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आत्महत्या करना अस्तित्व का अनादर है- ओशो

Written By ओशो
Updated: सोमवार, 15 जून 2020 (12:27 IST)
मुझे पता है कि तुम जीवन से ऊब गए हो। यदि तुम सचमुच ऊब गए हो तो आत्महत्या नहीं करो, क्योंकि आत्महत्या तुम्हें फिर इसी जीवन में घसीट लाएगी और हो सकता है कि इससे भी अधिक भद्दा जीवन तुम्हें मिले, जैसा कि अभी तुम्हारा है; क्योंकि आत्महत्या तुम्हारे भीतर और भी अधिक गंदगी पैदा कर देगी।
 
आत्महत्या करना अस्तित्व का अनादर है। अस्तित्व ने तुम्हें विकसित होने के लिए जीवन का अवसर दिया और तुम इस अवसर को यूं ही व्यर्थ गंवा देते हो। और जब तक कि तुम विकसित नहीं होते और विकसित होकर बुद्ध नहीं बन जाते, तब तक तुम जीवन में बार-बार फेंके जाओगे। लाखों बार पहले भी यह हो चुका है। अब समय है, अब जागो! इस अवसर को चूको मत।
 
यहां मेरे साथ रहकर असली आत्महत्या की कला सीखो। असली कला में अपनी देह को नष्ट नहीं किया जाता है। देह सुंदर है, देह ने कुछ भी गलत नहीं किया है। यह तो मन है, जो असुंदर है। आत्मा भी सुंदर है, लेकिन देह और आत्मा के बीच कुछ है, जो न तो देह है, न ही आत्मा- यह बीच की घटना ही मन है।
 
यह मन ही है, जो तुम्हे बार-बार गर्भ में घसीट लाता है। जब तुम मरते हो, यदि तुम आत्महत्या करते हो, तब तुम जीवन के बारे में ही सोच रहे होओगे। आत्महत्या करने का मतलब है कि तुम जीवन के बारे में सोच रहे हो। तुम ऊब चुके हो, जीवन से थक चुको हो, तुम पूरा अलग ही जीवन चाहते हो, इसी कारण तुम आत्महत्या कर रहे हो, न कि तुम जीवन के खिलाफ हो। तुम सिर्फ 'इस' जीवन के खिलाफ हो।
 
हो सकता है कि जैसे तुम हो, वैसा तुम नहीं चाहते हो। हो सकता है कि तुम सिकंदर, नेपोलियन या हिटलर बनना चाहते हो, हो सकता है कि तुम इस दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति बनना चाहते हो, और तुम हो नहीं। यह जीवन असफल हो गया। तुम प्रसिद्ध होना चाहते थे, सफल होना चाहते थे। अब इस जीवन को ही तुम नष्ट कर देना चाहते हो।
 
लोग आत्महत्या इसलिये नहीं करते हैं कि वे जीवन से सच में थक गए हैं, बल्कि इस कारण करते हैं क्योंकि यह जीवन उनकी मांगें पूरी नहीं कर रहा। लेकिन कभी भी किसी की मांगें जीवन पूरी नहीं करता है। तुम हमेशा कुछ न कुछ चूकते ही चले जाओगे। यदि तुम्हारे पास धन है, पर हो सकता है कि तुम सुंदर न हो। यदि तुम सुंदर हो, तो हो सकता है कि तुम बुद्धिमान न हो। यदि तुम बुद्धिमान हो, पर हो सकता है कि तुम्हारे पास धन न हो। और, हो सकता है कि कोई हर चीज पा ले, तब भी यह कैसे मदद करेगा? तुम अतृप्त रहोगे।
 
हर जीवन में यही बातें दोहराती जाती हैं, देह बदल जाती है, लेकिन दिशा वही रहती है। लोग सोचते हैं कि जो आत्महत्या करते हैं, वे जीवन के खिलाफ हैं। यह सत्य नहीं है। वे जीवन के प्रति बहुत अधिक लालसा रखते हैं, वे जीवन के लिए बहुत अधिक वासना रखते हैं। और चूंकि जीवन उनकी वासनाएं पूरी नहीं करता, तो गुस्से में, तनाव, विषाद और हताशा में वे स्वयं को नष्ट कर लेते हैं।
 
मैं तुम्हें आत्महत्या का सही तरीका सिखाऊंगा। देह को नष्ट करके नहीं, देह तो अस्तित्व का सुंदरतम उपहार है। मन अस्तित्व का उपहार नहीं है, मन समाज से संस्कारित है। देह उपहार है एवं आत्मा उपहार है और इन दोनों के बीच समाज तुम्हारे साथ तरकीब खेलता है; इसलिये समाज ने मन को बनाया। यह तुम्हें महत्वाकांक्षा देता है, यह तुम्हें ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, हिंसा देता है, यह तुम्हें हर तरह की गंदी बीमारियां देता है।
 
लेकिन इस मन का अतिक्रमण किया जा सकता है, मन को एक तरफ रखा जा सकता है। यह मन जरूरी नहीं है।
मैं तुम्हारे सामने बैठा हूं, और अपने अनुभव से तुम्हें कह रहा हूं, अपने अधिकार से कह रहा हूं कि मन को एक तरफ रखा जा सकता है। यह बड़ा आसान है, तुम्हें बस इसका तरीका आना चाहिए।
 
और, आत्महत्या में मरना इतना पीड़ादायी है, क्योंकि यह प्राकृतिक बात नहीं है, यह सर्वाधिक अप्राकृतिक बात है। कभी भी कोई वृक्ष आत्महत्या नहीं करता, सिर्फ आदमी करता है क्योंकि सिर्फ आदमी इतना पागल हो सकता है। प्रकृति आत्महत्या के बारे में कुछ नहीं जानती, यह आदमी की खोज है। यह सबसे अधिक भद्दा और कुरूप कृत्य है।
 
और जब कभी तुम स्वयं के साथ कोई बहुत ही भद्दी और कुरूप बात करते हो तो तुम आशा नहीं रख सकते कि तुम्हें आगे एक बेहतर जीवन मिलेगा। तुम मन की बेहद निकृष्ट दशा में मरोगे, और तुम बहुत ही निकृष्ट गर्भ में प्रवेश कर लोगे।
 
लेकिन आत्महत्या की जरूरत ही क्या है? जरा प्रश्न करो!
 
तुम निश्चित ही गलत ढंग से जीये हो, इसी कारण जीवन एक सुंदर गीत नहीं बना। तुम निश्चित ही मूर्खतापूर्ण ढंग से जीये हो, मूढ़तापूर्वक, अज्ञानी की तरह। इसी कारण जीवन में उत्सव नहीं आया। तुम सितारों के साथ आनंद में नाच नहीं सकते और न फूलों के साथ नाच सकते और न हवाओं के साथ, न बरसात में मस्त होकर नाच सकते क्योंकि तुम गलत तरीके से जीये हो, जो तुम्हारे जैसे ही लोगों ने तुम्हारे ऊपर थोप दिए हैं।
 
यह सतत चलने वाली घटना है। मूढ़ता स्वतः सतत चलती रहती है। माता-पिता अपने बच्चों को अपनी मूढ़ता दिए चले जाते हैं और यही बच्चे अपने बच्चों को वे सारी मूढ़ताएं सौंप देते हैं। यह वंशानुगत विरासत है। इसे परम्परा कहते हैं, इसे विरासत कहते हैं, संस्कृति कहते हैं...बड़े-बड़े नाम हैं।
 
तुम जिस भांति अब तक जीते रहे हो, उस पर विचार करो और तब तुम्हारे जीवन में एक नयी तरह की बुद्धिमत्ता आएगी और तुम्हारा जीवन अधिक प्रखर होगा। अपने संस्कारों पर विचार करो। अब तक जैसे जीये हो, उस पर ध्यान दो- कहीं बुनियादी रूप से कुछ गलत हुआ है। पक्षी गीत गा रहे हैं और वृक्ष, और फूल...यह अनंत अस्तित्व- यह जगह आत्महत्या करने की है? इस जगह नृत्य करो, गीत गाओ, उत्सव मनाओ, प्रेम करो और प्रेम करने दो।
 
और यदि तुम इस अस्तित्व को प्रेम कर सकते हो, यदि तुम इस अस्तित्व के आशीर्वाद महसूस कर सकते हो, तो मैं तुमसे वादा करता हूं कि जब कभी तुम मरोगे, तुम वापस लौटकर नहीं आओगे- क्योंकि तुमने पाठ सीख लिया। अस्तित्व कभी किसी को फिर वापस नहीं भेजता यदि उसने जीवन का पथ सीख लिया हो। यदि तुम आनंदित होना सीख लेते हो, तुम स्वीकार्य होओगे। तब उच्चतर रहस्य के लिए तुम्हारे द्वार खुल जाएंगे। तब जीवन के अंतरतम रहस्यों में तुम्हारा स्वागत होगा। इसे ही मैं असली आत्महत्या कहता हूं, और इसके लिए मैंने नाम रखा है- ध्यान।
 
- ओशो रजनीश
( "बी सेटल एंड नो" प्रवचनमाला से अंश )
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