कविता : उड़नखटोला पाते जी
बढ़िया सा एक उड़नखटोला,
काश! कहीं से पाते जी।
अपने भैया अजय-विजय संग,
दूर गगन में जाते जी।।1।।
चांद-सितारों की दुनिया में,
खूब लगाकर चक्कर जी।
बैठ मजे से फिर चंदा संग,
हम खाते घी-शक्कर जी।। 2।।
लेखक के बारे में
डॉ. प्रमोद सोनवानी 'पुष्प'