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इन सवालों से घिरे रहते हैं जर्मन माता पिता

Updated: मंगलवार, 26 जून 2018 (11:27 IST)
बच्चे को पालने का सही तरीका क्या हो? उन्हें कब क्या खिलाया जाए? मां बाप अकसर ऐसे सवालों से घिरे रहते हैं। जानिए, भारत की तुलना में कितना अलग है जर्मनी में बच्चा पालना।
 
 
नाम कैसा हो?
जर्मनी हो या भारत, बच्चे का नाम हमेशा ही एक बड़ा मुद्दा बना रहता है। नाम पारंपरिक भी हो और साथ ही मॉडर्न भी। कहीं माता पिता कोई ऊलजलूल नाम ना रख दें, इसलिए जर्मनी में ऐसे नामों की एक लिस्ट भी है, जिन्हें रखने की अनुमति नहीं है।
 
 
दूध कहां पिलाएं?
हालांकि जर्मन लोगों को इससे कोई दिक्कत नहीं है लेकिन देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो महिलाओं को सरेआम अपने बच्चे को दूध पिलाने का हक देता हो। कभी कभार ऐसे मामले भी देखे गए हैं जहां रेस्तरां में महिलाओं को ऐसा करने से मना किया गया।
 
 
कब तक पिलाएं?
बच्चे को दूध पिलाने के मामले में भारत को दुनिया के सबसे उदार देशों में माना जाता है। जर्मनी में बच्चा पैदा होने पर माओं से पूछा जाता है कि वे अपना दूध पिलाना पसंद करेंगी या नहीं। कम ही महिलाएं एक साल से ज्यादा बच्चे को अपना दूध पिलाती हैं।
 
 
कौन सा किंडरगार्टन?
जर्मनी में बच्चा होने पर काम से लंबी छुट्टी मिलती है। एक साल तक माता पिता में से कोई एक घर पर रह सकता है। इसके बाद किंडरगार्टन की जरूरत पड़ती है। यह घर के करीब हो या दफ्तर के, बच्चा कितने घंटे वहां बिताएगा, मां बाप के सामने ऐसे कई सवाल होते हैं।
 
 
टीका लगाएं या नहीं?
भारत में इस तरह का सवाल नहीं होता। लोग जानते हैं कि टीका लगवाना जरूरी है। लेकिन जर्मनी समेत कई पश्चिमी देशों में ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है कि टीके से बच्चा बीमार हो सकता है। हालांकि जर्मनी में 96 फीसदी लोग अपने बच्चों को टीका लगवाते हैं।
 
 
रोने दें या नहीं?
90 के दशक में जर्मनी में एक किताब आई जिसका शीर्षक था, "हर बच्चा सोना जानता है"। इस किताब के अनुसार बच्चा जब रोए, तो उसे रोने दें। आखिरकार वो खुद ही सो जाएगा। यह किताब खूब बिकी और लोग ऐसा करने भी लगे। हालांकि नए शोध इसे गलत बताते हैं।
 
 
कहां सुलाएं?
कुछ लोग शुरू से ही बच्चे को अलग कमरे में या कम से कम अलग बिस्तर में सुलाते हैं, तो वहीं कुछ का मानना है कि बच्चे को सीने से लगा कर रखना चाहिए। ऐसे लोग घर से बाहर जाते समय भी बेबी बैग का इस्तेमाल करते हैं।
 
 
कौन सा डायपर?
बगैर डायपर के शायद ही कोई बच्चा दिखे। लेकिन डायपर कैसा हो? कपड़े वाला या साधारण? सस्ता या महंगा? पेट्रोलियम वाला या ऑर्गेनिक? पार्क में जब माता पिता एक दूसरे से मिलते हैं, तो शायद सबसे ज्यादा चर्चा इसी विषय पर होती है।
 
 
क्या खिलाएं?
बाजार में बच्चों को खिलाने के लिए कई तरह की चीजें मौजूद हैं। जिनके पास वक्त की कमी है, वे अकसर इनका सहारा लेते हैं। लेकिन जो लोग घर पर ही बच्चे का खाना बनाते हैं, उन्हें "अच्छे माता पिता" का दर्जा दिया जाता है।
 
 
टीवी और स्मार्टफोन?
आज के जमाने में बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना बहुत मुश्किल है। टीवी, स्मार्टफोन और कंप्यूटर बच्चों के बड़े होने का हिस्सा हैं। लेकिन बच्चों को कितनी देर तक इनके सामने बैठने दिया जाए? सभी मां बाप अपनी समझ के हिसाब से फैसले लेते हैं।
 
 
कितना मीठा?
पहले साल में ज्यादातर बच्चे को ना नमक दिया जाता है और ना ही चीनी। धीरे धीरे इनकी शुरुआत होती है और फिर एक वक्त ऐसा भी आता है जब बच्चे गर्मी के मौसम में हर रोज आइसक्रीम खाते हैं। लेकिन शाम छह बजे के बाद चीनी पर रोक होती है।
 

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