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माँ की नींद
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विजयशंकर चतुर्वेदी किताब से उचट रहा है मेरा मनऔर नींद में है माँ।पिता तो सो जाते हैं बिस्तर पर गिरते ही,लेकिन बहुत देर तक उसकुरपुसकुर करती रहती है वहजैसे कि बहुत भारी हो गई हो उसकी नींद से लंबी रात।अभी-अभी उसने नींद में ही माँज डाले हैं बर्तन,फिर बाँध ली हैं मुट्ठियाँजैसे बचने की कोशिश कर रही हो किसी प्रहार से।मैं देख रहा हूँ उसे असहाय।माँ जब तब बड़बड़ा उठती है नींद मेंजैसे दबी हो अपने ही मलबे के नीचेऔर ले रही हो साँस।पकड़ में नहीं आते नींद में बोले उसके शब्द।लगता है जैसे अपनी माँ से कर रही है कोई शिकायत।बीच में ही उठकर वह साफ कराने लगती है मेरे दाँतछुड़ाने लगती है पीठ का मैल नल के नीचे बैठकर।कभी कंघी करने लगती हैकभी चमकाती है जूते।बस्ता तैयार करके नींद में ही छोड़ने चल देती है स्कूल।मैं किताबों में भी देख लेता हूँ उसेसफों पर चलती रहती है अक्षर बनकरजैसे चलती हैं बुशर्ट के भीतर चीटियाँ।किताब से बड़ी हो गई है माँसावधान करती रहती है मुझे हर रोजजैसे कि हर सुबह उसे ही बैठना है इम्तिहान मेंउसे ही हल करने हैं तमाम सवालऔर पास होना है अव्वल दर्जे में।मेरे फेल होने का नतीजामुझसे बेहतर जानती है माँ।