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  4. The existence of the Aravalli mountain range is in danger.

International Mountain Day: अरावली पर्वत श्रृंखला का वजूद खतरे में

International Mountain Day 2025
आज अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस है। हर साल 11 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 2003 में यह दिवस घोषित किया था। इसका उद्देश्य पर्वतों के महत्व, संरक्षण और पर्वतीय समुदायों के समक्ष आने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। पर्वत पेयजल, जैव विविधता, औषधियों, भोजन और लकड़ी आदि के महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक दोहन की वजह से इनका वजूद खतरे में पड़ गया है। इसलिए आज इन्हें संरक्षण की बेहद जरूरत है। ALSO READ: क्या है कैलाश पर्वत या मानसरोवर झील में शिव जी के डमरू और ओम की आवाज का रहस्य?
 
अरावली पर्वत श्रृंखलाओं का अस्तित्व खतरे में हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वत श्रृंखलाओं में खनन कार्य पर पाबंदी लगाई हुई है, लेकिन न्यायालय द्वारा अरावली पहाड़ियों की एक नई आधिकारिक परिभाषा को मंजूरी दिए जाने से पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ी है।

उनका कहना है कि अगर वक्त रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब अरावली पहाड़ों की जगह सिर्फ़ मरूस्थल ही नजर आएगा। गौरतलब है कि यह गुजरात के हिम्मत नगर से राजधानी दिल्ली तक 560 किलोमीटर लंबी विश्व की सर्वाधिक पुरानी पर्वत श्रृंखला है, जिसकी चौड़ाई दस से 100 किलोमीटर तक है। सर्वाधिक ऊंचाई 1723 मीटर राजस्थान के माउंट आबू में है। पहाड़ियों में अकूत खनिज भंडार और कीमती पत्थरों का खजाना है। खनन से हरियाणा और राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला को बहुत नुकसान पहुंचा है।
 
काबिले-गौर है कि विगत 20 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों की एक नई आधिकारिक परिभाषा को मंजूरी दी है। इसके तहत अरावली के अंदर किसी भी भू-आकृति में स्थानीय राहत से कम से कम 100 मीटर की ऊंचाई होनी चाहिए, जिसमें इसकी ढलान और आसपास के क्षेत्र शामिल हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति द्वारा प्रस्तुत उन सिफ़ारिशों को मंजूर कर लिया, जिनमें उत्तर-पश्चिम भारत में 692 किलोमीटर की सीमा को परिभाषित करने की नई परिभाषा को मानकीकृत करने की मांग की गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय को बताया गया कि भारतीय वन सर्वेक्षण के एक आकलन के मुताबिक 12,081 मानचित्र की गई पहाड़ियों में से सिर्फ़ 1048 ही 8.7 मापदंड को पूरा करती हैं, यानी 100 मीटर के मापदंड को पूरा करती हैं। इन नये मानदंडों के तहत अरावली पर्वत श्रृंखला का तकरीबन 90 फ़ीसद हिस्सा अपने कानूनी संरक्षण से बेदखल हो जाएगा।
 
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वत के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। न्यायालय ने नब्बे के दशक से अरावली पर्वत क्षेत्र में अवैध खनन पर बार-बार रोक लगाई है। काबिले-गौर है कि 21 दिसंबर 1992 को केंद्र सरकार के नोटिफ़िकेशन और 12 दिसंबर 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद पूरे अरावली पहाड़ी क्षेत्र को वन क्षेत्र घोषित किया गया था।
 
सर्वोच्च न्यायालय ने 18 मार्च 2004 को आदेश दिए थे कि अरावली श्रृंखला में किसी प्रकार से हरियाली को नष्ट नहीं किया जा सकता। इस आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पहाड़ी में लगे पौधों को भी वन संरक्षित क्षेत्र मानते हुए वन क्षेत्र की परिभाषा तय की थी।

इसके लिए गठित की गई सेंट्रल इंपॉवर्ड कमेटी को अनेक अधिकार सौंपते हुए पेड़ों की अवैध कटाई और खनन को रोकने की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस कमेटी ने भी 7 जून 2007, 12 सितंबर 2007 और 7 दिसंबर 2007 को जारी आदेश में पेड़ों की कटाई नहीं होने देने के सख्त निर्देश दिए थे। 
 
कमेटी ने सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी रिपोर्ट में कुछ खास जगहों को छोड़कर इस समूची पर्वत श्रृंखला के आसपास खुदाई पर पूरी तरह रोक लगाने और संरक्षित क्षेत्रों में बनाई गई इमारतों को गिराने की सिफ़ारिश की थी। यह क्षेत्र हरियाणा भूमि एक्ट की धारा 4-5 के तहत भी आता था। इसलिए इस जमीन को किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचाना पर्यावरण नियमों की अवहेलना करना है।
 
सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2002 को हरियाणा सरकार को निर्देश जारी कर कहा था कि गुड़गांव और फ़रीदाबाद में खनन कार्य से पर्यावरण प्रदूषित होने के साथ असंतुलित भी हो रहा है, इसलिए दोनों जिलों में तुरंत प्रभाव से खनन कार्य बंद कराया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद प्रदेश सरकार ने कार्रवाई करते हुए एक टीम का गठन किया और खनन कार्य बंद करवा दिया, लेकिन कुछ दिनों बाद खनन माफ़िया अरावली श्रृंखलाओं में सक्रिय हो गया और फिर से ब्लास्टिंग के माध्यम से खनन कार्य किया जाने लगा। 
 
अवैध खनन का मामला जब मीडिया ने उठाया तो सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए फिर से खनन कार्य बंद कराने के निर्देश दिए। सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद प्रदेश सरकार ने अवैध खनन रोकने के लिए बाकायदा एक कमेटी का गठन किया था।

इस कमेटी में पुलिस विभाग, पंचायत विभाग, राजस्व विभाग व खनन विभाग के अधिकारियों को शामिल किया गया था। यह भी सुनिश्चित किया गया था कि अवैध खनन रोकने के लिए कमेटी नियमित रूप से अपने-अपने क्षेत्रों की पर्वत श्रृंखलाओं में जाकर अवैध खनन को पूरी तरह बंद कराए। 
 
अवैध खनन की शिकायतें मिलने पर वन मंडल अधिकारी सतबीर सिंह दहिया ने फ़रीदाबाद जिले के खेड़ी कलां गांव में छापा मारा था और स्थानीय अधिकारियों को सख्ती से अवैध खनन पर रोक लगाने की हिदायत दी गई थी। उस वक्त वन क्षेत्र से दूर खनन की इजाजत लेकर वन्य इलाके की भी खुदाई की जा रही थी।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में व्यावसायिक व निर्माण गतिविधियों का तेजी से प्रसार का सबसे ज्यादा खामियाजा अरावली पहाड़ियों का भुगतना पड़ रहा है। गुड़गांव, मानेसर और फ़रीदाबाद इलाके़ में पत्थरों के लिए अंधाधुंध खनन किया गया था।
 
पर्यावरणविद् और वाटर मैन नाम से विख्यात हाजी इब्राहिम खान का कहना है कि अरावली पर्वत के विषय में मंजूर किए गए नए मानदंडों की वजह से इसका वजूद खतरे में पड़ जाएगा। अरावली की पहाड़ियां बारिश, सूखा और बाढ़ को नियंत्रित करती हैं, लेकिन ज्यादा ऊंची न होने की वजह से इनका अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, जिससे इसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है।

अरावली के जंगल तबाह होने से यहां रहने वाले वन्य प्राणियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है। आबादी की तरफ़ आने पर ये जानवर अकसर दुर्घटना का भी शिकार होते रहते हैं। कई बार तो बस्ती के लोग वन विभाग के अधिकारियों की मदद से जानवरों को जंगल में छोड़ आते हैं। पहले यहां शेर, चीते, हिरण, भेड़िये, नील गाय, गीदड़, जंगली बिल्ले, खरगोश, सांप, नेवले, मोर, तीतर आदि बड़ी तादाद में थे, लेकिन अब ये लुप्त होते जा रहे हैं।
 
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है- 'गुजरात से लेकर राजस्थान और हरियाणा तक फैली अरावली पर्वतमाला ने लम्बे समय से भारतीय भूगोल और इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सरकार ने अवैध खनन से पहले ही बर्बाद हो चुकी इन पहाड़ियों के लिए अब लगभग 'डेथ वारंट' पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।

सरकार ने घोषणा की है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली कोई भी पहाड़ी खनन के खिलाफ़ कड़े प्रतिबंधों के अधीन नहीं है। यह फ़ैसला अवैध खननकर्ताओं और माफ़ियाओं के लिए खुला निमंत्रण है कि वे इस श्रृंखला के उस 90 प्रतिशत हिस्से का भी सफ़ाया कर दें, जो सरकार द्वारा निर्धारित ऊंचाई सीमा से नीचे आता है।'
 
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव को लेकर कांग्रेस नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा है- 'यह अजीब है और इसके पर्यावरण और पब्लिक हेल्थ पर बहुत गंभीर नतीजे होंगे। इसकी तुरंत समीक्षा की जरूरत है।'
 
बहरहाल, अरावली पर्वत श्रृंखलाओं को बचाने की जरूरत है। साथ ही सरकारों को भी गंभीरता बरतनी होगी, ताकि इनका वजूद कायम रहे।  ALSO READ: कैलाश पर्वत के शिखर पर आज तक कोई क्यों नहीं चढ़ पाया?

(लेखिका स्टार न्यूज एजेंसी में सम्पादक हैं)

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