देवशयनी: वारकरी संप्रदाय का विट्ठल दर्शन

पंढरी की वारी, वारकरी और उनका मैनेजमेंट

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देवशयनी एकादशी पर के कोने-कोने से वारकरी पालकियों और दिंडियों के साथ पंढरपुर में के दर्शन को पहुँचते हैं। दर्शन को उमड़ने वाले इस हुजूम की संख्या का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। महाराष्ट्र अनेक महान संतों की कर्मभूमि है। इन संतों के जन्म या समाधि स्थलों से ये पालकियाँ व दिंडियाँ निकलती हैं, जो लंबा सफर तय कर पंढरपुर पहुँचती हैं।

पालकी के साथ एक मुख्य संत के मार्गदर्शन में समूह यानि दिंडी (कीर्तन/भजन मंडली), चलता है, जिसमें शामिल होते हैं वारकरी। महाराष्ट्र में ईश्वर के सगुण-निर्गुण और बहुदेव रूप की विविधता को एकरूप या एकता में बाँधने का कार्य किया है वारकरी संप्रदाय ने। हर साल पंढरपुर की वारी (तीर्थयात्रा) करने वाला वारकरी कहलाता है,जो विठू का भक्त है।

पंढरपुर के वारकरी संप्रदाय के उपास्य विट्ठल की प्राचीनता अट्ठाईस गुना अट्ठाईस यानी सात सौ चौरासी युगों से अधिक बताई जाती है। इतने लंबे समय से श्री विट्ठल अपने भक्त की दहलीज पर प्रतीक्षा में कमर पर हाथ धरे खड़े हैं कि वे उन्हें बैठने को तो कहे, जो अब तक भक्त ने कहा नहीं।

साल-दर-साल लाखों मील का सफर तय कर आने वाले सैलानी परिंदों के मानिंद है वारकरी। कितना सफर, किस राह से कितनी देर में, कब और कहाँ रुकना है, कहाँ भोजन करना है, सबका समय सालों-साल पीढ़ियों से तय है। वैसे तो कोई इसे भूलता नहीं और यदि कोई भूला भी तो उसे वहीं छोड़ वारी आगे बढ़ जाती है। एक पीढ़ी खत्म, दूसरी आती है, कोई किसी से पूछता नहीं। चलते-चलते, उड़ते-उड़ते सब अपने-आप समझ जाते हैं। नई पीढ़ी हाथों-हाथ तैयार होती है। हर वारकरी एक दिंडी का सदस्य होता है,जिसका एक नंबर व चलने का क्रम तय है, जिसमें अनुशासन सिखाने के लिए रिंग मास्टर नहीं होता। सब अपने रिंग मास्टर खुद होते हैं।

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हर दिंडी का एक मुखिया होता है, जिसके पास खर्च हेतु वारकरी 4-5 सौ रुपए जमा करते हैं। सामान लाने ले-जाने हेतु किराए का टेम्पो भी तय होता है, जिस पर मुखिया अगले मुकाम पर पहले ही से पहुँच कर खाने-पीने का बंदोबस्त करता है, यही उसकी वारी है। खर्च के पैसे वह कभी भी खुद पर खर्च नहीं करता, न ही कभी ऐसा हुआ हो कि कोई पैसे लेकर चंपत हुआ हो। सारा व्यवहार बिलकुल साफ पारदर्शी इंसान की ईमानदारी पर विश्वास रखने वाला।

एक दिंडी यानी 250-300 लोगों का परिवार, जो सालभर एक-दूसरे के संपर्क में रहता है। वारी के दौरान प्यार आत्मीयता के साथ लाया नाश्ता लड्डू-चकली,चिवड़ा एक-दूसरे को खिलाते अपनी दुनियादारी का दर्द बाँटते हैं। सास-बहू व भाई-भाई के आपसी झगड़े वारी में शामिल होने पर कैसे खुद-ब-खुद खत्म हुए, इसके तो कई किस्से सुनने को मिल जाएँगे।

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- ज्योत्स्ना भोंडवे
हर वारकरी की जीवन की अंतिम अभिलाषा यही होती है कि प्रभु, हमें मुक्ति न देते हुए फिर मानव जन्म ही देना ताकि हर जन्म में विट्ठल की भक्ति का लाभ मिले। वारी के 20 दिनों में जमा सुख की पूँजी को सालभर किफायत के साथ खर्च करते रहना और इंतजार करना फिर अगली वारी का, यही सीधा सच्चा मैनेजमेंट है वारी का।

 

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