रमजान 2019 : आ गया रहमतों और नेकियों का महीना

Ramadan

- मुईन अख्तर खान

रमजान का महीना रहमतों, बरकतों, नेकियों और नियामतों का है। इसकी आमद पर दुनियाभर में मुसलमान खुशी महसूस करते हैं। अरबी भाषा में गरमी की शिद्दत को रम्ज और धूप से तपती हुई जमीन को रमजा कहा जाता है। इस दौर में चूंकी- रमजान-उल-मुबारक का महीना सख्त गर्मी में आता था, इसलिए इसे रमजान कहा जाने लगा। एक रिवायत के मुताबिक रमजान अल्लाह के निन्यानवे नामों में से एक है। इसलिए लोग इसे एहतराम के साथ शहरे-रमजान अर्थात माह-ए-रमजान भी कहते हैं। सभी लोग रूहानी उम्मीदों के साथ इस महीने का इस्तकबाल करते हैं। रमजान सब्र का महीना है और सब्र का फल जन्नत है।

इसका मतलब यह है कि रोजेदार जब इस महीने में सिर्फ अल्लाह के लिए अल्लाह के हुक्म से और अल्लाह की खुशी के लिए अपनी पसंद की तमाम चीजें छोड़कर अपनी ख्वाहिशात को रोककर सब्र करता है, तो अल्लाहपाक ऐसी कुरबानी देने वाले बंदों को जन्नत की राहतें और लज्जतें अता फरमाएगा। यह महीना हमदर्दी का है। इस महीने में हर रोजेदार को भूखे की भूख और प्यासे की प्यास का एहसास होता है। उसे पता चलता है कि दुनिया के जिन लोगों को गरीबी की वजह से फाके होते हैं, उन पर क्या बीतती होगी। रोजे से आदमी में इंसानियत के प्रति हमदर्दी और गम ख्वारी का जज्बा पैदा होता है।

माहे रमजानुल मुबारक में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। इस मुबारक माह को साल के तमाम महीनों का सरदार कहा जाता है। पैगंबर हजरत मोहम्मद ने फरमाया कि रमजान महीने का शुरू हिस्सा रहमत, दूसरा हिस्सा मगफिरत और तीसरा हिस्सा जहन्नुम की आग से आजादी का सबब है। जो शख्स अपने सेवक से इस महीने में काम हल्का लेगा, अल्लाह तआला उसके गुनाह बख्श देगा और जहन्नुम की आग से आजाद कर देगा। रमजानुल मुबारक में एक अहम अम्ल-नमाज-ए-तरावीह भी है। उस रात की तरावीह (नमाज) को सवाब (पुण्य) की चीज बताया गया है। रोजा शरीर को अंदर और बाहर दोनों तरह से पाक और साफ करता है।

इस महीने में एक रात है शबे कद्र, जो हजारों महीनों से बढ़कर है। अल्लाह तआला ने उसके रोजे को फर्ज फरमाया है। जो शख्स इस महीने में किसी नेकी के साथ अल्लाह का कुर्ब्र (निकटता) हासिल करे, वह ऐसा है, जैसा कि गैर रमजान में फर्ज अदा किया और जो शख्स इस महीने में किसी फर्ज को अदा करे वह ऐसा है, जैसा कि गैर रमजान में सत्तर फर्ज अदा करे। इस महीने में जो शख्स किसी रोजेदार का रोजा इफ्तार कराए, उसके लिए गुनाहों के माफ होने और आग से खलासी का सबब होगा और रोजेदार के सवाब की मानिंद उसको सवाब मिलेगा। मगर इस रोजेदार के सवाब से कुछ कम नहीं किया जाएगा।

सहाबा ने अर्ज किया, 'या रसुलल्लाह! हममें से हर शख्स तो इतनी हैसियत नहीं रखता कि रोजेदार को इफ्तार करा सके।' इस पर आप सल्ल. ने फरमाया कि पेट भर खिलाना अनिवार्य नहीं है। एक खजूर से कोई इफ्तार करा दे या एक घूंट पानी पिला दे या एक घूंट लस्सी पिला दे, उस पर अल्लाह मर्हमत (कृपा) फरमा देते हैं। जो शख्स किसी रोजेदार को पानी पिलाए, हक तआला (कयामत के दिन) मेरी हौज से उसको ऐसा पानी पिलाएंगे जिसके बाद जन्नत में दाखिल होने तक प्यास नहीं लगेगी।

मुसलमान हर साल पूरे एक महीने तक नफ्स और जिस्म की तरबीयत हासिल करते हैं और जब्त व बर्दाश्त की आदत डालते हैं। रमजान के मुबारक महीने में वक्त की पाबंदी की बेमिसाल तरबीयत हासिल होती है। इस महीने में नेकी, हमदर्दी, सहयोग और भाईचारे का एहसास अता होता है। गरीब और अमीर को एक-दूसरे के एहसासात और जज्बात को समझने का मौका मिलता है। इंसानी सेहत को बरकरार रखने मे जो चीजें कारामद हैं, वे तमाम चीजें इस महीने में हासिल होती हैं। रोजेदार के लिए पैगंबर सा. (सल्ल.) का फरमान है कि जब रोजा हो तो रोजेदार को चाहिए कि वे न तो ख्वाहिश-ए-नफस की बात करें और न ही शोर-गुल करें।


 

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