7 बड़े धर्मान्तरण और भारत बन गया बहुधर्मी देश

ईसाई धर्म : ईसा मसीह की सूली के बाद ही ईसा की पहली सदी में ही ईसाई संदेश को लेकर उनके शिष्य हिन्दुस्तान आ गए थे। उनमें से एक 'थॉमस' ने ही भारत में ईसा के संदेश को फैलाया। उन्हीं की एक किताब है- 'ए गॉस्पेल ऑफ थॉमस'। चेन्नई शहर के सेंट थॉमस माउंट पर 72 ईस्वी में थॉमस एक आदिवासी के भाले से मारे गए।
दक्षिण भारत में सीरियाई ईसाई चर्च सेंट थॉमस के आगमन का संकेत देता है। कहा जाता है कि थॉमस ने एक हिन्दू राजा के धन के बल पर भारत के केरल में ईसाइयत का प्रचार किया और जब उस राजा को इसका पता चला तो थॉमस बर्मा भाग गए थे। लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है यह हम नहीं जानते। माना जाता है कि सबसे पहले थॉमस से कुछ ब्राह्मणों को ईसाई धर्म में दीक्षित किया था।> > इसके बाद सन् 1542 में सेंट फ्रांसिस जेवियर के आगमन के साथ भारत में रोमन कैथोलिक धर्म की स्‍थापना हुई जिन्होंने भारत के गरीब हिन्दू और आदिवासी इलाकों में जाकर लोगों को ईसाई धर्म की शिक्षा देकर सेवा के नाम पर ईसाई बनाने का कार्य शुरू किया। इसके बाद भारत में अंग्रेजों के शासन के दौरान इस कार्य को और गति मिली। ईसाई मिशनरियों ने आदिवासियों की अशिक्षा तथा गरीबी का लाभ उठाकर धर्म-परिवर्तन कराया। धर्मांतरित व्यक्ति अंग्रेजों का वफादार बन गया और उनकी देशभक्ति भारत के प्रति न होकर इंग्लैंड के प्रति हो गई। इस तरह अंग्रेजों ने सैकड़ों वर्षों तक भारत पर राज किया।
'अमेरिकन वेद' के लेखक फ़िलिप गोल्डबर्ग अनुसार भारत में गरीब, अशिक्षित और असहाय हिन्दुओं को नौकरी, औषधि और धन का लाचल देकर जिस तरह से ईसाई बनाया जाता है वह निंद‍नीय है। गरीब हिन्दुओं को कहा जाता है कि हिन्दू देवताओं की पूजा करने के कारण से दुर्भाग्य की प्राप्ति होती है, क्योंकि जो देवी देवताओं की मूर्तियां है वह वास्तव में शैतान का रूप है; गांव के बलवान व्यक्ति के बारे में कहा जाता है कि वे दूसरे गावों वालों को धर्मांतरण के बदले में उनको रकम दी जाती है; और महिलाओं के बारे में ऐसा कहा जाता है कि उन्हें या तो अपने स्रोत या एक मील जाकर पानी लाने दिया जाए या चर्च के सामने जो नया कुआं सुविधापूर्वक खोदा गया है उससे लाए। इसकी कीमत क्या होगी ? वास्तव में 'धर्मांतरण।- हफिंगटन पोस्ट में छपे एक लेख से लिए गए अंश।

आरोप है कि अंग्रेजों के जाने के बाद मदर टेरेसा ने व्यापक रूप से लोगों को ईसाई बनाया। मदर टेरेसा का वास्तविक नाम एग्नेस गोनक्शा बोजाक्शिहउ था। मदर यूगोस्लाविया की रहने वाली एक रोमन कैथोलिक संगठन की सक्रिय सदस्य थीं। सिस्टर टेरेसा 3 अन्य सिस्टरों के साथ आयरलैंड से एक जहाज में बैठकर 6 जनवरी 1929 को कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट’ पंहुचीं। सन् 1949 में मदर टेरेसा ने गरीब, असहाय व अस्वस्थ लोगों की मदद के लिए ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की जिसे 7 अक्टूबर 1950 को रोमन कैथोलिक चर्च ने मान्यता दी। मानवता की रखवाली की आड़ में उन्हें ईसाई धर्म का प्रचारक माना जाता था। हालांकि उन्हें उनके सेवा कार्यों के लिए पद्मश्री, नोबेल पुरस्कार, भारतरत्न, मेडल ऑफ फ्रीडम से नवाजा गया था।

ईसाई बनने के लिए बपतिस्मा नामक एक ‍रिवाज होता है। वर्तमान में ईसाई धर्मावलंबियों की संख्या लगभग 2  करोड़ 78 लाख से ज्यादा है। इनमें कैथोलिक, आर्थोडॉक्स व अनेक प्रोटेस्टेंट संप्रदाय में विभक्त हैं। आज ईसाई मिशनरियों के कारण भारत के कई राज्यों के आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों में तनाव की स्थि‍ति हो चली है, क्योंकि ज्यादातर ईसाई संगठन ईसाई धर्म के प्रचार और सेवा के नाम पर गरीब हिन्दुओं का धर्मांतरण करने में लगे हैं। हालांकि ईसाई मिशनजरीज के लोग इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं।
 
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