पूरे घटनाक्रम के बीच आखिर क्‍या है जेएनयू हिंसा का सच?

जिनको हर संस्था को अविश्वसनीय बनाना है उनके लिए किसी प्रमाण का कोई मायने नहीं। किंतु दिल्ली पुलिस के विशेष जांच दल यानी सिट के प्रमुख ने प्राथमिक जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी है। वह मोटा-मोटी वही है जो जेएनयू में हिंसा पर गहराई से नजर रखने वाले बता रहे थे। कोई भी हिंसा अपने-आप नहीं होती। जेएनयू में जो भयावह हिंसा के वीडियो दिखे वे एकपक्षीय नहीं थे। पहली बार हिंसा की जो तस्वीरें आईं उनके पहले भी हिंसा हुई थी जिनका सच धीरे-धीरे सामने आ चुका है। दिल्ली पुलिस ने इसकी पुष्टि की है। दिल्ली पुलिस ने पत्रकार वार्ता में हिंसा मामले में नौ आरोपितों की तस्वीरें जारी की हैं। इसमें जेएनयूएसयू की अध्यक्ष भी शामिल हैं।
पुलिस को कठघरे में खड़ा करने वाले कुछ भी कहें, लेकिन उसने यही कहा कि यह छात्रों का मामला है,
इसलिए हम तत्काल गिरफ्तार नहीं रहे, उन्हें नोटिस भेजकर जवाब मांगा गया है। प्रश्न है कि अगर जांच पूरी नहीं हुई तो फिर दिल्ली पुलिस ने पत्रकार वार्ता क्यों की? इसका उत्तर देते हुए सिट प्रमुख ने ही कहा कि सामान्य तौर पर हम जांच पूरी होने के बाद ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, लेकिन इस घटना के संदर्भ में फैलाई जा रही अफवाहों की वजह से हमें पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करना पड़ रहा है।

छात्रों का भविष्य इससे जुड़ा हुआ है, उसको ध्यान में रखते हुए हम आपसे जानकारी साझा कर रहे हैं। जेएनयू घटना को लेकर लोगों के बीच गलत जानकारी फैलाई जा रही है। यानी गलत बातों को जवाब देने के लिए जितनी जानकारी आई उसे सार्वजनिक कर दिया गया। जाहिर है, ज्यादा गलफहमी न फैले इसलिए यह जरुरी था।
वैसे पुलिस का कहना है कि इन छात्रों के की वजह से आम लोगों को परेशानी हो रही है। कनॉट प्लेस में लोगों को इनके प्रदर्शन की वजह से दिक्कतें हुईं। जब भी हम इन लोगों से कनेक्ट करने की कोशिश करते हैं तो ये लोग कानून का उल्लंघन करते हैं। यह सच है। अब जरा घटनाक्रम को देखिए और जो माहौल बनाया गया उससे तुलना करिए।

माहौल यह बनाने की कोशिश हुई कि केन्द्र में भाजपा की सरकार होने के कारण उनसे जुड़े छात्र सगठनों ने गुंडों और अपराधियों की तरह वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े लोगों को मारा? क्यों मारा इसका कोई समाधानपरक जवाब नही। दिल्ली पुलिस ने सिलसिलेवार ढंग से जेएनयू के घटनाक्रम को रख दिया है। यह तो सच है कि जेएनयू में विंटर रजिस्ट्रेशन चल रहा है जिसका वामपंथी दलों से जुड़े छात्र संगठन एआईएसएफ, एसएफआई, आईसा और डीएसएफ विरोध कर रहे है। ज्यादातर छात्र रजिस्ट्रेशन कराना चाहते हैं। इन संगठनों के सदस्य खुद जो छात्र रजिस्ट्रेशन करना चाह रहे थे उनको धमका भी रहे थे। हमारे पास 5 जनवरी की घटना का वीडियो आया, लेकिन पुलिस ने एक जनवरी से ही विवरण दिया है।

जांच में पता चला कि एक और दो जनवरी को रजिस्ट्रेशन की कोशिश करने वाले छात्रों को डराया-धमकाया गया, धक्कामुक्की भी की गई। दिल्ली पुलिस ने बताया कि 3 जनवरी को स्टूडेंट फ्रंट ऑफ इंडिया, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य सेंट्रलाइज रजिस्ट्रेशन सिस्टम को रोकने के लिए जबरदस्ती सर्वर रूम में घुसे और कर्मचारियों को बाहर निकाल दिया। इसके बाद सर्वर को बंद कर दिया। 4 जनवरी को फिर उन्होंने सर्वर ठप करने की कोशिश की। दोपहर में पीछे शीशे के दरवाजे से कुछ अंदर घुसे और उन्होंने सर्वर को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया। इससे रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया रुक गई। इन मामले में पुलिस के पास प्राथमिकी दर्ज कराई गई है, जिसमें आईशी घोष का नाम है।

5 जनवरी को साढ़े 11 बजे रजिस्ट्रेशन न करने देने से परेशान चार छात्र स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सामने बेंच पर बैठे हुए थे। एआइएसएफ, आइसा, एसएफआइ और डीएसएफ का एक समूह आया और उन छात्रों को पीटने लगा। बीचबचाव के लिए गए गार्डों को भी पीटा गया। 20 छात्रों के खिलाफ गार्डों पर हमला करने की प्राथमिकी दर्ज हुई है। इसके बाद 5 जनवरी को इन्हीं 4 संगठनों के लोगों ने पेरियार हॉस्टल में छात्रों पर हमला किया। दोपहर में पेरियार हॉस्टल में नकाबपोश हमलावरों ने चुन-चुनकर छात्रों को मारा।

पुलिस का कहना है इसमें जेएनयूएसयू अध्यक्ष भी शामिल थीं। हमलावर मुंह ढंके हुए थे। पेरियार हॉस्टल में कुछ खास कमरों को निशाना बनाया गया। इसके बाद शाम को साबरमती हॉस्टल में नकाबपोश हमलावरों ने तोड़फोड़ और हिंसा की। इसमें भी कुछ छात्रों की पहचान हुई है। 5 जनवरी को शाम को साबरमती हॉस्टल के पास मौजूद टी पॉइंट के पास पीस मीटिंग हो रही थी। इसी दौरान कुछ नकाबपोश लोगों ने लाठी- डंडा लेकर साबरमती हॉस्टल पर हमला किया। इस समूह में शामिल कुछ छात्रों को चिह्नित किया गया है। थोड़ी बहुत हिंसा नर्मदा हॉस्टल में भी हुई। इसका भी केस दर्ज हुआ है।

ध्यान रखिए कि अभी यह आधी जांच रिपोर्ट है। इससे इतना साफ होता है 5 जनवरी की शाम का जो दृश्य हमने देखा उसकी पृष्ठभूमि पहले बनाई जा चुकी थी। तीन दिनों से तनाव था और दो दिनों में कई बार मार पिटाई हुई थी। 5 जनवरी को पिटे गए ज्यादातर लोग या तो विद्याथी परिषद के थे या फिर आम छात्र जो सेमेस्टर की परीक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन कराना चाहते थे। इन छात्रों की पिटाई एवं घायल होने के कारण निश्चय ही गुस्सा पैदा हुआ होगा। तभी वॉट्सऐप समूह बना, अपनी रक्षा के लिए जिसमें कहा गया कि सभी अपनी रक्षा के लिए कुछ न कुछ पास रखें। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि जिन लोगों के हाथों में कोई डंडा दिख रहा है वे हमलावर ही थे। वे अपनी रक्षा के लिए भी रखे हो सकते हैं।

आखिर पेरियार हॉस्टल में उन्हीं कमरों में क्यों हमला हुआ जिसमें परिषद के छात्र थे। बहुत सारे छात्र-छात्राओं ने छिपकर अपने को बचाया। छात्राओं के गुप्तांगों पर चोट की गई। इसलिए यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि बाद में इसकी प्रतिक्रिया में हमला हुआ। जो लाग चेहरा ढंके हुए थे वे परिषद के भी हो सकते हैं और सामान्य छात्रों का समूह या उनके साथ कुछ बाहरी समर्थक। पुलिस कह रही है कि हमला करने वालों को सारी जगहों का पता था।

आइशी घोष उनको संदिग्ध बनाने को पुलिस का पक्षपातपूर्ण रवैया बता रहीं हैं। यह ठीक है कि उनके सिर पर चोट आई तो किसी ने हमला किया। यह तो नहीं हो सकता कि उन्होंने स्वयं ही अपने उपर हमला कर लिया। किंतु इससे यह साबित नहीं होता कि उनके नेतृत्व में इसके पहले हमले नहीं हुए थे। पहचान के लिए सीसीटीवी फुटेज सबसे अच्छा स्रोत हो सकता था, लेकिन 3 और 4 जनवरी की घटना में वाईफाई सर्वर ध्वस्त हो चुका था। इस वजह से सीसीटीवी फुटेज नहीं मिले। पुलिस को भी वायरल वीडियो और तस्वीरों की मदद से हमलावरों को पहचानना पड़ रहा है। एक वीडियो में वो साफ तौर लाठी, डंडों से लैश समूह के साथ दिख रहीं हैं जो हमला करता है। वह समूह पत्थर भी चला रहा है।

पेरियार हॉस्टल में हमले का शिकार हुए छात्र भी गवाही दे रहे हैं। आखिर उतने लोग पीटे गए तो आकाश से आकर उन्हें कोई नहीं पीट गया। सर्वर केन्द्र को ताला लगाकर बाहर कुछ नकाबपोशों के साथ जेएनयू की पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष गीता कुमारी दिख रही है। इन्हें पुलिस कह रही है कि आप लोग यहां से हट जाओ, लेकिन वो बहस कर रही है। पुलिस भी जानती है कि इन छात्र नेताओं के पक्ष में राजनीतिक दलों के साथ बड़े-बड़े वकीलों का समूह खड़ा हो जाएगा। इसलिए वो जो कुछ सामने लाएगा और मामला बनाएगा उसके पहले इसका ध्यान अवश्य रखेगा कि न्यायालय में उसे कैसे लोगों का सामना करना है।

दो महीने से ज्यादा समय से ये छात्र समूह ने पूरे जेएनयू को अपने सिर पर उठा रखा है। उच्च न्यायालय के इस आदेश के बावजूद कि प्रशासनिक भवन ने 100 मीटर तक आप प्रदर्शन नहीं कर सकते। ये वहां तक पहुंचते हैं, प्रशासनिक भवन तक को पिछले दिनों नारों से पोत दिया गया। विवेकानंद की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया। भगवा, हिन्दुत्व, भाजपा, संघ के अंत के नारे लिखे गए। यह सब एक विश्वविद्यालय और छात्र संगठन का नारा नहीं हो सकता। ये राजनीतिक नारे है। साफ है कि इसके पीछे राजनीतिक दलों और नेताओं की भूमिका है। पुलिस को इनके चेहरे से भी नकाब उतारना चाहिए। जेएनयू पर वर्चस्व रखने तथा अपने विचारों के लिए प्रशिक्षण केन्द्र बनाने के वामपंथी दलों की शिक्षा संस्थान विरोधी नीति का अंत होना चाहिए। साथ ही छात्रों के बीच वैचारिक दुश्मनी और हिंसा के अंत के लिए भी मध्यस्थता एवं मेल-मिलाप की कोशिश जरुरी है। पुलिस ने किसी को गिरफ्तार न कर सही किया है। जो अपराधी प्रवृति के हैं उनको छोड़कर किसी छात्र का भविष्य खराब हो जाए यह उचित नहीं होगा।


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