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ट्रेन के कोच का वो टॉयलेट…! सोनू सूद के संघर्ष की ‘इमोशनल’ कहानी

शुक्रवार,जून 5, 2020
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आभूषणों ने मानव जाति व समाज में अपनी अलग और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चाहे वह सोना-चांदी हो, हीरे हों, रूबी, नीलम, पन्ना, मोती कोई भी रत्न या धातु हों। इनकी चकाचौंध ने हमेशा सभी को आकर्षित किया है। भारतीयों में तो यह प्रतिष्ठा का प्रश्न भी रहता
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युद्ध के समय जब सेनाएं आमने-सामने खड़ी हो गईं ....तो अर्जुन के विषाद को दूर करने के लिए योगेश्वर श्री कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया जो आज भी व्यवहारिक जीवन की समस्याओं के लिए समाधानकारक है।
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ना बीबी न भैया “सबसे बड़ा रुपइया” सभी ने सुना होगा। यह पैसा जो सिक्के में या नोटों में भले ही अलग-अलग आकार, रंग-रूप, वजन लिए हुए हो पर जिसकी जेब में ये बसते हैं वो ही इस दुनिया में सबसे रुतबेदार है। इसी के आस-पास सारी दुनिया घूमती है। फिर भी पैसा ...
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संत कबीर दास के दोहे आज भी पथ प्रदर्शक के रूप में प्रासंगिक है। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं कबीर के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय दोहे-
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सती, सावित्री, सीता एवं अनुसुइया जैसे नारी चरित्र जो हजारों वर्षों से भारतीय समाज के समक्ष आदर्श बने रहे हैं, क्या धर्म-निरपेक्षता के इस युग में आकर नकार दिए जाने चाहिए ? क्या ये पौराणिक युग के नारी चरित्र भारतीय नारियों की कमजोरी के प्रतीक हैं ?
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जॉर्ज एक अश्वेत व्यक्ति था, जिनको जाली नोट चलाने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया था।
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मनुष्य इस धरती का सबसे क्रूर और अनुपयोगी जानवर है। इसका इस धरती पर से अस्तित्व मिट जाना ही धरती के लिए अपनी जिंदगी बचाने जैसा होगा। धरती का हर पेड़ यही चाहता होगा, हर पक्षी यही चाहता होगा और हर पशु भी यही प्रार्थना करता होगा।
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अमेरिका में इस वक्त ख़ंदकों की लड़ाई सड़कों पर लड़ी जा रही है। दुनिया भर की नज़रें भी अमेरिका पर ही टिकी हुईं हैं। कोरोना के कारण सबसे ज़्यादा मौतें अमेरिकी अस्पतालों में हुईं हैं पर देश के एक शहर में पुलिस के हाथों हुई एक अश्वेत नागरिक की मौत ने ...
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पृथ्वी व प्रकृति का घेरा या आवरण पर्यावरण कहलाता है। जो वायु, जल, भूमि, गगन, सूर्य का प्रकाश एवं समस्त प्राणियों (मनुष्य सहित) से मिलकर बनता है। इस पर्यावरण को समस्त जीव प्रभावित भी करते हैं
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दुनिया के लोगों के मन आज भय से व्याकुल हैं। दुनियाभर की राजकाज की व्यवस्थाओं, समाजों और मनुष्यों के मन में जो चिंता और भय अपने जीवन की सुरक्षा और जनजीवन की गतिशीलता के बारे व्याप्त हो गया है, उससे आज की दुनिया कैसे उबरे? यह वह सवाल है जिसे लेकर आप, ...
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लेक‍िन जो घटनाएं ‘ट्रस्‍ट एंड ब‍िट्रेड’ की होती हैं वहां शायद इट ऑल डजन्‍ट वर्क!
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कविता ‘अग्निपथ’ की तर्ज पर लिखी गई थी। इसे कोरोना के प्रति जागरुकता के लिये राजस्थान पुलिस ने प्रचारित किया था।
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पर्यावरण संरक्षण महज ड्राफ्टिंग, गोष्ठियों और पैकेजों के रुप में आर्थिक गबन का पर्याय बनते जा रहा है।
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हे गजानन कहां हो तुम? तुम्हें जरा भी उसकी गुहार, दर्द, तड़प, पीड़ा दिखाई-सुनाई नहीं दी? हे देवों के देव वक्रतुंड, महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ।।।कितने निष्ठुर हो गए तुम भी? हे सुमुख, उस निर्दोष गर्भवती हथिनी मां के मुख में उन विश्वास घातियों ने जो आग ...
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अलौकिक प्राणियों के अस्तित्व पर शायद आप यह मानकर विश्वास न करते हों कि आज की दुनिया में उनका जीवित रह पाना असंभव है। लेकिन यह तो संभव है ही कि कभी उनका अस्तित्व रहा हो और यह कोरी कल्पना न हो। वैसे यह भी एक मान्यता है कि जो कुछ भी मानव की कल्पना में ...
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तुम्हें अपने घर-आंगन की खबर ही कहां है? तुम तो यह भी भूल गए कि परसों नुक्कड़ के उस पेड़ को काट दिया गया जिसकी इमलियाँ तुम रोज अपने जेब में भर कर ले जाते थे और उन्हीं के कारण स्कूल में कई दोस्त बने थे तुम्हारे। हां, सड़क बनाने के लिए उस पेड़ को काट दिया।
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हम में से हर कोई अपने दिमाग से कोई न कोई उपाय सोच कर धरती के क्षति ग्रस्त पर्यावरण को दुरुस्त करने में सहभागी बन पुण्य कमा सकता है।
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"मैं और मेरे साथ भी मैं" वाला जो फंडा है वही इस जिंदगी का सबसे अहम रहस्य है। जिसने इसे समझ लिया उसने जीवन जी लिया। अपने जीवन के चौपन बरस इस फलसफे पर ही चले हैं। मेरे साथ मैं की जो परिभाषा है वो कुछ अलग है।
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’दादाजी, मैं साइकिल चलाना नहीं सीखूंगी।’ दादाजी ने अखबार से चेहरा निकालते हुए पूछा, ’क्यों? गिर पड़ी क्या?’
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