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Written By ND

यज़ीद मोर्चा जीता है...

मुहर्रम विशेष

मुहर्रम
- मोहम्मद इब्राहीम कुरैशी

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हजरत इमाम हुसैन की दूरदृष्टि ने करबला के कुपरिणाम का अंदाजा कर लिया था। आप जानते थे कि यदि आज इसका तीव्र विरोध न किया गया तो मानवता उस व्यवस्था से सदा के लिए वंचित हो जाएगी जो इस धरती पर न्याय, सुख, शांति, इनसानी भाईचारा और विश्व-बंधुत्व कायम करती है। यह वह महान उद्देश्य था जिसके लिए आपने अपनी और अपने समस्त परिवार की कुर्बानी दी। यह पवित्र उद्देश्य आपको अपनी जान और औलाद से भी बढ़कर प्यारा था।

हर साल सारी दुनिया के मुसलमान हजरत इमाम हुसैन की दुःखद शहादत का गम मनाते हैं। आप हजरत मुहम्मद मुस्तफा सल्ल. के नवासे, हजरत बीबी फातिमा (रजि.) और हजरत अली (रजि.) के पुत्र थे। आपके पिता हजरत अली इस्लाम के चौथे खलीफा थे। हजरत अली को भी शहीद कर दिया गया था। सवाल यह है कि हजरत इमाम हुसैन के समक्ष वह क्या बड़ा उद्देश्य था जिसके लिए आपने अपने बाल-बच्चों की कुरबानी दे दी और खुद भी भूखे-प्यासे शहीद हो गए? हजरत ख्वाजा मुईनउद्दीन चिश्ती अजमेरी (रह.) ने एक रूबाई में आपको यूँ ख़िराजे अकीदत पेश की है।

शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन।
दीन अस्त हुसैन दीन पनाह अस्त हुसैन॥
सर दाद न दाद दस्त दर दस्ते यजीद।
हक्का कि बिनाए ला इलाहा अस्त हुसैन॥

आपने फरमाया कि हुसैन शाह बादशाह हैं। दीन पर चलने वाले और दीन की हिफाजत करने वाले हैं। आपने सर दे दिया लेकिन यजीद के हाथ में हाथ न दिया। सच तो यह है कि आपने दीन की बुनियाद मजबूत कर दी।

इस्लाम समस्त मानव समाज के लिए एक संतुलित ईश्वरीय जीवन व्यवस्था है। इस व्यवस्था में अल्लाह को हाकिम मानकर उसके सारे आदेशों का पालन करना ही इस्लाम है। यह आदेश हमारे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यक्तित्व पर भी लागू होते हैं। इस्लामी राजनीति की बुनियाद यह है कि इनसान को और इस समस्त संसार को ईश्वर ने बनाया और पैदा किया है।

इसलिए वही पैदा करने वाला है, और उसी के आदेश का पालन इनसान को करना चाहिए उसके अतिरिक्त अपने जैसे किसी इनसान या इनसानों के समूह का कानून इनसान पर नहीं चलना चाहिए। इनसान की हैसियत इस धरती पर उसके खलीफा (उत्तराधिकारी) की है। वह स्वयं कानून बनाने वाला नहीं बल्कि ईश्वर की ओर से अवतरित कानून को इस धरती पर लागू करने वाला है। जिस प्रकार हर इनसान यह चाहता है कि उसके घर में उसी की मर्जी चले, ठीक इसी प्रकार ईश्वर यह चाहता है कि उसकी धरती पर उसी की मर्जी चले। इनसान शासक नहीं प्रजा है।

पैगम्बर इस्लाम हजरत मोहम्मद सल्ल. ने अपने जीवनकाल में इस व्यवस्था को कायम किया और आपके बाद आपके चारों खलीफा इसी व्यवस्था को चलाते रहे। यह व्यवस्था 30 वर्ष तक चलती रही और संसार ने इसकी खूबियाँ अपनी आँखों से देखीं। चौथे खलीफा हजरत अली की शहादत के बाद एक टर्निंग पॉइंट आया और हजरत अमीर मुआविया ने अपने बाद अपने बेटे यजीद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया जबकि मुसलमानों का खलीफा आम मुसलमानों की स्वतंत्र राय और मशविरे से चुना जाता था।

अब इस प्रकार इस्लामी राजनीति अपनी पटरी बदल रही थी। हजरत इमाम हुसैन की दूरदृष्टि ने इसके कुपरिणाम का अंदाजा कर लिया था। आप जानते थे कि यदि आज इसका तीव्र विरोध न किया गया तो मानवता उस व्यवस्था से सदा के लिए वंचित हो जाएगी जो इस धरती पर न्याय, सुख, शांति, इनसानी भाईचारा और विश्व बंधुत्व कायम करती है। यह वह महान उद्देश्य था जिसके लिए आपने अपनी और अपने समस्त परिवार की कुरबानी दी। यह पवित्र उद्देश्य आपको अपनी जान और औलाद से भी बढ़कर प्यारा था।

'जान दी, दी हुई उसी की थी'।

आइए देखें कि बाद में क्या-क्या परिवर्तन आए?
* सबसे पहले तो राज्य और शासन का रूप बदला। पहले मुसलमानों के खलीफा स्वतंत्र, निर्भय और निष्पक्ष चुनाव से चुने जाते थे, अब बलपूर्वक तलवार की नोंक पर चुने जाने लगे।

* पहले शासक खलीफा अल्लाह से डरकर उसके समक्ष अपने आपको उत्तरदायी समझते थे। सत्ता को एक अमानत समझा जाता, अब वे लोग आजाद थे और अपनी मर्जी जबरदस्ती जनता पर थोपने लगे।

* पहले खलीफा भलाई फैलाने और बुराई मिटाने को अपना मिशन समझते थे, अब दरबारों में शराब, कबाब और नाच रंग की महफिलें लगने लगीं। बादशाह इस्लामी मर्यादाओं का उल्लंघन करते, किसी की क्या मजाल कि उन्हें रोके।

* पहले खलीफा खजाने को अमानत समझते थे। अब खजाना ऐश, अय्याशी और फिजूलखर्ची के लिए इस्तेमाल होने लगा।

* पहले खलीफा दिन में पाँच बार नमाजों में जनता से मुलाकात करते, उनका दुःख-दर्द सुनते और उनकी समस्याओं का समाधान करते थे, किंतु अब बादशाह अपनी जान के डर से जनता से दूर महलों में रहते थे। जनता की आवाज उनके कानों तक नहीं पहुँचती थी।

करबला की दुःखद घटना के बाद खिलाफत की व्यवस्था दोबारा कायम न हो सकी। आज भी यदि धरती पर सुख और शांति कायम हो सकती है तो उसी व्यवस्था की ओर लौटना होगा। हजरत इमाम हुसैन भले ही उस मोर्चे पर कामयाब न हो सके, किंतु यह मिसाल तो कायम कर गए कि 'खूने शहीदाने करबला की कसम।

यजीद मोर्चा जीता है जंग हारा है॥'

(लेखक जाने-माने इस्लामी विचारक हैं।)
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