व्यंग्य: मोटापा वीरस्य भूषणम्

मोटापा ऊपरवाले की देन है जिसे वो आलस और पेटूपन जैसे अपने अंडरकवर एजेंट्स की सहायता से धरती पर रवाना करता है। मोटापा भले ही ऊपरवाले की देन हो लेकिन इस दैवीय देन को किसी दैवीय प्रकोप की देनदारी से बचाए रखने के लिए 'देना बैंक' की नहीं बल्कि 'लेना बैंक' की तरह परिचालन और परिवहन करना पड़ता है, क्योंकि चाहे 'देना बैंक' हो या 'देगी मिर्च' इनके केवल नाम में ही देना है।
आज के इस दौर में, दौरे पड़ने के कारण जहां प्यार और वफा जैसी बातें बेमानी और बदचलन होती जा रही हैं, वहीं मोटापा एक बार गले पड़ने के बाद आपको अनकंडीशनल प्यार और वफा की बेड़ियों में प्रेमकैदी की तरह जकड़े रहता है। मोटापा, मानवमात्र को नि:स्वार्थ प्यार का संदेश और साथ में बीमारियां भी फ्री में देता है जिससे प्यार जैसी स्वायत्त संस्था में आपका विश्वास, भ्रष्टाचार की तरह सनातन बना रहता है।
मोटापा आपसे कुछ नहीं चाहता नहीं लेकिन आप फिर भी उससे छुटकारा चाहते हैं। ये रुपए की तरह गिरते मानवीय मूल्यों की तरफ संकेत करता है। मोटापा बिन बुलाए मेहमान की तरह विनम्रतापूर्वक आता है और फिर छोटे से कॉमर्शियल ब्रेक के बाद किराया न देने वाले किराएदार की तरह मकान पर कब्जा कर लेता है।

लापरवाही की सवारी करते हुए मोटापा सबसे पहले उदारतापूर्वक आपके 'उदर' (पेट) पर धावा बोलता है। पेट को मोटापे की चपेट में आने के बाद अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ता है और इस दुर्घटना के चलते पेट सफलतापूर्वक बिल्डअप और कारपेट एरिया में वृद्धि करते हुए मोटापे की सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

बढ़े हुए उदर की कदर करने की अपेक्षा हर विकासशील देश के जिम्मेदार नागरिक से की जानी चाहिए, क्योंकि विकासशील देश हर क्षेत्र में बढ़ने के लिए सतत प्रयासशील और भावुक रहता है। पेट का विधिवत रूपांतरण जब तोंद के रूप में होता है तो उसका रूप और निखर जाता है। शरीर का अभिन्न अंग बने रहने के लिए तोंद, गोंद की तरह चिपकी होती है। पेट से प्रेरणा और ताकत लेकर कमर भी घेरेबंदी करते हुए चीन और पाकिस्तान की तरह अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए अपना घेरा अनधिकृत रूप से बढ़ाकर 1BHK के मिडिल क्लास घर से निकलकर 3BHK के अपर क्लास सपने को पूरा कर लेती है।
जब इंसान मोटापे को प्राप्त होता है तो हर कोई उसे सुबह कुछ न कुछ खाली पेट लेने की सलाह देता है जबकि मोटापे को बिना निविदा के विदा करने के लिए खाली पेट रहने की ही जरूरत होती है। मोटे लोगों को देश की मुख्य धारा में लाने के लिए कई 'मोटापा चिंतक' धारा तेल काम में लेने की सलाह देते हैं। मोटापा धारण करना कोई आसान काम नहीं है। मोटा होने पर सामाजिक ताने-बाने से ताने सुनने पड़ते हैं और सर्दी-गर्मी के साथ जिल्लत भी सहनी पड़ती है। अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर कहा जाए, 'मोटापा वीरस्य भूषणम्।'
मोटापे को एक साजिश के तौर पर शारीरिक और सामाजिक बुराई बताया जाता है ताकि मोटापे के मोटे फायदों का खुलासा देश की आम जनता के सामने न हो पाए। हमें भारी लोगों का आभारी होना चाहिए, क्योंकि अगर वो अपना वजन नहीं बढ़ाते तो नई-नई बीमारियां जन्म और संकल्प लेकर अपना जलवा नहीं दिखा पाती और अगर नई-नई बीमारियां सामने नहीं आतीं तो चिकित्सा विज्ञान इनका निदान न ढूंढकर नादान ही रह जाता।

चिकित्सा विज्ञान की प्रगति और चिकित्सकों की 'समृद्धि' के पीछे मोटापे का ढाई किलो से भी भारी हाथ है। मोटापे से घृणा करने वाले मोटापे की इस उपलब्धि पर प्रकाश न डालकर पर्दा डाल देते हैं। अगर मोटापा न होता तो फिटनेस का महत्व डकवर्थ-लुईस की तरह कभी समझ में नहीं आता। लेकिन मोटापे ने कभी इसका श्रेय लेने की हिमाकत नहीं की, जो उसकी सदाशयता का परिचय देता है।
गली-गली में खुलकर नंगे हो चुके फिटनेस सेंटर और जिम कभी अस्तित्व में और आपकी पहुंच में नहीं आ पाते, अगर मोटापा बड़ी आपा की तरह मानवमात्र पर अपनी 'करुणा-कृपा' नहीं बरसाता। 'मोटापा घटाओ उद्योग' से जुड़े और चिपके हुए लोगों की रोजी-रोटी और दाल मखानी, जिस बिना सबसिडी वाले चूल्हे से चल रही है उस पर मालिकाना हक भी मोटे लोगों का ही है।

इस रंग बदलती हुई दुनिया में जहां भाई, भाई को छोड़ रहा है, नेता बड़ी-बड़ी छोड़ रहे हैं, वहीं पृथ्वी अपनी धुरी नहीं छोड़ पा रही है। इसके पीछे (आगे और साइड में भी) मोटे लोगों का ही वरदहस्त है, क्योंकि उनके वजन का वात्सल्य भाव ही पृथ्वी को अपनी धुरी पर टिकाने का सामर्थ्य वैध-अवैध रूप से उचित दामों पर रखता है।
मोटापे के उपरोक्त 'फायदों' को देखते हुए मोटापा कम करने या करवाने को गैरजमानती अपराध घोषित किया जाना चाहिए और मोटापे के लिए शर्मिंदा होने या करने वालों पर रासुका लगाना चाहिए। इन सबके इतर मोटापा इतराने की विषयवस्तु है, क्योंकि ज्यादा वजन घटाने से लोग आपको 'हल्के' में लेने लगते हैं।



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