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पाक की नापाक कोशिशों को मुंहतोड़ जवाब जरूरी

Updated: सोमवार, 18 फ़रवरी 2019 (12:18 IST)
पुलवामा आतंकी हमले के बाद सुरक्षा में चूक को लेकर सवाल स्वाभाविक हैं और उठना भी चाहिए। ढ़ेरों पैकेटों लदे विस्फोटक से भरे वाहन को लेकर कैसे आतंकी फौजियों के बीच घुस गया। यह सुरक्षा से संबंधित सारी एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती और बड़ी लापरवाही है।


जहां जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सतपाल मलिक की साफगोई कि 'भारी विस्फोटक से भरी गाड़ी घूमती रही और पता तक नहीं चला। ढ़ाई हजार फौजियों को वह भी उस जगह पर लेकर धीरे चलना जहां आईडी ब्लास्ट का खतरा है, हमारी ही चूक है।' इस उग्रवादी हमले के बाद फिर भारत और पाकिस्तान टकराव की राह पर हैं। भारतीय अधिकारियों का दावा है कि उनके पास पक्के सबूत हैं कि हमले में इस्लामाबाद का सीधा-सीधा हाथ है। हमले की जवाबदेही खुले आम पाकिस्तान में फल फूल रहे उग्रवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ले चुका है जिसका आका मसूद अजहर का ठिकाना पाकिस्तान ही है।
 
 
भला कैसे न माना जाए कि इसमें पाकिस्तान का हाथ नहीं? घटना करने वाला आतंकी भले ही कश्मीरी था लेकिन पाकिस्तानी आतंकवादियों का मोहरा था। सच है कि आस्तीन के सांप ने ही डसा लेकिन हम कैसे बेखबर थे? जब पाकिस्तान हमारे देश में घुसकर ऐसी घिनौनी ट्रेनिंग दे सकता है तो सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल उठना लाजिमी है।

गरीबी, अशिक्षा या धर्म की आड़ में भटक कर देश के लिए ही आतंकी बनने वालों का केवल कोरा बचाव करने और उन्मादी भाषण देने वालों की नीयत पर भी गुस्सा जायज है। मानवाधिकार की आड़ में फौज की हदों को छूट देनी होगी। जरूरत है देश में पैदा हो रहे आतंकियों को मुख्य धारा से जोड़ने, उनमें देश के प्रति भरा नफरत का जहर निकाल देश प्रेम का जज्बा बढ़ाने और आतंक के मायने और हश्र को समझाने की।

 
बीती 26 जनवरी को याद रखना होगा जब शांति काल में दिए जाने वाले भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार अशोक चक्र सम्मानित शहीद लांस नायक नजीर अहमद वानी की शहादत की वीर गाथा ने सबको गर्व से भर दिया था। जिन्होंने आतंकवाद का रास्ता छोड़कर 2004 में भारतीय सेना को चुना और देश के लिए कुर्बानी दी।
 
पुलवामा हमले की अमेरिका, रूस, इजरायल, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, सऊदी अरब, श्रीलंका और बांग्लादेश ने तो निंदा की ही वहीं ईरान ने भी पाकिस्तान को खरी-खरी सुनाई कि पाकिस्तान ऐसे आतंकियों को पनाह देता है, जो सेना और इस्लाम दोनों के लिए खतरा है। हां पाकिस्तानी और चीनी अखबारों ने लगभग चुप्पी साधे रखी। लेकिन मजबूरी कहें या दिखावा चीन के विदेश मंत्रालय ने अपने रूटीन प्रेस कॉन्फ्रेन्स में पत्रकारों के पूछे गए सवालों पर इस हमले की निंदा कर रस्म अदायगी की।

 
अब मांग उठने लगी है कि सिंधु जल संधि तोड़ी जाए ताकि पाकिस्तान को पानी के लाले पड़े। सिंधु नदी दोनों देश होकर बहती है तथा पाकिस्तान की जीवनदायिनी है। कहते हैं भारत ने उदारता दिखाते हुए 19 सितंबर 1960 को यह समझौता इसलिए किया था ताकि पानी के कर्ज में पाकिस्तान दबा रहे और उसकी नापाक कोशिशों से शांति मिले। लेकिन ऐसा हो न सका, 5 साल के अंदर पाकिस्तान ने हमला कर दिया। अतः सिंधु नदी का पानी रोक दिया जाए। पाकिस्तान में पनप रहे भारत विरोधी संगठनों को संयुक्त राष्ट्र संघ से आतंकी घोषित करवाने की कोशिशों को चीन के अड़ंगे के बाद भी जारी रखना होगा। गौरतलब है कि हाफिज सईद प्रतिबंध के बावजूद खुले आम पाकिस्तान में रैलियां करता फिरता है।

जाहिर है पाकिस्तान के दोगलेपन को कुचलने के लिए अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार के कूटनीतिक कदम की फौरन जरूरत है। सबको पता है कि बलूचिस्तान पाकिस्तान की दुखती हुई रग है। इसको हवा देकर भी पाकिस्तान के होश फाख्ता किए जा सकते हैं। इसी तरह गिलगित और बालिस्टान में पाकिस्तान के खिलाफ उठ रही आवाज को भी भारत समर्थन देकर पाकिस्तान को उसकी औकात बता सकते हैं। 1947 में आजादी और विभाजन के बाद से ही गिलगित-बाल्टिस्‍तान, पाकिस्‍तान के अवैध कब्‍जे में है जो कभी भूतपूर्व जम्‍मू-कश्‍मीर रियासत का हिस्‍सा था। 70 बरसों से ये अपने मूलभूत और संवैधानिक अधिकारों की मांग को लेकर पाकिस्तान के दमनकारी रवैये के खिलाफ जब तब हिंसक हो जाते हैं। 
 
हालांकि भारत की सख्ती दिखने लगी है जो और कड़ी करनी होगी। भारत ने पाकिस्तान से मोस्ट फेवरेट नेशन (एमएफएन) यानी व्यापार में सबसे ज्यादा तरजीह देने वाले देश का दर्जा हमले के 24 घंटे के भीतर ही छीन पाकिस्तान को चौंका दिया। वहीं अब आयात होने वाले सामानों पर सीमा शुल्क 200 फीसदी बढ़ा बड़ा झटका दिया है। निश्चित रूप से इससे पाकिस्तान के पास रुपयों के लाले पड़ेंगे और दबाव बढ़ेगा।

इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से अलग करने के लिए जरूरी कूटनीतिक कदम के तहत पाकिस्तान को एफएटीएफ यानी फाइनेंसियल ऐक्शन टास्क फोर्स में भी ब्लैक लिस्ट कराने की जुगत जारी है। गंभीर आर्थिक हालातों से जूझ रहे पाकिस्तान की कमर तोड़ने का कोई भी मौका अब भारत को नहीं चूकना होगा जिससे पाक की नापाक कोशिशों का अंत हो, कश्मीर की वादियों में बारूद की गंध की बजाए फिर अमन चैन के केसर की महक भर उठे।

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लेखक के बारे में
ऋतुपर्ण दवे

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