सियासी जमीन में गहरी हुईं शिव की जड़ें

भोपाल (वार्ता) | वार्ता| पुनः संशोधित शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008 (19:02 IST)
विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को ऐतिहासिक विजय दिलाने का श्रेय दिलाने वाले मुख्यमंत्री एक मजबूत जनाधार वाले नेता बन कर उभरे हैं।

एक विनम्र और आम आदमी के मुख्यमंत्री के रूप में ख्याति अर्जित करने वाले चौहान ने शुक्रवार को राज्य के उन्तीसवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की है। वे व्यक्ति के रूप में वह राज्य के 17वें मुख्यमंत्री हैं। चौहान ने मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार 29 मई 2005 को शपथ ली थी।

चौहान का जन्म सीहोर जिले में नर्मदा नदी के किनारे बसे छोटे से गाँव जैत के एक किसान परिवार में 5 मार्च 1959 को हुआ था। यह संयोग की बात है कि पाँचवी कक्षा तक की पढ़ाई गाँव में ही पूरा करने वाले चौहान विकास के नारे पर 13वीं विधानसभा का चुनाव जीत कर राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर भी मजबूत जनाधार वाले नेता के रूप में उभरे हैं। उन्हीं के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में भाजपा ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल करने का कीर्तिमान दर्ज किया है।
49 वर्षीय चौहान के पिता प्रेमसिंह चौहान पेशे से किसान हैं। विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रचार अभियान के केन्द्र रहे चौहान के निर्वाचन क्षेत्र बुधनी में प्रचार की जिम्मेदारी उनकी पत्नी साधनासिंह चौहान ने संभाली थी। दो पुत्रों की माँ श्रीमती चौहान ने बेहतरीन चुनावी प्रबंधन के कौशल का परिचय देते हुए अपने पति की जीत सुनिश्चित की।
संगीत, आध्यात्मिक साहित्य और भ्रमण में विशेष रुचि रखने वाले शिवराज ने बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से कला में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की है। वर्ष 1972 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने चौहान ने आपातकाल के दौरान आंदोलन में भाग लिया और इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

वर्ष 1975 में 16 वर्ष की उम्र में भोपाल के मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थी संघ के अध्यक्ष निर्वाचित होने के साथ ही चौहान के राजनीतिक जीवन की नींव पड़ गई थी। वह 1977-78 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद भोपाल के संगठन सचिव बने और फिर उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
वर्ष 1984-85 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश संयुक्त सचिव बने चौहान बाद में इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक पहुँचे। वे 1990 में नवीं विधानसभा के लिए पहली बार विधायक चुने गए, लेकिन 1991 में दसवीं लोकसभा के लिए सांसद निर्वाचित होने पर उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया।

चौहान वर्ष 1991 में पहली बार विदिशा संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए और उसके बाद वह 2004 तक लगातार इसी क्षेत्र का लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते रहे। इस वक्त तक वे संसद की विभिन्न समितियों के सदस्य और संगठन में अनेक महत्वपूर्ण पदों का दायित्व संभाल चुके थे। मई 2005 में वे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने और छह माह बाद 29 नवंबर को राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की।
मुख्यमंत्री बनने के बाद चौहान ने राजनीतिक स्थिरता लाने के साथ ही राज्य के विकास को गति देने का काम शुरू किया। चौहान के कार्यकाल की सबसे चर्चित रही लाडली लक्ष्मी योजना का जिक्र करना अकसर वे नहीं भूलते हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने तीन वर्ष के कार्यकाल के दौरान किसानों, गरीबों, महिलाओं, कर्मचारियों और अन्य सभी वर्गों के लिए बेहतर योजनाएँ बनाने के साथ ही उन पर सख्ती से अमल सुनिश्चित किया।
मंत्रियों के कथित भ्रष्टाचार और डंपर मामले को लेकर स्वयं और परिवार पर विपक्ष के हमलों से भी विनम्र स्वभाव वाले चौहान विचलित नहीं हुए और बार-बार यही कहते रहे कि आने वाले विधानसभा चुनाव में जनता ही इन सवालों का जवाब देगी।

अनेक पदयात्राओं के कारण आम लोगों में पाँव-पाँव वाले भैया के नाम से चर्चित हो चुके चौहान ने राज्य में नीतियों के निर्माण में संबंधित वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लगभग 18 महापंचायतें बुलाई और इनमें आए सुझावों के आधार पर नीतियाँ घोषित कीं।



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