Animal love : बचपन में मिले हमें संस्कार, हर जीव से करो प्यार


ये चित्र देखते हुए शायद आपको भी अपने वो दिन याद आए हों जब मोहल्ले के बच्चे कच्छीघोड़े
(जिसको अंग्रेजी में ‘ग्रॉसहॉपर’ कहते हैं) को धागे से बांध कर के उड़ा-उड़ा कर खेला करते थे। कच्छीघोड़ा हरे रंग का कड़क सा कीड़ा होता है। उसके लम्बे-लम्बे पांव होते हैं जो मुड़े रहते हैं। लम्बी छलांग मार कर उड़ते-चलते हैं। बच्चे जब उसे अपने धागे के लूप में पिरो कर उड़ाते थे, तब वो बेचारा केवल उस धागे की लम्बाई के दायरे तक ही छलांग लगा पता था।बच्चे अपनी मर्जी से उसे छलांगें लगवाते थे पर कभी बच्चों को उस बेजुबान को जान से मारते नहीं देखा।(मार भी देते हों तो पता नहीं, पर हमारे साथी ऐसा नहीं करते थे।) वो उनका खिलौना था,केवल खिलौना।

हां ये बात अलग है कि उस प्राणी को कष्ट तो होता ही होगा। ऐसे ही कई खेल जो जानवरों, प्राणियों ,कीट-पतंगों के साथ मनोरंजन के लिए बच्चे खेला करते थे, तब हमेशा उन्हें टोका जाता था,रोका जाता था।तितली पकड़ना हो या गिलहरी या कोई भी अन्य प्राणी, जीव-जंतु, पक्षी उनको कष्ट पहुंचाना घोर पाप की श्रेणी में आता था और यहीं से शुरू होता है घर के,
मोहल्ले के सदस्यों के द्वारा संवेदना और दया का मूल पाठ पढ़ाना।
भारतभूमि पर जहां के जनमानस की नन्हीं चींटियों से लेकर गजराजों तक के लिए दाना-खाना-पानी मुहैय्या करने की संस्कृति है, उन्हीं का सांस्कृतिक, धार्मिक, पारंपरिक बाहुल्य है वहां पर बढती पशु, पक्षियों और यहां तक कि मनुष्यों के लिए बढ़ती क्रूरता का विषय गहन चिंताजनक है।

बचपन से ही हमें सिखाया जाने लगता है कि यदि तुम इन्हें कष्ट दोगे तो अगले जन्म में ‘तुम यही जानवर बनोगे और तुम ‘ये’ तब समान कर्म तुम्हारे साथ होगा जब तुमको मालूम पड़ेगा’। और ये बात दिल में गहरे उतर जाती थी। प्राणिमात्र के कष्ट को महसूस करवाने की इस संजीदा प्रक्रिया का ये सदा सरल सा मानसिक इलाज हुआ करता था।

बिना किसी तर्क-कुतर्क के सर्वमान्य। कभी नमक भी थाली में ज्यादा ले कर फेंकने में जाए तो कहते थे ‘आंखों की पलक से पलकों को उल्टा कर के उठाना पड़ेगा। कोई प्राणिमात्र जाने-अनजाने अपनी गलती से या जानबूझ कर अपने से मर जाए तो कहते थे अब इसको डबल वजन का, अपनी कमाई से सोने की धातु का बनवा तुम्हें समर्पित करना पड़ेगा भगवान को प्रायश्चित के साथ।

सारे तर्क, कथन, बंधन कितने सही, कितने गलत-नहीं जानते थे, पर इतना जरुर है कि सभी धर्मों का एक धर्म होता है दया...प्राणियों पर दया। उनको जीने देने का अधिकार। वे निर्बल हैं,निर्दोष हैं...उनकी दुनिया में हमने कब्ज़ा किया है स्वार्थ से। कहां जाएं वो? किसके पास अपनी गुहार लगाएं?
आये दिन जंगली/पालतू जानवरों को पीट-पीट कर मार डालने की ख़बरें... कभी हाथी,कभी गाय,कभी बंदर...कभी कुत्ता...कैद कर लेने की ख़बरें...बंदर के बच्चों को धोखे से गाड़ी की डिक्की में भर के ले जाने की घटिया हरकत...घोड़े-घोड़ी को बरातों में मार-मार कर नाचने के लिए मजबूर करते मालिक...नाग पंचमी की आड़ में सांपों पर कहर ढाते...उनसे कहीं अधिक खुद में जहर पाले हुए इंसानों की फितरत...और कुछ दिन पहले वायरल हुए एक भैंस...एक निरीह...बेजुबान...मासूम...निर्दोष प्राणी को बाढ़ के बहते हुए तेज पानी की तरफ जाते देखने के बावजूद उसे रोकने के बजाए, जान बचाने के बजाए जोर जोर से क्रूरता के साथ अट्टाहास करते
कुछ युवकों का झुण्ड उसका वीडियो बेशर्मी से निकालते हुए उसे मौत के मुंह में जाते हुए देखने का आनंद उठा रहे और जोर जोर से भगवान के नाम से जयकारा लगा रहे।

दिल दहला देने वाला ये कृत्य विभत्स और भयंकर है। हथिनी को, गाय को विस्फोटक खिला देना, बिल्लियों-कुत्तों को फांसी दे देना, जानवरों पशु-पक्षियों को बेरहमी से बांध कर कूटना-पीटना। इन सबके साथ हो रहे ये पापकृत्य जितने दर्दनाक हैं। उससे कहीं ज्यादा दर्दीला और भयंकर है मानवीयता और दया के मूल तत्वों का दिलों में दफन हो जाना। मांसाहारियों में भी दया का मूल भाव तो रहता ही है। जानवर भी अकारण किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते...फिर हम तो इन्सान हैं...
तो क्या ये सच होता जा रहा है कि मनुष्य धरती का सबसे स्वार्थी,घटिया,मौकापरस्त,निर्दयी,घमंडी और जाहिल जानवर है। अपने आसपास ही हम अपने पर्यावरण से जुड़े जीव-जानवर, प्राणी, पेड़-पौधों का जो हमारे लिए ही जरूरी और लाभप्रद हैं उनका संरक्षण ही यदि नहीं कर पा रहे तो इस धरती पर जीने का कोई अधिकार भी नहीं है...

धिक्कार है हमारा मनुष्य जीवन जो हम अपने बच्चों में ये संस्कार ही नहीं दे पा रहे हैं। कितने ही चन्द्र यान छोड़ लें हम...चन्द्र विजय का जश्न मना लें हम ...पर यदि इस धरा को, इसपर रहने वाले प्राणियों को सुरक्षित जीवन नहीं प्रदान कर सके तो ये हमारी पराजय है....घोर पराजय...इस मानव योनि की नैराश्य के गहन अन्धकार के साथ....



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