ईरान- अमेरिका टकराव में कहां होगा भारत?

ईरान के कुद्स फोर्स के प्रमुख मेजर कासिम सुलेमानी की अमेरिका द्वारा की गई हत्या के बाद जितना हाहाकार हमारे देश में मचा उतना किसी देश में नहीं। ऐसा माहौल बनाया गया मानो तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ जाएगा एवं उसमें भारत को अपूरणीय क्षति होगी। ऐसे विश्लेषणों में पन्ने के पन्ने अखबारों, पत्रिकाओं के रंग दिए गए।
अमेरिका एवं ईरान दोनों से हमारे रिश्ते गहरे हैं। हमारे ही नहीं हैं, दुनिया के अनेक देशों के इनसे रिश्ते हैं। इनके टकराव से दुनिया भर प्रभावित होगी और हम भी होंगे। हमारे लिए अलग से कोई असर नहीं होना है। ईरान-इराक लंबे युद्ध से लेकर ईरान पर नाभिकीय हथियारों के निर्माण को रोकने के लिए लगाए गए लंबे प्रतिबंध, 2018 से लगाए गए मौजूदा प्रतिबंध, ईरान द्वारा को नष्ट करने की घोषणा से पैदा तनाव, सउदी अरब एवं संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के प्रति उसकी शत्रुतापूर्ण नीति.... सबका असर हुआ फिर भी हम एक देश के रुप में आगे बढ़ते रहे। इसलिए हर भारतीय को यह बात दिमाग से निकाल देनी चाहिए कि इससे हमारे लिए कोई कयामत आने वाली है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण हमने ईरान से तेल लेना बंद किया हुआ है। इसका असर है लेकिन कयामत तो नहीं आई। प्रश्न उठता है कि अमेरिका ईरान टकराव अगर एक सीमा से आगे बढ़ा तो भारत के सामने क्या विकल्प होगा? पाकिस्तान की क्या स्थिति होगी?

संयोग से इसी समय राजधानी दिल्ली में रायसीना डायलॉग आयोजित हुआ जिसमें 80 देशों के 800 विशेषज्ञ व नेता उपस्थित थे। इसमें ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ भी थे जिनसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अलग से मुलाकात की। भारत ने इस तनाव के बीच भी ईरान के विदेश मंत्री को बोलने का मंच देकर साफ कर दिया कि हमारी विदेश नीति स्वायत्त है और हम अभी न किसी के पक्ष में हैं न विरोध में। जावेद जरीफ ने अमेरिका के खिलाफ खूब बोला। इसमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इतना ही कहा कि अमेरिका और ईरान दो स्वायत्त देश हैं, इसलिए किसी भी फैसले पर उनका अधिकार है। आखिर में वही होगा, जो दोनों देश चाहेंगे। एक संयत देश के विदेश मंत्री का सार्वजनिक स्तर का यही बयान उपयुक्त है। शेष बातें नेपथ्य में होतीं हैं।

वैसे भारत में ईरान के राजदूत अली चेनेगी ने भी सैन्य-कार्रवाई के तुरंत बाद कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को दूर करने के लिए भारत प्रयास करे। वास्तव में पश्चिम एशिया में भारत कई मित्र देश जिनमें सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, ओमान, कतर....आदि मानते हैं कि भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों का उपयोग कर मामले का हल निकालना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी एवं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी बात की।

विदेश मंत्री ने भी दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के साथ कई देशों के नेताओं से बात की है। यह प्रक्रिया चल रही है। तो भारत की भूमिका इसमें है लेकिन इसकी सीमा है। ईरान का सर्वाधिक लोकप्रिय जनरल मारा गया है, जिसके खिलाफ वहां प्रतिशोध लेने की भावना है। दूसरी ओर इराक से लेकर यमन, सीरिया, लेबनान आदि में भूमिका के कारण अमेरिका सुलेमानी को आतंकवादी एवं कुद्स फोर्स को आतंकवादी संगठन घोषित करके प्रतिबंधित कर चुका था। अब ईरान ने सभी अमेरिकी सेना को आतंकवादी एवं पेंटागन को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है।

यह ऐसी स्थिति है, जिसे कौन स्वीकार करेगा? अमेरिका की पूरी सेना एवं रक्षा विभाग को आतंकवादी भारत तो नहीं मान सकता। वस्तुतः स्थिति की जटिलता को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। हमारे देश में अमेरिका को खलनायक मानकर उसकी निंदा करने वाले बुद्धिजीवियों की भरमार है और वे इसका उसी तरह अतिवादी विश्लेषण कर रहे हैं। मसलन, राष्ट्रीय संप्रभुता का अमेरिका के लिए कोई मयाने नहीं है और भारत को इसके अनुरुप रणनीति बनानी चाहिए? जब मई और जून 2019 में ओमान की खाड़ी में छह सउदी तेल टैंकरों को उड़ाया गया, 20 जून को ईरानी सेना ने अमेरिकी सैन्य ड्रोन को मार गिराया, अभी उसने यूक्रेनी जहाज को उड़ाकर 156 लोगों को मौत की नींद सुला दिया तब यही शब्द क्यों नहीं प्रयोग किए गए? यूक्रेनी जहाज अगर अमेरिकन द्वारा उड़ाया गया होता तो इस तरह की खामोशी नहीं होती।

अमेरिका ने मिसाइल हमले में सुलेमानी और दूसरे लोगों को मारा है। ईरान और उसका समर्थन कतायब हिजबुल्ला ने बगदाद स्थिति अमेरिका और मित्र सेनाओं पर हमले किए हैं। यह बात अलग है कि अभी तक किसी देश की सेना की मौत नहीं हुई है। भारत का विचार करते हुए मत भूलिए कि ईरान के अंदर सर्वोच्च धार्मिक नेता अली खमेनेई के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर गए हैं। यूक्रेनी विमान में ईरानी भी मारे गए हैं और इसे लेकर गुस्सा है। अमेरिका ने विरोध का समर्थन किया है। यह विरोध कहां तक जाएगा कहना कठिन है।

ईरान के राष्ट्रपति ने 15 जनवरी को पश्चिम एशिया में तैनात यूरोपीय सैनिकों के संबंध में चेतावनी दी कि वे खतरे में पड़ सकते हैं। यह चेतावनी ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी द्वारा 2015 के नाभिकीय समझौते की सीमाओं को तोड़ने को लेकर ईरान को चुनौती दिए देने के बाद आई है। अपने मंत्रिमंडल को संबोधित करते हुए रूहानी ने कहा कि आज अमेरिकी सैनिक खतरे में हैं, कल यूरोपीय सैनिक खतरे में हो सकते हैं। हम आपको इस क्षेत्र से हटाना चाहते हैं, लेकिन युद्ध से नहीं। हम चाहते हैं कि आप समझदारी से चलें। यह आपके ही हित में होगा। यूरोपीय सैनिक इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकियों के साथ तैनात हैं। फ्रांस का संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में एक नौसैन्य केंद्र हैं, जबकि ब्रिटेन ने द्वीपीय देश बहरीन में एक सैन्य केंद्र खोला है। रूहानी ने नाभिकीय समझौते को लेकर यूरोप की दलीलों की भी आलोचना की।

समझौते में तय सीमा को पार करने के ईरान के कदम पर राष्ट्रों की आपत्ति के बाद रूहानी ने ये चेतावनी दी है। प्रश्न है कि ईरान अगर अमेरिका के साथ यूरोप के प्रमुख देशों को चेतावनी दे रहा है तो भारत उसमें क्या कर सकता है? जब ईरान में भूकंप की खबरें आईं तो आशंका यह पैदा हुई कि उसने गुस्से में आकर नाभिकीय परीक्षण किया है। अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है। अगर ऐसा हुआ तो फिर भारत क्या कोई देश उसे बचाने के लिए बीच-बचाव करने से लंबे समय तक बचेगा। युद्ध केवल विनाश लाता है पर परिस्थितियां आपके वश में नहीं होती। ईरान सरकार के सामने बाहरी और आंतरिक दोनों चुनौतियां हैं। इसमें वह अमेरिकी ठिकानों पर आगे भी हमला कर सकता है। अगर अमेरिका ने तय किया कि उसे जवाब देना है तो संकट गहराएगा। हालांकि अमेरिका थल सेना को नहीं उतारेगा, वह नौसेना या वायुसेना का ही प्रयोग करेगा। ऐसा लगता नहीं है कि ईरान के पक्ष में आवाज उठाने वाला चीन सेना के साथ उतरेगा।

रुस भी अमेरिका को विरोध करेगा लेकिन वह युद्ध में नहीं उतरेगा। हां, इराक की संसद ईरान के प्रभाव में अमेरिका को वहां से बाहर जाने के लिए कह सकता है। सीरिया जैसा देश ईरान के साथ हैं, लेकिन उसकी हैसियत ऐसी नहीं कि कोई गुणात्मक अंतर ला सके। जहां तक पाकिस्तान का प्रश्न है तो उसे क्षति जरुर होगी लेकिन वह इसमें कहीं नहीं होगा। पूर्व खाड़ी युद्ध में अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता थी लेकिन अब उसने वहां ऐसी स्थिति पैदा कर ली है कि उसे सामग्रियों के लाने ले जाने के लिए या ईंधन भरने आदि के लिए शायद ही पाकिस्तान की आवश्यकता हो। भारत को अगर अमेरिका इसमें साथ देने के लिए कहता है तो हमारे लिए समस्या होगी। पर भारत में इतनी क्षमता है कि ना कह दें।

भारत ने जिस तरह की सतर्कता और संयत बरता है उससे शांति स्थापना में उसकी भूमिका महत्वपर्ण हो सकती है। उसे एक साथ सुन्नी और शिया दोनों देशों को विश्वास प्राप्त होगा। मानकर चलना चाहिए कि भारत इसके लिए तैयार हो रहा होगा। हालांकि यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी नीति भी ईरान को किसी तरह नाभिकीय ताकत न बनने देने की है। साथ ही भारत अफगानिस्तान में नाटो सैनिकों की तैनाती का समर्थन करता है। तो इन सबको कायम रखते हुए ही कोई भूमिका भारत निभा सकता है।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण 'वेबदुनिया' के नहीं हैं और 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)




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