ससुराल क्षेत्र में पहुंचीं मां नंदादेवी...

-ललित भट्‌ट देहरादून से

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जैसे-जैसे नंदा राजजात आगे बढ़ रही है स्थानीय लोकदेवताओं की भी डोलियां कैलाश की ओर उन्हें पहुंचाने के लिए आने लगी है। के दोनों मंडलों कुमाऊं और गढ़वाल के कई ग्रामीण मंदिरों में स्थापित लोक देवता भी नंदा से मिलने को आतुर दिखते हैं। अपने मायके पक्ष के अंतिम गांव से विदा होते वक्त नंदा तीन बार अपने मायके की तरफ लौटीं। उन्होंने ससुराल की तरफ जाने में आनाकानी की, लेकिन ग्रामीण महिलाओं ने उन्हें मनाया और कई स्थानीय फल फूल एवं श्रृंगार के साजोसामान के साथ विदा किया।

यह घड़ी अत्यधिक भावुक करने वाली थी। आज जब नंदा ने अपने ससुराल क्षेत्र के पहले पड़ाव को पार किया तो वह सीधे ही आगे बढ़ती गई सभी ने आशीर्वाद मांगा, लेकिन किसी ने न रोकने की कोशिश की न ही मां नंदा ने मायके की तरह यहां ठहरने का मोह दिखाया। लेकिन, जिसने जो मांगा तथास्तु कहकर आशीर्वाद दिया। लोगों ने भी काफी उम्मीदें लगाई हैं।

उधर नंदा देवी राजजात में शामिल होने के लिए अल्मोड़ा से लाया जाने वाला राजछत्र अब उनके राजजात में शामिल होने के लिए आगे बढ़ रहा है। पांच महीने के चौसिंगिया खाडू़ भी अब तेजी से शिव की त्रिशूल पर्वत की चोटी की ओर अग्रसर है। इसे देखने एवं पूजने के लिए ग्रामीणों का तांता लगा है। पहले खाड़ू को देखते हैं फिर नंदा के जयकारे लगाकर नंदा की छंतोलियों को चावल पुष्प एवं अन्य तरह से पूजा जा रहा है।
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क्षेत्रपाल, भूम्याल और बाऊ देवता समेत लाटू देवता भी इस यात्रा में शामिल होने के लिए कैलाश पथ पर नंदा राजजात के साक्षी बन रहे हैं। पूरे क्षेत्र से लगभग इस बार नंदा राजाजात जाने के लिए चार सौ छंतोलियां तैयार हैं।

नंदा राजजात यात्री जिन नदी, घाटियां, गांव, गधेरों से होकर गुजर रही है, वहां ढोल, दमाऊ, मंकोर एवं मृदंग की ध्वनियां गुंजायमान होकर रोमांचित कर रही हैं। अब कुमाऊं क्षेत्र की नंदा डोलियां भी इस राजजात में नंदा के साथ मिल जाएंगी। आज मां नंदा की डोली एवं राजजात चौसिंगिया खाडू के नेतृत्व में देवराड़ा पहुंचेगी। समुद्रतल से 1210 मीटर की ऊंचाई पर अवस्थित यह गांव थराली के बिलकुल सामने पड़ता है। थराली तक मोटर सड़क है।

इस देवराड़ी गांव का विशेष महत्व है। यहां मान्यता के अनुसार देवी नंदा वर्ष में छह माह के लिए प्रवास करने भी आती हैं। इस क्षेत्र में राजराजेश्वरी के रूप में उन्हें देखा जाता है। यहां देवी राजजात आने पर रातभर जागरण कर देवी के महात्म्य के गीत-जागर आदि गाए जाते हैं।
अपने पीहर के पहले पड़ाव से मां नंदा अपनी श्रीनंदादेवी राजजात के साथ आगे के पड़ाव को प्रस्थान कर गईं। रविवार रात्रि अपने ससुराल के पहले पड़ाव में नंदा का खूब स्वागत हुआ। जागर गाए गए, लेकिन जागरों के सुर यहां बदल गए हैं। यहां बेटी के बिछोह का दर्द उनमें न होकर एक बहू के घर आने की खुशी है। नंदा के महात्म्य एवं भोलेशंकर महादेव के उनके विरह में धूनी रमा देने के प्रसंग सुनाए जा रहे हैं। मां नंदा अपने मायके से ससुराल क्षेत्र में आ गई हैं तो यहां लोगों का मिजाज मायके के लोगों से जुदा है।



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