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कविता : एक देश है, एक वतन है...

poem on india
मिले हाथ से हाथ तो मिलकर,
दृढ़ ताकत बन जाते।
बड़े-बड़े दुश्मन तक इसके,
आगे ठहर न पाते।
 
ईंट से ईंट जुड़ी तो कई,
मंजिल का घर बन जाता।
अंगुली का मुट्ठी बन जाना,
किसे समझ न आता।
 
मधुमक्खी के झुंड बड़े,
शैतानों को डंस लेते।
तिनकों वाली रस्सी से, 
शेरों को भी कस देते।
 
टुकड़ों-टुकड़ों बंटे देश पर,
परदेशी क्यों छाए।
इसी फूट के कारण वर्षों,
कब्जा रहे जमाए।
 
जाति-धर्म वर्गों का बंटना,
रहा देश को घातक।
मिलकर रहने का फिर भी,
कुछ मोल न समझा अब तक।
 
रहना है तो रहो देश में,
हिन्दुस्तानी बनकर।
एक देश है, एक वतन है,
कहो सभी से तनकर।
 
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512).... और पढ़ें