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विदेशों में लहराया परचम

दुनियाभर में छाया बाग प्रिंट

बाग प्रिंट
- जय तापड़िया
SUNDAY MAGAZINE

धार जिले के छोटे से कस्बे बाग में कपड़ों पर तैयार की जाने वाली बाग प्रिंट का दायरा अब सीमित नहीं रहा। अपनी खूबसूरती से इसने कई बार भारत का नाम दुनिया में गौरवान्वित किया है। प्राकृतिक रंगों द्वारा छापे गए ये कपड़े ईको फ्रेंडली होने के कारण बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं और ऐसे में प्रदेश के साथ देश-विदेश के कई शहरों में इनकी जबर्दस्त माँग बन गई है।

इस हस्तशिल्प कला से यहाँ के 7 शिल्पकार राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किए जा चुके हैं। इनके अलावा 11 शिल्पकार प्रदेश स्तरीय सम्मान पा चुके हैं। मध्यप्रदेश के दक्षिण-पश्चिम अंचल में इंदौर से 150 किलोमीटर तथा राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 59 पर स्थित धार से 90 किलोमीटर की दूरी पर प्राचीन नगर बाग स्थित है। यहाँ बाघनी नदी के तट पर बौद्धकालीन बाग गुफाएँ भारतीय पुरातत्व की अमूल्य धरोहर हैं।

बाग प्रिंट की ख्याति देखते हुए दिल्ली स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन डिजाइन (निफ्ट) ने इस कला की ओर रुख किया। निफ्ट के छात्रों ने बाग आकर उन्हीं ठप्पों की सहायता से बाग प्रिंट को आधुनिक रूप देने के लिए कई तरह के अभिनव प्रयोग किए और शहर के लोगों को आकर्षिक किया। मुंबई के फैशन डिजाइनरों ने बाग प्रिंट के परिधानों को लक्मे फैशन शो और अन्य अवसरों पर रैंप पर उतारा। दिल्ली, मुंबई जैसे तमाम बड़े शहरों में बाग प्रिंट के सूट और साड़िया बेहद लोकप्रिय हो रही हैं। यही कारण है कि कई सारे टीवी चेनल के सीरियलों में बाग प्रिंट के परिधान देखे जा सकते हैं।

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शिल्पी मुबारिक इब्राहिम खत्री ने बताया कि 15 वर्ष पूर्व ज्यादातर कॉटन पर ही प्रिंट किया जाता था। लेकिन अब सिल्क, कोसा, शिफान, क्रेप आदि वस्त्रों पर यह छपाई होने लगी है। यहाँ के प्रशासन और सरकार ने भी इस कला को प्रोत्साहित किया है। सरकार ने बाग प्रिंट के प्रदर्शन और विपणन के लिए शिल्पियों को देश के बाहर विदेशों की यात्रा करवाई ताकि विदेशों में प्रदर्शन और बिक्री से बाग प्रिंट के व्यवसाय को चार चाँद लगे।

व्यापार मेलों से इसने 1984 में विदेशी धरती पर कदम रखा जो अनवरत जारी है। अब तक हॉलैंड, स्पेन, अमेरिका, सूडान, श्रीलंका, सिंगापुर, फ्रांस, जर्मनी, पेरिस, बेल्जियम, चीन, दुबाई, ब्राजील, बहरीन आदि कई देशों में बाग प्रिंट ने अपना परचम लहराया। विदेशों में भी बाग प्रिंटरों को कई तरह के अवार्ड मिल चुके हैं।

दुनिया में बाग की पहचान बाग प्रिंट और बाग गुफाओं से है लेकिन दोनों का समन्वय कर बाग प्रिंट की बेहतरीन कलाकृति तैयार करने वाले युवा शिल्पी मुबारिक इब्राहिम खत्री ने अभिनव प्रयोग किया। अब तक कपड़ों पर छपाई परंपरागत ठप्पों (ब्लॉक्स) से की जाती रही हैं लेकिन बाग के इस शिल्पी ने 5वीं से 7वीं शताब्दी की पुरातन बाग गुफा की चित्रकारी को कपड़े पर उकेरकर एक नया प्रयोग किया। इसके लिए उन्होंने बाग गुफाओं की चित्रकारी के छायाचित्रों के ठप्पे तैयार किए और रेशम, सिल्क साड़ी पर बाग गुफा की चित्रकारी को रंगों से भर दिया।

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आदिवासी बहुल इस क्षेत्र के लिए बाग प्रिंट ने रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराए। जिला पंचायत और राज्य शासन के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाकर युवाओं के साथ महिलाओं को इस क्षेत्र में जोड़ने का प्रयास किया गया। इससे अनुसूचित जाति और जनजाति के दो हजार से अधिक परिवार इस कला से जुड़े और उन्होंने आय के अतिरिक्त साधन जुटाए।

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित इब्राहिम खत्री ने बताया कि बाग प्रिंट तैयार करने में अब भी 600 वर्ष पुरानी प्रक्रिया अपनाई जा रही है। भले ही आज शिल्पकार परंपरागत ब्लॉक को नया आकार-प्रकार देकर छपाई कर रहे हैं लेकिन इन सबके बावजूद वानस्पतिक रंग वही हैं। विभिन्न प्रकार के रंग बनाने में बाग का पानी भी महत्वपूर्ण है। बाग प्रिंट में हयड़ व अनार के छिलकों से पीला, हीरा कशीश व लोहे की पत्ती से काला रंग प्रमुखता से उपयोग किया जाता है। लाल रंग बनाने के लिए एलीजरीन और धावड़े के फूल का भी उपयोग किया जाता है। वानस्पतिक रंगों के उपयोग से रंग इतना पक्का होता है कि कपड़ा फट जाए पर रंग हल्का नहीं होता। इस प्रिंट के रंगों की खूबी यह है कि यह भड़कीला तथा आँखों को खटकने वाला नहीं होता।

खत्री के अनुसार बाग प्रिंट तैयार करने में कई तरह की प्रोसेस हैं। सबसे पहले कपड़े पर लगा कलफ पानी में अच्छी तरह भिगोकर निकालते हैं। इसके बाद अरंडी तेल, संचोरा एवं बकरी की मेंगनी में घोल (खारोनी) में कपड़े को 24 घंटे भिगोकर रखते हैं। इसे धूप में सुखाने के बाद ताँबे के बड़े बर्तन में रखे खारोनी में पैर से कुचला जाता हैं।

यह क्रिया ुखाकर पुनः की जाती है। फिर कपड़े को शुद्ध पानी में गला कर हयड़ पावडर के घोल में भिगोकर सुखा लिया जाता है। इसके बाद प्रिंट किया जाता है। इसे आठ दिन तक ऐसे ही रखा रहने दिया जाता हैं। फिर नदी के गहरे पानी में धुलाई कर फिर गर्म पानी में धावड़ी फूल और एलीजरीन रंगों में उबाला जाता है।