वैज्ञानिक अध्यात्मवाद ही मनुष्यता का एकमात्र लक्ष्य


की विशेषता उसके हैं। विचारों की विकास यात्रा में ही धर्म, दर्शन एवं उपजे एवं पनपे हैं। इन तीनों का ही मकसद मानवीय जीवन को पूर्णता तक पहुंचाना एवं समाज को स्वर्गीय वातावरण से ओत-प्रोत करना है। 
 
वैज्ञानिक विकास के विभिन्न पहलुओं को तो हम रोजमर्रा के जीवन में देखते-परखते ही रहते हैं। सामान्य तौर पर पश्चिमी दृष्टिकोण को वैज्ञानिक एवं पूर्वी दृष्टि को आध्यात्मिक माना जाता है।
 
वैज्ञानिक मनोवृत्ति ज्ञान के विकास को बढ़ावा देती है। इस तरह वह दर्शन के समीप आ जाती है। आध्यात्मिकता के प्रति विश्वास को, श्रेष्ठता को, आदर्शों की पराकाष्ठा को कहते हैं। ऐसी आदर्श वृत्ति के प्रति जो झुकने के लिए जन-साधारण को आंदोलित करने लगे, वह आध्यात्मिक मनोवृत्ति है।
 
नीति और मर्यादा की उपेक्षा करके चल रही वैज्ञानिक प्रगति एक हाथ से सुविधा संवर्धन करती है और दूसरे हाथ से व्यक्ति की गरिमा तथा समाज की सुव्यवस्था पर भारी आघात पहुंचाती है, लेकिन विज्ञान दुराग्रही नहीं है। वह लगातार के प्रयोग-परीक्षण के बाद ही किसी तथ्य को स्वीकारता और उसे प्रामाणिक ठहराता है। इसी ठोस आधार पर सिद्धांत विनिर्मित होते हैं।
 
अध्यात्म श्रद्धा-विश्वास से शुरू होकर तर्क के दायरे से ऊपर उठ जाता है। उसे सिर्फ अनुभव किया जाता है, परखा नहीं जा सकता। विज्ञान और अध्यात्म का कार्यक्षेत्र अवश्य भिन्न है, पर कार्य-पद्धति तथा उद्देश्य दोनों में साम्य हैं। दोनों ही सत्यान्वेषण की प्रक्रिया में अलग-अलग मार्गों से प्रगतिशील हैं। 
 
आस्तिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता की मान्यताओं को हमें विज्ञान के आधार पर सही सिद्ध करने का प्रयत्न करना पड़ेगा। की एक नई दिशा का निर्माण करना जरूरी है। 5 तत्व ही मिलकर शरीर के स्थूल और सूक्ष्म अवयवों का निर्माण करते हैं। इन तत्वों की स्थिति ही क्रमश: स्थूल से सूक्ष्म होती गई है। 
 
 



और भी पढ़ें :