परमाणु सिद्धांत के असली जनक तो ये हैं...

परमाणु और गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के जनक आचार्य कणाद

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महर्षि कणाद : कणाद गुजरात के प्रभास क्षेत्र (द्वारका के निकट कृष्ण के निर्वाण स्थल पर) में जन्मे थे। महर्षि कणाद ईसा से 600 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात बुध और महावीर के काल में। यह कहना उचित होगा कि बौद्ध काल ज्ञान, विज्ञान, धर्म और दर्शन के रिफॉर्म का काल था। इस काल में वेदों पर जमी धूल हटाई गई और ज्ञान को नए सांचे में नई भाषा के साथ ढाला गया।

महर्षि कणाद वैशेषिक सूत्र के निर्माता, परंपरा से प्रचलित वैशेषिक सिद्धांतों के क्रमबद्ध संग्रहकर्ता एवं वैशेषिक दर्शन के उद्धारकर्ता माने जाते हैं। वे उलूक, काश्यप, पैलुक आदि नामों से भी प्रख्यात थे। महर्षि कणाद ने इस दार्शनिक मत द्वारा ऐसे धर्म की प्रतिष्ठा का ध्येय रखा है, जो भौतिक जीवन को बेहतर बनाए और लोकोत्तर जीवन में मोक्ष का साधन हो।
न्याय दर्शन जहां अंतरजगत और ज्ञान की मीमांसा को प्रधानता देता है, वहीं वैशेषिक दर्शन बाह्य जगत की विस्तृत समीक्षा करता है। इसमें आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए इसे अजर, अमर और अविकारी माना गया है। न्याय और वैशेषिक दोनों ही दर्शन परमाणु से संसार की शुरुआत मानते हैं। इनके अनुसार सृष्टि रचना में परमाणु उपादान कारण और ईश्वर निमित्त कारण है। इसके अनुसार जीवात्मा विभु और नित्य है तथा दुखों का खत्म होना ही मोक्ष है।
भौतिक जगत की उत्पत्ति सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण परमाणुओं के संघनन से होती है- इस सिद्धांत के जनक महर्षि कणाद थे। महर्षि कणाद का जन्म चरक और पतंजलि से पूर्व हुआ था। बादरायण के प्रसिद्ध ग्रंथ 'ब्रह्मसूत्र' में भी वैशेषिक दर्शन का उल्लेख मिलता है। कश्मीर के कुमारजीव और उज्जयिनी के परमार्थ ने चीनी भाषा में भारतीय बौद्ध और अन्य दर्शनों का अनुवाद चौथी और पांचवीं सदी में किया था। इस दौरान बौद्ध विद्वान भारतीय दर्शन में केवल सांख्य और वैशेषिक दर्शन में ही रुचि रखते थे। चीनी विद्वान डॉ. एच. ऊई ने वै‍शेषिक दर्शन के काल को प्रारंभिक बौद्ध दर्शन का काल या उसके पूर्ववर्ती या सममालीन काल होने का अनुमान लगाया है। उनके अनुसार यह समकालीन या बौद्ध दर्शन के पूर्व गढ़ा गया दर्शन है।
1917 में ऊई न वैशेषिक दर्शन पर काम करते हुए एक पुस्तक में लिखा कि पांचवीं शताब्दी में ही बौद्ध भिक्षुओं द्वारा भारत से जो ग्रन्थ चीन ले जाए गए, उनमें सभी ग्रन्थ बौद्ध धर्म और दर्शन से संबंधित थे। केवल दो ग्रंथ ईश्वर कृष्ण की संख्य कारिका और कणाद की वै‍शेषिक दर्शन थे।

वैशेषिक दर्शन शुद्धरूप से पदार्थ शास्त्र है। अब यही वैशेषिक दर्शन न्याय वैशेषिक नाम से उपलब्ध है। अक्षपाद गौतम का न्याय दर्शन वैशेषिक दर्शन के 200 वर्ष बाद प्रमाणों की तार्किक व्याख्या के लिए रचा गया था। इस काल में विदेशी नस्ले यवन, कुषाण, हूण, आभिर, शक आदि का भारतीय समाज में संविलयन होकर जिसके कारण सांस्कृतिक विविधता और धर्म बढ़ें।
कणाद का ग्रंथ : कणादकृत वैशेषिक सूत्र- इसमें 10 अध्याय हैं। वैशेषिक सूत्र के 2 भाष्य ग्रंथ हैं- रावण भाष्य तथा भारद्वाज वृत्ति। वर्तमान में दोनों अप्राप्य हैं। पदार्थ धर्म संग्रह (प्रशस्तपाद, 4थी सदी के पूर्व) वैशेषिक का प्रसिद्ध ग्रंथ है। यद्यपि इसे वैशेषिक सूत्र का भाष्य कहा जाता है, किंतु यह एक स्वतंत्र ग्रंथ है।

पदार्थ धर्म संग्रह की टीका 'व्योमवती' (व्योमशिवाचार्य, 8 वीं सदी), पदार्थ धर्म संग्रह की अन्य टीकाएं हैं- 'न्यायकंदली' (श्रीधराचार्य, 10 वीं सदी), 'किरणावली' (उदयनाचार्य 10वीं सदी), लीलावती (श्रीवत्स, 11वीं सदी)।
पदार्थ धर्म संग्रह पर आधारित चन्द्र के 'दशपदार्थशास्त्र' का अब केवल चीनी अनुवाद प्राप्य है। 11वीं सदी के आसपास रचित शिवादित्य की 'सप्तपदार्थी' में न्याय तथा वैशेषिक का सम्मिश्रण है।

अन्य : कटंदी, वृत्ति-उपस्कर (शंकर मिश्र 15वीं सदी), वृत्ति, भाष्य (चंद्रकांत 20वीं सदी), विवृत्ति (जयनारायण 20वीं सदी), कणाद-रहस्य, तार्किक-रक्षा आदि अनेक मौलिक तथा टीका ग्रंथ हैं।

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