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आस्था का केंद्र मुंबई का महालक्ष्मी मंदिर

Updated: गुरुवार, 8 सितम्बर 2016 (16:47 IST)
भारत में बहुत सारे मंदिर हैं, जहां आस्था और विश्वास का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है।  इसी 
क्रम में मुंबई के महालक्ष्मी मंदिर का नाम अगर न लिया जाए, तो ये बेमानी होगा। मुंबई  का महालक्ष्मी मंदिर अपने आप में काफी अद्भुत एवं आस्था का प्रतीक है। 
 

 
देशभर से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं और काफी सुकून पाते हैं। मुंबई के भूलाभाई  देसाई मार्ग पर समुद्र के किनारे स्थित इस मंदिर की सुंदरता अवर्णनीय है। यहां पहुंचकर ही  आपको असीम शांति मिलेगी। 
 
इस आकर्षक मंदिर के पीछे भी एक अनोखी घटना है। बताया जाता है कि बहुत समय पहले  मुंबई में वर्ली और मालाबार हिल को जोड़ने के लिए दीवार का निर्माण कार्य चल रहा था।  सैकड़ों मजदूर इस दीवार के निर्माण कार्य में लगे हुए थे, मगर हर दिन कोई न कोई बाधा आ  रही थी। इसके कारण ब्रिटिश इंजीनियर काफी परेशान हो गए। इतनी मेहनत के बावजूद दीवार  खड़ी नहीं हो पा रही थी। कई बार तो पूरी की पूरी दीवार ढह गई। समस्या का कोई समाधान  नहीं मिल रहा था। 
 
इसी बीच इस प्रोजेक्ट के मुख्य अभियंता ने एक अनोखा सपना देखा। सपने में मां लक्ष्मी  प्रकट हुईं और कहा कि वर्ली में समुद्र के किनारे मेरी एक मूर्ति है। उस मूर्ति को वहां से  निकालकर समुद्र के किनारे ही मेरी स्थापना करो। ऐसा करने से हर बाधा दूर हो जाएगी और  वर्ली-मालाबार हिल के बीच की दीवार आसानी से खड़ी हो जाएगी। 
 

 
मुख्य अभियंता को काफी आश्चर्य हुआ। उसने मजदूरों को स्वप्न में बताए गए स्थान पर जाने  को कहा और मूर्ति ढूंढ लाने का आदेश दिया। आदेशानुसार कार्य शुरू हुआ। थोड़ी मेहनत के बाद  ही महालक्ष्मी की एक भव्य मूर्ति प्राप्त हुई। यह देखकर स्वप्न पाने वाले अभियंता का शीश  नतमस्तक हो गया। पहले वह असमंजस में था कि पता नहीं, सपने की बात सत्य है या नहीं,  लेकिन सपना सच होते ही उसका रोम-रोम श्रद्धा से रोमांचित हो उठा। 
 
माता के आदेशानुसार समुद्र किनारे ही उस मूर्ति की स्थापना की गई और छोटा-सा मंदिर  बनवाया गया। मंदिर निर्माण के बाद वर्ली-मालाबार हिल के बीच की दीवार बिना किसी  विघ्न-बाधा के खड़ी हो गई। इस पर प्रोजेक्ट में शामिल लोगों ने सुकून की सांस ली। ब्रिटिश  अधिकारियों को भी दैवीय शक्ति पर भरोसा करना पड़ा। इसके बाद तो इस मंदिर में श्रद्धालुओं  की भीड़ उमड़ने लगी। 
 
सन् 1831 में धाकजी दादाजी नाम के एक व्यवसायी ने छोटे से मंदिर को बड़ा स्वरूप दिया  एवं इसका जीर्णोद्धार कराया गया। समुद्र किनारे होने के कारण मंदिर की सुंदरता देखते ही  बनती है। यहां आपको महालक्ष्मी के अलावा महाकाली एवं महालक्ष्मी की भव्य प्रतिमाएं भी  देखने को मिलेंगी। 
 
तीनों प्रतिमाओं को सोने के नथ, सोने की चूड़ियां एवं मोतियों के हार से सजाया गया है। इन  प्रतिमाओं के दर्शन से ही चित्त भाव-विभोर हो जाता है। इस मंदिर में महालक्ष्मी को शेर पर  सवार दिखाया गया है, जो महिसासुर का वध कर रही हैं। दरअसल माता के इन तीनों रूपों को  बनाया गया है। 
 
आमतौर पर दर्शनार्थी महालक्ष्मी की वास्तविक प्रतिमा नहीं देख पाते हैं, क्योंकि वास्तविक  प्रतिमा को आवरण से ढंक दिया जाता है। यहां के पुजारी ने बताया कि असली प्रतिमा को  देखने के लिए रात को यहां आना पड़ता है। रात के लगभग 9.30 बजे वास्तविक प्रतिमा से  आवरण हटाया जाता है। 10 से 15 मिनट के बाद पुन: प्रतिमा के ऊपर आवरण चढ़ा दिया  जाता है। 
 
प्रतिमा के वास्तविक रूप का दर्शन कम ही लोग कर पाते हैं। रात में आवरण से ढंकने के  उपरांत मंदिर का दरवाजा बंद हो जाता है। सुबह साफ-सफाई के बाद माताओं का अभिषेक होता  है और फिर देशभर से आए दर्शनार्थियों के दर्शनों का सिलसिला शुरू हो जाता है।
 
मंदिर में एक दीवार है, जहां आपको बहुत सारे सिक्के चिपके हुए मिलेंगे। कहा जाता है कि  भक्तगण अपनी मनोकामनाओं के साथ सिक्के चिपकाते हैं यहां। ऐसा कहा जाता है कि सच्चे  दिल से मांगी गई हर मनोकामनाएं यहां पूरी होती हैं। आप भी सिक्के चिपकाकर देख सकते।  इस दीवार पर आसानी से सिक्के चिपक जाते हैं। 
 
मुंबई के किसी भी जगह से भूलाभाई देसाई मार्ग पहुंचा जा सकता है। इसके लिए आप टैक्सी  या बस का सहारा ले सकते हैं।
लेखक के बारे में
संजय सिन्हा
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