलबूते पर तू मेरी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करता है?’ प्रहलाद ने कहा, ‘आप अपना असुर स्वभाव छोड़ दें। सबके प्रति समता का भाव लाना ही भगवान की पूजा है।'

हिरण्‍यकश्यप ने क्रोध में कहा, ‘तू मेरे सिवा किसी और को जगत का स्‍वामी बताता है। कहां है वह तेरा जगदीश्‍वर? क्‍या इस खंभे में है जिससे तू बंधा है?’

यह कहकर हिरण्यकश्यप ने खंभे में घूंसा मारा। तभी खंभा भयंकर आवाज करते हुए फट गया और उसमें से एक भयंकर डरावना रूप प्रकट हुआ जिसका सिर सिंह का और धड़ मनुष्‍य का था। पीली आंखें, बड़े-बड़े नाखून, विकराल चेहरा और तलवार-सी लपलपाती जीभ। यही ‘नृसिंह अवतार’ थे। उन्होंने तेजी से हिरण्‍यकश्यप को पकड़ लिया और संध्या की वेला में (न दिन में, न रात में), सभा की देहली पर (न बाहर, न भीतर), अपनी जांघों पर रखकर (न भूमि पर, न आकाश में), अपने नखों से (न अस्‍त्र से, न शास्‍त्र से) उसका कलेजा फाड़ डाला। हजारों सैनिक जो प्रहार करने आए, उन्‍हें भगवान नृसिंह ने हजारों भुजाओं और नखरूपी शस्‍त्रों से खदेड़कर मार डाला।

फिर क्रोध से भरे नृसिंह भगवान सिंहासन पर जा बैठे। तब प्रहलाद ने दंडवत होकर उनकी प्रार्थना-पूजा की। प्रहलाद का राजतिलक करने के बाद नृसिंह भगवान चले गए।

अगले पन्ने पर दूसरा भयंकर असुर जो शिव का शत्रु था...



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