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महावीर स्वामी की माता महारानी त्रिशला ने देखे थे सोलह शुभ मंगलकारी सपने

रविवार,अप्रैल 25, 2021
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शाकाहार 'अहिंसा' का प्रतिनिधित्व करता है: अ- अर्थात= मना, हिंसा अर्थात= किसी को मारना, चोट पहुंचाना। यह हिंसा मानसिक, शारीरिक, शाब्दिक या मौन द्वारा भी की जा सकती है। महावीर की बाकी बातें भूलकर मात्र अहिंसा पर ही बात करते हैं, जो जुड़ी है उनके मुख्य ...
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सबके मंगल के साथ हमारा अमंगल न हो, यही धर्म है। इसीलिए कहते हैं कि धर्म मंगल है। कौन-सा धर्म? जो न दूसरों पर और न ही स्वयं पर हिंसा होने दे, वही अहिंसक धर्म ही मंगल है।
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रविवार, 25 अप्रैल को जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की जयंती है। महावीर जयंती पर जैन मंदिरों को झंडे से सजाया जाता हैं। इस दिन महावीर स्वामी की मूर्तियों का मंत्रोच्चार द्वारा
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चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को जैन समाज द्वारा पूरे भारत में भगवान महावीर के जन्म उत्सव के रूप मे 'महावीर जयंती' मनाई जाती है।
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दिगंबर जैन धर्मावलंबियों की आस्था का प्रमुख केंद्र श्री भगवान महावीर स्वामी का भव्य विशाल राजस्थान में 'श्री महावीर जी' नाम से प्रसिद्ध है।
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महावीर स्वामी का जीवन परिचय

शनिवार,अप्रैल 24, 2021
वर्द्धमान, सन्मति, वीर, अतिवीर और महावीर ये जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर के नाम हैं। उनके पिता सिद्धार्थ तथा माता का नाम त्रिशला (प्रियकारिणी) था। जानिए 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का संक्षिप्त परिचय
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24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का चिह्न सिंह (वनराज) है। सिंह अपने बल पर जंगल का राजा होता है, अपने क्षेत्र में निर्भय होकर विचरण करता है। वह पराक्रम और शौर्य का प्रतीक है।
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जय महावीर दया के सागर, जय श्री सन्मति ज्ञान उजागर। शांत छवि मूरत अति प्यारी, वेष दिगम्बर के तुम धारी।
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यहां पढ़ें जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की 3 खास आरतियां।
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अहिंसा के पालनकर्ता कौन? सामान्य-सा जवाब होगा महावीर को मानने वाले जैन मतावलंबी, गांधी के अनुयायी। लेकिन क्या वास्तव में मात्र जैन कुल में जन्म लेने वाला
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जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी जैन धर्म के संस्थापक नहीं प्रतिपादक थे। उन्होंने श्रमण संघ की परंपरा को एक व्यवस्थित रूप दिया। उन्होंने 'कैवल्य ज्ञान' की जिस ऊंचाई को छुआ था वह अतुलनीय है। उनके उपदेश हमारे जीवन में किसी भी तरह के ...
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जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंककर भगवान महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं प्रतिपादक थे। उन्होंने श्रमण संघ की परंपरा को एक व्यवस्थित रूप दिया।
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भगवान महावीर स्वामी के चौंतीस भव (जन्म) इस प्रकार हैं -
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भगवान महावीर स्वामी ने पंचमहाव्रत की शिक्षा दी है। यह ज्ञान उनसे पूर्व वेदों में और उनके बाद पतंजली योग सूत्र में मिलेंगे। पंच महाव्रत का पालन करने वाले को किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता। वह पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है।
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भगवान महावीर स्वामी के उपदेश आज भी दुनिया के लिए बहुत जरूरी है। अहिंसा का मार्ग अपना कर दुनिया को बचाया जा सकता है। वर्तमान में परिस्थितियां बहुत बिगड़ गई है। लोग हिंसा का मार्ग अपना कर अपना ही अहित करने लगे है।
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जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओत-प्रोत था। उन्होंने एक लंगोटी तक का परिग्रह नहीं रखा।
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भगवान महावीर स्वामी ने भय और अहिंसा के बारे में बहुत कुछ कहा है। यहां यह समझता जरूरी है कि अहिंसा भय नहीं निर्भिक व्यक्ति का स्वभाव है। यहां इस संबंध में छोटा सा सूत्र।
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महावीर जयंती पर अवश्‍य पढ़ें मंगलमयी श्री महावीर चालीसा का पाठ
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रंग लाग्यो महावीर, थारो रंग लाग्यो, थारी भक्ति करवाने म्हारो भाव जाग्यो ॥ रंग लाग्यो…॥
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