4 अप्रैल जयंती विशेष : भारतीय आत्मा पं.माखनलाल चतुर्वेदी

Author रीमा दीवान चड्ढा| Last Updated: मंगलवार, 4 अप्रैल 2017 (12:19 IST)

‘ मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढाने जिस पथ जावें वीर अनेक। ’
 
ये पंक्तियां जिस व्यक्ति के कर्मवीर जीवन का प्रताप उजागर करती हैं, उसे काव्य जगत में एक भारतीय आत्मा के नाम से जाना जाता है। मूर्धन्य कवि, अप्रतिम गद्यकार, प्रखर पत्रकार, ओजस्वी वक्ता, स्वातंत्रय समर सेनानी, श्रेष्ठ पत्र लेखक, कर्मवीर, कर्मठ व्यक्ति और एक भारतीय आत्मा की विशिष्ट छवि वाले इस सच्चे भारतीय का नाम है – पं .माखनलाल चतुर्वेदी। विलक्षण बहुमुखी प्रतिभा के धनी पं माखनलाल चतुर्वेदी जी ने कर्म, वाणी और लेखनी की विपुल निधि से देश ,समाज और मानवता के लिए जो साधना की है, वह सचमुच अमर, अमूल्य निधि है। कलम के इस कर्मवीर योद्धा ने अपनी लेखनी के प्रताप से कर्म के बल पर विजय प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया था।
 
देश की आजादी और रामराज्य की कल्पना के अनुरूप समाज रचना के लक्ष्य के प्रति उनके जीवन की हर सांस सम्पूर्णतः समर्पित थी। अहिंसा आंदोलन  में सक्रिय भाग लेकर अंग्रेजी राज के कारागृहों की यातनाएं उन्होने बरसों तक सही। कारावास के कष्टों ने उनके कवि-मन को गहरी अनुभूतियां दीं। साहित्य चेतना को नए आयाम दिए और पत्रकारिता को तीखे तेवर दिए। वे अपने दायित्व बोध को बखूबी समझते थे और उसे पूरा सम्मान भी देते थे। प्रभा के संपादकीय में उन्होने लिखा था –
 
 "संपादक उत्थान मार्ग को स्पष्टता से दिखलाने वाले हैं। उनके द्वारा समाज बहुत कुछ कर चुका है और बहुत कुछ करेगा। करोड़ों जनसमूहों से भरा हुआ समाज एक तरफ विरोध बनकर खड़ा रहने पर भी वह दूसरी तरफ अकेला ही, बिना भयभीत हुए दया, नम्रता एवं प्रेम पर अपने को अवलंबित किए खड़ा रहता है। संपादक के उत्तरदायित्व को जिस खूबी से उन्होने व्यक्त किया उतनी तेजस्विता से निभाया भी।  काव्य, साहित्य और राष्ट्रीय आंदोलन के प्रांगण की तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई जंजीर उन्हें कभी बांध नहीं सकी। उनकी लेखनी भद्रता और मर्यादा की कायल थी...भय, त्रास अथवा बंधनों की नहीं।"
 
 एक बार उन्होने कहा था - हम फक्कड़, सपनों के स्वर्गों को लुटाने निकले हैं इस दुनिया में। किसी की फर्माइश के जूते बनाने वाले चर्मकार नहीं हैं हम। यह निर्भीक बेलौस फक्कड़ता ही उनकी प्रलय के व्यापार वाली पत्रकारिता, प्रतिदान से निरपेक्ष पत्रकारिता के मूल में थी। प्रभा तथा प्रताप का संपादन बड़ी यशस्विता से किया उन्होंने। कर्मवीर उनकी पत्रकारिता का पूर्ण प्रतिबिंब तथा उनकी राष्ट्रीय व सामाजिक आस्थाओं का स्तंभ था। वे प्रख्यात कवि और साहित्यिकार थे परंतु अपने कवि और साहित्यकार को उन्होने अपने पत्रकार पर हावी नहीं होने दिया। कर्मवीर में एक बार उन्होंने लिखा था - इस समय हम अपने गरीब किसान और मजदूर भाईयों का स्मरण कर रहे हैं। देश उनका है और देश की स्वाधीनता उनकी होगी। कर्मवीर दुखियों की आवाज से भरा रहने के लिए है, इसी से वह अपने द्वारा किसी भी प्रकार की साहित्य सेवा न हो सकने का अपराधी है। किन्तु यह अपराध वह जानबूझकर करता रहेगा, क्योंकि काव्य शास्त्र का विनोद उस दिन सूझेगा, जिस दिन उसके शरीर पर चिथड़ा, पेट में टुकड़ा और रहने के लिए अपना मुल्क होगा। पं माखनलाल चतुर्वेदी जी की ये पंक्तियां आज भी प्रासंगिक हैं। किसान ,मजदूर और गरीब की ये समस्यायें आज भी बरकरार हैं। उनकी पत्रकारिता और लेखन कालातीत नहीं हुए हैं।
 
हिंदी के ख्यातनाम आलोचक और विद्वान डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है – 
जरूरी काम है प्रताप, प्रभा और कर्मवीर के उनके पुराने लेखों का पुनः प्रकाशन। इनका प्रकाशन और अध्ययन आज के राजनीतिज्ञों को उनका कर्तव्य-बोध कराने के लिए जरूरी है। पत्रकार माखनलाल चतुर्वेदी का गद्य लोक-मानस का इतिहास है। 
माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने जीवन को जिन सिद्धांतों के लिए समर्पित किया, जीवन पर्यंत उस पर कायम रहे। कर्मवीर के प्रथम अंक में संपादक के रूप में उन्होंने अपने पद के लक्ष्य तथा कर्तव्य को यूं परिभाषित किया था – 
हम अपनी जनता के संपूर्ण स्वरूप के उपासक होंगे, अपना यह विश्वास दृढ रखेंगे कि कोई विशेष मनुष्य या समूह ही नहीं अपितु प्रत्येक मनुष्य और समूह मातृसेवा का समान अधिकारी हैं। हमारा वही पथ होगा, जिस पर पूरा संसार सुगमता से जा सके। उसमें छत्र धारण किए हुए और चंवर से शोभित सिर की भी वही कीमत होगी, जो कृशकाय एवं लकड़ी के भार से दबे हुए मजदूर की होगी। 
 
दासता से हमारा मतभेद रहेगा, फिर वह शरीर की हो या मन की, व्यक्तियों की हो या परिस्थितियों की, दोषियों की हो या निर्दोषियों की, शासकों की हो या शोषितों की। पत्रकारिता का यही सच्चा स्वरूप है जो आज के समाचार पत्रों से गायब हो रहा है। उनकी दृष्टि से जीवन का हर कर्म राष्ट्रोन्मुखी था। छायावाद की कोमलकांत पदावली वाले युग में उनके काव्य का ऐसा ओज भरा प्रवाह रहा, कि जिसने पूरे देश को राष्ट्रीय भावना से भर दिया। ओज से भरी पंक्तियों का प्रभाव भी ओजस्वी ही था। यथा – 
 
वाणी, वीणा और वेणी की त्रिवेणी धार बोले, नृत्य बोले, गीत बोले, मूर्ति बोले प्यार बोले। 
आज हिमगिरि की पुकारों सिंधु सौ-सौ बार बोले,  आज गंगा की लहर में प्रलय का व्यापार बोले 
 
राष्ट्र प्रेम की अमर ज्योति जन जन में फैलाने वाले इस राष्ट्रीय कवि का राष्ट्रप्रेम अद्भुत था। तभी तो वे कहते थे - "सूली का पथ ही सीखा है, सुविधा सदा बचाता आया, 
मैं बलि पथ का अंगारा हूं, जीवन ज्वाल जगाता आया।" 
 
हिंदी के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए उन्होंने सागर वि.वि के उपकुलपति डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी को प्रेषित पत्र में लिखा था – साहित्य के नाते देश की अन्य भाषाओं से अधिक संरक्षण हिंदी अपने लिए नहीं मांग सकती। किंतु राष्ट्रभाषा के शिक्षण ,संवर्धन और उत्तरदायित्वों का उचित ज्ञान देश के सामने रखा जाए, तो इस देश की देशभक्ति अपने देश की राष्ट्रभाषा को कभी अक्षरणीय छोड़ देने के लिए प्रस्तुत न होगी। किंतु यह तब तक न होगा, जब तक हम राष्ट्रभाषा के सांगोपांग अध्यापन, दिशादर्शन और उसके उत्तरदायित्वों की मीमांसा का प्रबंध इस देश के विश्वविद्यालयों द्वारा नहीं होने देते। (माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली) 
 
एक व्यक्ति जिसने कलम की ताकत को राष्ट्र सेवा का सबसे अचूक हथियार समझा ..पत्रकारिता के तीखे तेवर दिखाए तो साहित्य की पावन गंगा भी बहाई। काव्य के ओज से राष्ट्र प्रेम की अगाध भावना हर दिल में भरी। देश के इस महान सपूत को उनकी जयंती पर केवल स्मरण कर हम अपना कर्तव्य नहीं निभा सकते। बहुत जरूरी है कि लोग ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी भारतीय व्यक्तित्व के जीवन से प्रेरणा लें। उनके कर्मवीर जीवन सा प्रताप दिखाने का साहस करने से पूर्व उनकी लेखनी की प्रभा से स्वयं आलोकित हों। 



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