1. लाइफ स्‍टाइल
  2. »
  3. साहित्य
  4. »
  5. मंच अपना

अस्तित्‍व

अस्तित्‍व पंकज जोशी
- पंकज जोशी

ND
आज चाँद दिखा बिलकुल आधा
अपने आधे हिस्से को तलाशता चाँद
कुछ तो अधूरा लगा उसे
अधूरे हिस्से में किसी अपने को तलाशता चाँद

स्याह रात में, गहरे आसमाँ में
चंद तारों की रौशनी के सहारे
अपने अधूरेपन को ढोता
अपना आधा अस्तित्व तलाशता चाँद

प्रेमियों का गवाह, विषय कवियों का कभी
आत्मा चकोर की, जान कुछ चित्रों की
पर किसी की नज़र में आज
ख़ुद अपने से जूझता हुआ चाँद

फिर भी घटता-बढ़ता, बनता-बिगड़ता
कभी सौंदर्य खोता, फिर अपना आकार पाता
पंद्रह दिनों के अपने जीवन में
विचित्र खेल खेलता चाँद

ईश्वर की सुंदरतम कृति ये
पंद्रह दिनों में ही अपना अस्तित्व खोता
घट-घटकर फिर बढ़ता है
दुविधा में कैसी रहता है चाँद

आदमी
जबकि जीता है कई बरस
फिर भी उसकी हर समस्या
उसके लिए कोई पहाड़ है
वो कभी अधूरा नहीं होता
इसके बीच भी उसका अस्तित्व तो बना रहता है

वो चाँद की तरह नहीं है
फिर भी उदास रहता है, नाराज़ रहता है
उसके चेहरे पर हँसी तलाशता है चाँद!