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समुद्र मंथन से निकला कालकूट विष कैसा था?

Updated: बुधवार, 27 जनवरी 2021 (19:12 IST)
क्षीरसागर में देवता और दैत्यों के मिलकर मदरांचल पर्तत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन किया था। इस मंथन से 14 तरह के रत्न प्राप्त हुए थे। सबसे पहले कालकूट नामक विष निकला था जिसे शिवजी ने अपने कंठ में धारण कर लिया था जबकि अंत में अमृत निकला था जिसके चलते देव और दैत्यों में झगड़ा हुआ था। आओ जानते हैं कि कालकूट विष क्या था।
 
 
1. मंथन के दौरान निकले विष कालकूट को हलाहल भी कहा जाता है। 
 
2. इसे न तो देवता ग्रहण करना चाहते थे और न ही असुर।
 
3. यह विष इतना खतरनाक था, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का विनाश कर सकता था। 
 
4. इस विष को ग्रहण करने के लिए स्वयं भगवान शिव आए। 
 
5. शिव जी ने विष का प्याला पी लिया लेकिन तभी माता पार्वती, जो उनके साथ खड़ी थीं उन्होंने उनके गले को पकड़ लिया। 
 
6. ऐसे में न तो विष उनके गले से बाहर निकला और न ही शरीर के अंदर गया। वह उनके गले में ही अटक गया जिसकी वजह से उनका गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।
 
7. इसे काला बच्छनाग भी कहते हैं।

लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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