मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कोई जोड़ नहीं

राजबाड़ा टू रेसीडेंसी

Author अरविन्द तिवारी| पुनः संशोधित सोमवार, 28 दिसंबर 2020 (14:38 IST)
बात यहां से शुरू करते हैं : वास्तव में शिवराजसिंह चौहान की कोई जोड़ नहीं। कोरोना की आड़ लेकर नगरीय निकाय चुनाव डेढ़-दो महीने आगे बढ़वाकर मुख्यमंत्री ने एक तीर से कई निशाने साध लिए। अब भाजपा के कार्यकर्ता राम मंदिर निर्माण के लिए विश्व हिंदू परिषद के 15 जनवरी से 15 फरवरी तक चलने वाले धन संग्रह अभियान में कदम से कदम मिलाकर सहभागी बन सकेंगे। संघ की अगुवाई में चलने वाले इस अभियान के दौरान धन संग्रह के लिए घर-घर जाकर जो संपर्क होगा उसका सीधा फायदा नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा को मिलेगा। चुनाव में भाजपा कार्यकर्ताओं की व्यस्तता के कारण अगर मंदिर के लिए धन संग्रह प्रभावित होता, तो कठघरे में मुख्यमंत्री को ही खड़ा होना पड़ता। सो, एक झटके में इस झंझट से भी मुक्ति पा ली।

अरुण यादव को मिली संजीवनी : किसान आंदोलन के मुद्दे पर मध्यप्रदेश कांग्रेस में दिग्विजयसिंह का अरुण यादव को प्रमोट करना कई लोगों को हैरान कर रहा है। लोग इस जुगलबंदी का जो भी मतलब निकालें लेकिन पिछले कुछ समय से हाशिये पर चल रहे अरुण यादव को तो इससे संजीवनी मिल ही गई है। दरअसल किसानों के मुद्दे पर सिंह ने यादव को फ्रंट पर आकर लीड करने के लिये सार्वजनिक रूप से कहा। दिग्विजयसिंह ने एक ट्वीट कर कहा कि अपने पिता सुभाष यादव की तरह अरुण को किसान मुद्दे का आगे बढ़कर नेतृत्व करना चाहिए। इस समीकरण ने अरुण यादव को फिर से मध्यप्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति करने का मौका दे दिया है क्योंकि दिल्ली में कुछ शुभचिंतक हैं जो ये मानते हैं कि अरुण यादव अभी भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस के सबसे बड़े ओबीसी चेहरा हैं।

बुरे फंसे नरेन्द्र‍ सिंह तोमर : केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर की स्थिति बहुत विचित्र हो गई है। किसान आंदोलन के फैलाव को रोकने में भले सरकार और बीजेपी संगठन जी जान से लगे हैं, लेकिन जमीन पर किसान ये समझ रहा है कि ये कृषि कानून किसान के नहीं बल्कि कारपोरेट के हितों का पोषण करते हैं। तोमर के संसदीय क्षेत्र मुरैना के साथ ग्वालियर चम्बल के गांवों में 'मुन्ना भैया' यानी कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर को लेकर तो कई तरह की बातें भी होने लगी हैं। इसी माहौल का असर था कि ग्वालियर के किसान सम्मेलन में तोमर को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा। तोमर के नजदीकियों में चिंता है कि किसानों की नाराजगी का 'विष' मंत्री जी के खाते में आया तो दिल्ली में जो भी हो ग्वालियर-मुरैना में जो रायता फैलेगा वो कैसे समेटा जाएगा?

लाखन की तकलीफ का कारण : बारास्ता दिग्विजय सिंह कमलनाथ के खासमखास बने पूर्व मंत्री और वर्तमान में भितरवार से कांग्रेस विधायक लाखन सिंह यादव का पेट अचानक क्यों दुखने लगा? इसका बड़ा कारण है युवक कांग्रेस के चुनाव में उनके भतीजे संजय यादव की डॉ. विक्रांत भूरिया के हाथों करारी हार। संजय लोकसभा चुनाव में मुरैना सीट से दावेदार थे पर तब कमलनाथ ने उन्हें सर्वे में पीछे बताकर टिकट काट दिया था। उपचुनाव में जौरा से उनकी दावेदारी को फिर नकार दिया गया और अब जब युवक कांग्रेस में उनके लिए अच्छा मौका था तब कमलनाथ और दिग्विजय सिंह दोनों भूरिया के साथ खड़े हो गए। यादव ने तो पूर्व मुख्यमंत्री के सर्वे की भी जमकर खिल्ली उड़ाई है।

विनय बाकलीवाल की चतुराई : अच्छा हुआ कि नगर निगम चुनाव आगे बढ़ गए वरना इंदौर शहर कांग्रेस अध्यक्ष विनय बाकलीवाल जिस गति से टिकट बांटने और उम्मीदवारों की घोषणा में लगे थे उससे तो ऐसा लगने लगा था कि प्रदेश कांग्रेस ने जो उम्मीदवार चयन समिति बनाई है उसके पास कोई काम ही नहीं बचेगा। दरअसल, कमलनाथ से अपनी नजदीकी के चलते बाकलीवाल यह मानकर चल रहे हैं कि जिसे वे चाहेंगे उसे ही इंदौर में पार्षद का टिकट मिलेगा। चतुर नेता बाकलीवाल ने वक्त की नजाकत को भांपते हुए एक विधायक संजय शुक्ला को महापौर का साफा बंधा दिया और दूसरे विधायक विशाल पटेल को भी साध लिया। अब देखना यह है कि चयन समिति की प्रभारी डॉक्टर विजय लक्ष्मी साधौ बाकलीवाल को नियंत्रण में रख पाती हैं या नहीं।

संघ में बढ़ा डॉ. निशांत खरे का कद : डॉ. निशांत खरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में अब नई भूमिका में होंगे। इसी पखवाड़े इंदौर में हुई संघ के बड़े पदाधिकारियों की बैठक में कई अहम निर्णय लिए गए। कोरोना संक्रमण के दौर में संघ के निर्देश पर प्रशासन और भाजपा के बीच सेतु की भूमिका निभाने वाले डॉक्टर खरे को इंदौर विभाग का सह-संघचालक बनाया गया है। इंदौर विभाग के संपर्क प्रमुख की भूमिका में अब विनय पिंगले रहेंगे। अभी प्रचार प्रमुख की भूमिका देख रहे स्वागत चौकसे को अब पर्यावरण विभाग में भेजा गया है। नया प्रचार प्रमुख अभी तय नहीं हो पाया है। वैसे डॉक्टर खरे की एक संभावित भूमिका पर सबकी नजर है।

अहम भूमिका में हैं विवेक अग्रवाल : आईएएस अधिकारी विवेक अग्रवाल की भले ही मध्यप्रदेश में वापसी नहीं हो पाई लेकिन केंद्र में इन दिनों उनकी भूमिका बड़ी अहम है।
किसान आंदोलन के दौर में अग्रवाल भारत सरकार और किसानों के बीच मध्यस्थ की भूमिका में हैं। सरकार का पक्ष वे ही किसानों के सामने मजबूती से रख रहे हैं और उनसे मिल रहा फीडबैक सरकार तक पहुंचा रहे हैं। चूंकि अग्रवाल खुद पंजाब से हैं, इसलिए किसानों के कई संगठनों से भी उनका सीधा संवाद है। मध्यप्रदेश काडर का होने के कारण केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर तो अग्रवाल पर बहुत ज्यादा भरोसा करते ही हैं, पीएम किसान के सीईओ के नाते वे इन‌ दिनों प्रधानमंत्री के भी सीधे संपर्क में हैं।

अनंत को मिला प्रतिष्ठापूर्ण पद :
आखिरकार एडीजी अनंत कुमार सिंह इंडियन आयल कारपोरेशन में चीफ विजिलेंस ऑफिसर यानी सीवीओ का प्रतिष्ठापूर्ण पद पाने में कामयाब हो गए इस पद के लिए देश के कई आईपीएस अफसरों के बीच प्रतिस्पर्धा सी थी। सालों पहले अनुराधा शंकर सिंह का चयन भी इस पद के लिए हुआ था, लेकिन उन्होंने वहां जाने से इंकार कर दिया था। प्रदेश के एक और एडीजी राजा बाबू सिंह भी जल्दी ही बीएसएफ या सीआरपीएफ जैसे पैरामिलिट्री फोर्स का हिस्सा हो जाएंगे।

चलते चलते : जस्टिस एससी शर्मा के मध्यप्रदेश से बाहर जाने, जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव के हाई कोर्ट की जबलपुर मुख्य बेंच में एडमिनिस्ट्रेटिव जज की भूमिका में आने के बाद जस्टिस रोहित आर्य की भूमिका भी इंदौर बेंच में बदल जाएगी।

अभ्यास मंडल में 'नेताजी' : 22 साल बाद फिर नेताजी मोहिते अभ्यास मंडल के सचिव की भूमिका में आ गए। उनके बड़े भाई शिवाजी मोहिते भी इस संस्था में अध्यक्ष और सचिव दोनों भूमिका निभा चुके हैं।

पुछल्ला : 1 जनवरी 2021 के बाद पुलिस मुख्यालय में एडीजी रैंक के अफसरों की संख्या 40 हो जाएगी। 40 अफसरों के बीच कामकाज का बंटवारा भी कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए खुद डीजीपी को अच्छा खासा होमवर्क करना होगा।




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